बदलते मानसून का मुकाबला करने हेतु - खेत की सख्त परत को तोड़ेगा सबसॉइलर

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सबसॉइलर के खरीफ फसलों में लाभ

ट्रैक्टर चालित सबसॉइलर एवं ट्रैक्टर चालित कल्टीवेटर से खेत तैयार करने से दोहरा लाभ मिलता है। किसान जब खेतों में ट्रैक्टर चालित सबसॉइलर चलाकर ढाई फीट गहरी नाली का निर्माण करते हैं तो वर्षा काल में बरसा पानी सीधे जमीन में उतर जाता है। सामान्य से अधिक पानी बरसने पर भी बेड पर खड़ी फसलों को हानि नहीं होती है। वहीं, दूसरी ओर ये पानी जमीन के नीचे संग्रहित रहता है। वर्षा की लंबी खेंच ( स्रह्म्4 ह्यश्चद्गद्यद्य) की स्थिति निर्मित हो, ऐसे में फसल को जब पानी की आवश्यकता हो तो यही वर्षा जल जीवनदायी साबित होता है। सोयाबीन में पुष्पन और फलन की दशा में जब पानी की अत्यंत आवश्यकता होती है, यही पानी केपिलरी के द्वारा धीरे-धीरे ऊपरी सतह की ओर उठता है। फसल को लंबे समय तक आपूर्ति करके जीवित रखता है, पौधों में तनाव नहीं बढऩे देता। इस प्रकार सोयाबीन फसल प्रभावित नहीं होती। पीली नहीं पड़ती। इस प्रकार ट्रैक्टर चालित सबसॉइलर चलाने से किसानों को उत्पादन में कमी नहीं आती है।

वर्तमान समय में प्राकृतिक असंतुलन के चलते मौसम में भारी अनिश्चितता व्याप्त है। वर्षा की मात्रा, अवधि और समय निश्चित नहीं रह गया है। खरीफ के सीजन में किसानों के पास इतना समय नहीं होता है कि वे किसी फसल विशेष के अनुसार व्यवस्था कर सकें। सोयाबीन को ही लें, यह ऐसी फसल है, जो अनावृष्टि अथवा अतिवृष्टि से अत्यधिक प्रभावित होती है। समय पर वर्षा न होना, अतिवृष्टि के साथ खेतों में पानी भर जाना - यदि ऐसी स्थितियां निर्मित हो जाएं तो किसान को अपेक्षित मात्रा में उत्पादन नहीं मिल पाता है।  कई बार उच्च तापमान और (नमी की कमी) सूखे की समस्या खेतो में एक साथ देखने को मिलती है। इन  समस्याओं से निजात पाने के लिए खेतों में सबसॉइलर एवं बीबीएफ चलाएं। विपरीत मौसम में अपने खेतों में सबसॉइलर एवं बीबीएफ सीड ड्रिल अथवा बीबीएफ सीड प्लान्टर  चलाकर किसान अच्छा उत्पादन ले सकते हैं। ट्रैक्टर चलित सबसॉइलर के द्वारा वर्षा खेत का पानी  खेत में ही रोक कर संग्रहित किया जा सकता है। इस संग्रहित जल कर प्रयोग सोयाबीन फसल के द्वारा सूखा पडऩे की स्थिति में  किया जाता है। सिंचाई के आभाव में अथवा कमी में उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है।  सबसॉइलर एवं सामान्य सीड ड्रिल चलाकर भी बदले हुए मौसम में किसान अच्छा उत्पादन ले सकते हैं। ट्रैक्टर चालित सबसॉइलर के द्वारा हार्ड पैन (सख्त परत) जो कि भूमि की सतह से 12 इंच से लेकर 20 इंच की गहराई पर मिट्टी के प्रकार के अनुसार पाया जाती  है। इस ट्रैक्टर चालित सबसॉइलर के द्वारा हार्ड पैन (सख्त परत) को तोडऩे से अधिक से अधिक वर्षा जल को रोक कर भूमि की ऊपरी सतह से नीचे संग्रहित भी किया जा सकता है। 

सबसॉइलर के रबी फसलों में लाभ

ट्रैक्टर चालित सबसॉइलर एवं ट्रैक्टर चालित कल्टीवेटर से खेत तैयार करने से लाभ रबी फसलों में भी मिलता है। किसान जब खेतों में ट्रैक्टर चालित सबसॉइलर चलाकर ढाई फीट गहरी नाली का निर्माण करते हैं तो वर्षा काल में बरसा पानी सीधे जमीन में उतर जाता है। ये पानी जमीन के नीचे संग्रहित रहता है। रबी फसलों में जल  की कमी  की स्थिति निर्मित हो, ऐसे में फसल को जब पानी की आवश्यकता हो तो यही नीचे उपलब्ध वर्षा जल रबी फसलों के लिए जीवनदायी साबित होता है। गेहूँ, चना आदि फसलों की ऐसी दशा में जब पानी की अत्यंत आवश्यकता होती है, यही पानी केपिलरी के द्वारा धीरे-धीरे ऊपरी सतह की ओर उठता है। फसल को लंबे समय तक आपूर्ति करके जीवित रखता है, पौधों में तनाव नहीं बढऩे देता। इस प्रकार सोयाबीन फसल प्रभावित नहीं होती। पीली नहीं पड़ती। इस प्रकार सबसॉइलर चलाने से किसानों को उत्पादन में कमी नहीं आती है।

