आया ग्रीष्मकालीन मक्का का समय

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उन्नत किस्मों के प्रयोग एवं उच्च बुवाई सिंचाई विधि में बदलाव करके मक्के का अधिक उत्पादन लिया जा सकता है। मक्का का उत्पादन भारत में वर्षभर तीन मौसम (खरीफ, रबी, एवं ग्रीष्म) में लिया जाता है। इसका 80 प्रतिशत क्षेत्रफल खरीफ में रहता है परंतु इसे अन्य मौसमों में भी उचित तकनीकों का उपयोग करके सफलतापूर्वक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। जिन किसानों के खेत दिसंबर-जनवरी माह में खाली रहते हैं वह मक्के के रोपे भी नर्सरी उगाकर तैयार कर सकते हैं। सामान्यत: मक्के की एक हेक्टेयर नर्सरी तैयार करने के लिए 700 वर्ग मीटर एरिया जरुरी है। नर्सरी 30-40 दिन की होने पर खेत में रोपाई की जा सकती हेैं। मक्के के लिए महीन (मृतिका) दोमट और काली मृदाएं उपयुक्त होती हैं। ऐसी मृदाएं जिनका की कार्बनिक पदार्थ उच्च हो और पी.एच. मान 5.5 से 7.0 तक हो मक्के के अच्छे उत्पादन के लिए श्रेष्ठ रहता है। ग्रीष्मकालीन मक्के या सामान्य मक्के की बीज दर, बीज के आकार, पौधे के प्रकार, मौसम और बोने के तरीके पर निर्भर करता है- सामान्यत: जो नीचे तालिका में दर्शाया गया हैं:-

बीज दर    
उद्देश्य बीज दर किग्रा/हेक्टे. रोपण ज्यामिति (पौधेमकतार) से.मी.
देशी (फ्लिंट) कॉर्न 20-25 60x20/75x20
स्वीट कॉर्न 08-10 75x25
बेबी कॉर्न 25 60x20
पॉप कॉर्न 12 60x15
चारा उद्देश्य हेतु 50 30x10

 

ग्रीष्मकालीन मक्का (फ्लिंट कॉर्न ) के लिए उपयुक्त उन्नतशील किस्में निम्नलिखित तालिका में दर्शायी गई हैं:-
प्रदेश अति शीघ्र परिपक्व शीघ्र परिपक्व
मध्यप्रदेश  विवेक 4, विवेक 17 जवाहर मक्का 8, जवाहर कम्पोसिट 12, अमर, आजाद-फसल, पंत संकुल मक्का-3,चन्द्रमती प्रताप मक्का-3,
उत्तरप्रदेश विवेक 5, 15, 17, 21 पूसा कम्पोसिट-4 , गौरव, आजाद उत्तम सूर्या
राजस्थान प्रताप हाईबिड 1 प्रताप मक्का-3, जवाहर मक्का 8, अमर, आजाद, कमल, पंत संकुल मक्का 3
बिहार डी 994, गुजरात मकाई-6 देवाकी, बिरसा विकास मक्का-2

 

मक्का भारत, विश्व की एक प्रमुख खाद्यान्न फसल है। मक्का को विश्व में 160 देशों में 150 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर उगाया जाता हैं। विश्व के सम्पूर्ण खाद्यान्न उत्पादन में मक्के की सहभागिता 36 प्रतिशत है। भारत में मक्के की उत्पादकता 2.43 टन/हेक्टेयर है। भारत में मक्का, धान और गेहूं के बाद प्रमुख खाद्यान्न फसल है। मक्के का क्षेत्रफल भारत में 8.7 मिलियन हेक्टेयर हैं। मक्का स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी लाभप्रद फसल है। यह लगभग 70 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट का स्त्रोत होने के साथ-साथ 10-15 प्रतिशत प्रोटीन का स्त्रोत भी है और फाइबर भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है। भारत में मक्के का प्रयोग मानव भोजन के साथ-साथ जानवरों के भोजन, मुर्गी खाद्य (पोल्ट्री फीड) और स्टार्च उद्योगों में भी होता है। इन बिंदुओं को देखते हुए मक्का काफी महत्पूर्ण फसल है और भारत में इसका क्षेत्रफल और उत्पादकता दोनों बढऩे के अच्छे अवसर हैं।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

