ड्रिप सिंचाई के लाभ और नुकसान

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ड्रिप सिंचाई

कृषि में मृदा के बाद सबसे महत्वपूर्ण कारक है सिंचाई का जल। आमजन यह तो जानते है कि जल ही जीवन है लेकिन उसके उचित उपयोग के प्रबंधन पर वो ध्यान नहीं देते हैं। हम सभी जानते हैं कि जल प्रकृति की अनुपम उपहार है लेकिन उसके उपयोग में संयमता नहीं बरतते हैं। लगभग 97 प्रतिशत जल महासागरों में खारे पानी के रूप में है और 2 प्रतिशत बर्फ के रूप में पर्वत शृंखलाओं पर जमा हुआ है शेष बचे 1 प्रतिशत जल ही हमारे पास उपयोग के लिये उपलब्ध है। हमारे पास उपलब्ध जल में से सर्वाधिक जल का उपयोग कृषि में किया जाता है। आज इस बात की सख्त आवश्यकता है कि हमें सिंचाई जल का अधिकतम सक्षम तरीके से उपयोग करना वर्तमान समय की मांग है।

ड्रिप सिंचाई के लाभ

  • कम मात्रा वाले जल स्रोतों का उपयोग किया जा सकता है क्योंकि ड्रिप सिंचाई के लिए फव्वारा सिंचाई के लिए आवश्यक जल के आधे से भी कम की आवश्यकता हो सकती है।
  • कम परिचालन दबाव में भी संभव है, इसका मतलब पंपिंग के लिए कम ऊर्जा लागत है।
  • जल-उपयोग दक्षता के उच्च स्तर हासिल किए जाते हैं क्योंकि पौधों को अधिक सटीक मात्रा में पानी की आपूर्ति की जा सकती है।
  • रोग का दबाव कम हो सकता है क्योंकि पौधे के पत्ते सूखे रहते हैं।
  • श्रम और परिचालन लागत आमतौर पर कम होती है, और व्यापक स्वचालन संभव है।
  • बेहतर खरपतवार नियंत्रण और महत्वपूर्ण जल बचत होती है। जल सीधे पौधे के जड़ में दिए जाते हैं। कोई भी आवेदन पंक्तियों या अन्य अनुत्पादक क्षेत्रों के बीच नहीं किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप बेहतर खरपतवार नियंत्रण और महत्वपूर्ण जल बचत होती है।
  • खेत के संचालन, जैसे कि कटाई, सिंचाई के दौरान जारी रह सकते हैं क्योंकि पंक्तियों के बीच के क्षेत्र सूखे रहते हैं।
  • ड्रिप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से उर्वरकों को कुशलतापूर्वक लागू किया जा सकता है।
  • बड़े क्षेत्र की विस्तृत परिस्थितियों में सिंचाई की जा सकती है।
  • फव्वारा सिंचाई की तुलना में मिट्टी के कटाव और पोषक तत्वों की नुकसान लीचिंग को कम किया जा सकता है।

 

ड्रिप सिंचाई के नुकसान और सीमाएं

  • प्रति एकड़ प्रारंभिक निवेश लागत अन्य सिंचाई विकल्पों की तुलना में अधिक हो सकती है।
  • प्रबंधन की आवश्यकताएं कुछ अधिक हैं।
  • महत्वपूर्ण संचालन निर्णयों में देरी से अपरिवर्तनीय फसल क्षति हो सकती है।
  • ड्रिप सिंचाई प्रणाली से पौधों का पाला से संरक्षण संभव नहीं है; यदि यह आवश्यक है, तो फव्वारा प्रणाली आवश्यक है।
  • कृंतक, कीट और ड्रिप लाइनों के लिए मानव क्षति रिसाव के संभावित स्रोत हैं।
  • छोटे उत्सर्जकों के छिद्रों को रोकने के लिए जल निस्पंदन आवश्यक है।
  • फव्वारा सिंचाई की तुलना में, मिट्टी में जल वितरण प्रतिबंधित है।
  • ड्रिप सिंचाई प्रणाली को ध्वस्त करने और सीजन से सीजन में स्थानांतरित करने के लिए दबे मेनलाइन और सब-मेनलाइन पर कम जोर दें।

कृषक भाईयों को चाहिए कि जल को जलस्रोतों से खेत तक पहुंचाने के लिये कच्चे धोरों का उपयोग कभी नहीं करें। जलस्रोत से खेत तक पानी को पहुंचाने के लिये सदैव सीमेंट की पक्की नाली, सीमेंट के पाईप, एचडीपीई, पीवीसी या प्लास्टिक पाइप लाइनों का ही उपयोग करें ताकि जल ले जाने के दौरान कम से कम जल की क्षति हो। सिंचाई जल की क्षमता को बढ़ाने के लिये फसल में सिंचाई की उन्नत तकनीक जैसे फव्वारा एवं ड्रिप या बूँद-बूँद पद्धति का चयन करें। फलदार वृक्षों में बूँद-बूँद सिंचाई पद्धति का उपयोग करें। अब तो पानी की अहमियत को समझते हुए कुछ प्रगतिशील जागरूक कृषक जिन फसलों में पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी अधिक होती है, ऐसी फसलों में भी बूँद-बूँद सिंचाई पद्धति का उपयोग कर प्रकृति के इस अमृत तुल्य जल का सर्वश्रेष्ठ उपयोग कर रहे हैं। ऐसी फसलों में प्लास्टिक मल्च का भी उपयोग कर सिंचाई जल का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सकता है। विश्व समुदाय के प्रबुद्ध लोग अब तो यह कहने लगे हैं कि भविष्य में युद्ध जमीन के लिये नहीं परन्तु पानी के लिये होगा। 

  • झालेश कुमार
  • मृदा एवं जल अभियांत्रिकी संकाय
  • इं. गां. कृ. वि.वि., रायपुर 
  • jhalesh.ku.sahu@gmail.com
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