उर्वरकों का प्रबंधन सामान्यत: मृदा के पोषण तत्व स्तर और फसल प्रणाली पर निर्भर करता हैं। सामान्यत: बुवाई से 10-15 दिन पूर्व 8-10 टन गोबर खाद (एफ. वाय. एम.) दे देना चाहिए। मक्के को 150 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 70-80 कि.ग्रा. फास्फोरस और 50-60 कि.ग्रा. पोटाश, 25 कि.ग्रा. जिंक प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता संपूर्ण वृद्धि काल तक रहती है। बुवाई के समय नाइट्रोजन की 20 प्रतिशत मात्रा, पूर्ण फास्फोरस और पूर्ण पोटाश एवं जिंक की मात्रा दे देनी चाहिए, नाइट्रोजन को पाँच विभिन्न भागों में मात्रा में अलग-अलग समय पर दें। ऐसा करने का उद्देश्य उसकी उपयोग क्षमता को बढ़ाना है। नाइट्रोजन का छिडकाव/उपयोग कुछ इस प्रकार करें:-

जल प्रबंधन

ग्रीष्मकाल में उन जगहों पर जहाँ पर्याप्त जल नहीं हैं, वहाँ पर मक्के में पर्याप्त मात्रा में पानी देना अपने आप में एक चुनौती हैं। क्योंकि मक्के को संपूर्ण जीवनकाल में 40-60 से.मी. जल की आवश्यकता होती है।

मक्के के ऊपर किए गए शोध में ऐसा पाया गया है, कि यदि मक्के की फसल को नी-हाई अवस्था एवं टॉसेल से लेकर सिंलकिंग अवस्था (पुष्पन) में सिंचाई न दी जाए तो 30-40 प्रतिशत तक उत्पादन में हानि हो सकती हैं। मक्के को निम्नलिखित अवस्थाओं पर जल देना अतिआवश्यक है:-

अवस्था/चरण  सिंचाई दिन
अंकुरण, स्थापन एवं  प्रथम सिंचाई 12वें दिन
वानस्पतिक अवस्था  द्वितीय सिंचाई 25वें दिन
(1-39 दिन तक) तृतीय सिंचाई 36वें दिन
पुष्पन अवस्था  प्रथम सिंचाई 48वें दिन
(40-65 दिन तक) द्वितीय सिंचाई 60वें दिन 
परिपक्व अवस्था  प्रथम सिंचाई 72वें दिन
(66-95 दिन तक)  

 

फसल अवस्था     नाइट्रोजन दर %
बुवाई के समय (आधार)     20
4 पत्ती अवस्था     25
8 पत्ती अवस्था     30
टॉसेल (नर पुष्पन)     20
बीज भरते समय     5
कुल     100%

 

सामान्यत: नी हाई अवस्था बुवाई के 35-36 दिन बाद आती है एवं टॉसेल से सिंलकिंग (पुष्पन) अवस्था 45-60 दिन के बीच आती है। इन अवस्थाओं पर सिंचाई देना अति महत्वपूर्ण है, गर्मियों में सूर्यप्रकाश भी दूसरे दिनों की तुलना में अधिक होता है, इस कारण वाष्पोत्सर्जन की क्रिया भी अधिक होती है, इस कारण फसल जल की माँग पूर्ति करना एक चुनौती है। इस समस्या से हम ड्रिप सिंचाई (टपक विधि) और मल्च का प्रयोग करके निजात पा सकते हैं। मक्के में हम ड्रिप विधि के माध्यम से सीधे फसल की वाष्पीकरण माँग के आधार पर सीधे पौधे के जड़ क्षेत्र में पानी दे सकते हैं और मृदा में नमी का न्यूनतम स्तर तक प्रबंध कर सकते हैं।

मक्के के लिए हम 2 लीटर प्रति घंटे स्त्राव वाली इन लाईन ड्रिप का प्रयोग करेंगे एवं 2 कतारों के बीच में एक लेटरल बिछाएंगे एवं फसल की जल माँग के आधार पर जल प्रबंधन करेंगे। सामान्यत: 45-60 सेंटीमीटर जल माँग पूर्ति के लिए 1 घंटे से 90 मिनट हर दूसरे दिन जल प्रबंधन पर्याप्त है। ड्रिप सिंचाई के माध्यम से हम 60-70 प्रतिशत तक जल की बचत कर सकते हैं और 20-25 प्रतिशत तक अधिक उत्पादन ले सकते हैं।

ड्रिप के साथ मल्च का प्रयोग ग्रीष्मकालीन अधिक वाष्पोत्सर्जन होने से बचायेगा और साथ में खरपतवार प्रबंधन में भी सहायता करेगा। मक्के में ड्रिप सिंचाई विधि और मल्च का प्रयोग करने के लिए हमें रेज्ड बेड तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। इन सब तकनीकों का सफलतापूर्वक प्रयोग कर हम अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं।    

 

  • नीलेन्द्र सिंह वर्मा
  • मलखान सिंह जाटव 
  • योगेश राजवाड़े
  • के.वी.आर. राव  

    भा.कृ.अनु.प.-केन्द्रीय कृषि         
    अभियांत्रिकी संस्थान नबीबाग, 
    बैरसिया रोड, भोपाल  
    email : rajwadeyogesh@gmail.com

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