संग्रहित वर्षा जल केपिलरी प्रक्रिया से भूमि सतह की ओर जरुरत पडऩे पर पहुँचता है और रबी फसलों के पौधों की जड़ों को जल उपलब्ध कराता है जिससे रबी में पौधों की बढ़वार और उत्पादन में वृद्धि होती है। 

बीबीएफ पद्धति अपनाएं

सबसॉइलर से खेत तैयार करने के पश्चात सामान्य समतल खेत की सीड ड्रिल का प्रयोग भी किया जा सकता है। परन्तु खेत तैयार होने के पश्चात सोयाबीन का अच्छा उत्पादन लेने के लिए किसान ब्रॉड बेड एंड फरो (बीबीएफ) पद्धति से सोयाबीन की बोवनी करें। इसके लिए किसान दो नाली वाली ट्रैक्टर चलित बीबीएफ सीड ड्रिल या बीबीएफ सीड प्लान्टर मशीन का उपयोग करें। जहां तक संभव हो बेड के ऊपर 4 अथवा 5 कतार में ही बोवनी की जाए। बीबीएफ पद्धति से बनायी गयी नाली से नाली की दूरी 220 सेंटीमीटर रखें। इससे 200 सेंटीमीटर के बेड का निर्माण होता है। किसान पौधे से पौधे की दूरी भी नियंत्रित करें ताकि पौधों को जरूरी पोषण तत्व मिल सकें। चूंकि रबी में चने की फसल भी वर्षा से प्रभावित होती है, इसमें भी ये पद्धति लाभकारी सिद्ध हुई है। कई किसान हैं जो वर्तमान में इस पद्धति से रबी के मौसम में चने की फसल ले रहे हैं। 

 

 

सोयाबीन की वानस्पतिक वृद्धि के समय एवं फुल, फली की शुरुवात की अवस्था में पानी की बहुत आवशकता होती है लेकिन पिछले कुछ वर्षो से यह देखा गया है की इसी समय बारिश में 10-12 दिन  का अन्तराल हो जाता है इस स्थिती में बी.बी.एफ पद्धति के द्वारा बोवनी से बनी हुई नालियों में पानी छोड़ कर सोयाबीन के उत्पादन को घटने से बचाया जा सकता है यह सुविधा समतल भूमि में बोवनी करने पर संभव नहीं है।     

 कैसे और कब करें ट्रैक्टर चालित सबसॉइलर का उपयोग

ट्रैक्टर चालित सबसॉइलर खेतों को गहराई तक पहुँचने वाला यंत्र है। खेत में नाली बनाने के लिए 55 हार्सपॉवर ( 50 पीटीओ हार्सपॉवर) के ट्रैक्टर की आवश्यकता सबसॉइलर से होती है। इसकी सहायता से किसान अपने खेतों में ढाई इंच चौड़ी एवं ढाई फुट गहरी नाली बना सकते हैं। सबसॉइलर के प्रयोग से कम से कम 15 फीट के अंतर से सबसॉइलर के प्रयोग से नाली बनाएं। खेतों में सबसॉइलर चलाने का सही समय 15 अप्रैल  से 25 अथवा 15 मई से 30 मई के बीच होता है। रबी मौसम के पश्चात गेहूं और चना की फसल निकलने के पश्चात भी सबसॉइलर चलाया जा सकता है। खेत में नाली बनाने के लिए 40 हार्सपॉवर (45 पीटीओ हार्सपॉवर ) के ट्रैक्टर से छोटे सबसॉइलर का भी प्रयोग किया जा सकता  है। 40 हार्सपॉवर (45 पीटीओ हार्सपॉवर) सबसॉइलर में गहराई आवश्यकता अनुसार कम या ज्यादा की जा सकती है।

बीज परीक्षण जरूरी

सोयाबीन के बीज बहुत संवेदनशील होते हैं, जिनकी अंकुरण क्षमता तापक्रम के अनुसार तेजी से प्रभावित होती है। इसलिए किसान बीज परीक्षण करके ही बोवनी करें। बुवाई करने के पूर्व बीजोपचार अवश्य करें ताकि भली प्रकार अंकुरण हो।

कल्टीवेटर से तैयार करें खेत

किसान इस बात का विशेष ध्यान रखें कि सबसॉइलर से नाली बनाने के पश्चात किसान ट्रैक्टर चालित दांत वाले कल्टीवेटर से खेत तैयार करें। ट्रैक्टर चालित दांत वाले कल्टीवेटर के पीछे भारी पाटा का इस्तेमाल करें। ऐसा करने से सबसॉइलर से  बनी नाली में मिट्टी भर जाती है। जहां तक संभव हो, पंजे का इस्तेमाल नहीं करें। पंजे का इस्तेमाल करने पर वर्षा का पानी 3 इंच से अधिक नीचे नहीं उतरता और अधिकांश वर्षा का पानी बह कर खेत से बाहर निकल जाता है। यदि दांते वाला कल्टीवेटर चलाते हैं तो जमीन में पानी तेजी से उतरता है। ट्रैक्टर चालित पंजे का इस्तेमाल नहीं करें। पंजे का इस्तेमाल करने से भूमि सख्त हो जाती है जिसके कारण वर्षा जल अपने साथ मिट्टी को बहाकर ले जाति है। ऐसा होने पर उपजाऊ मिट्टी का की नुकसान होता है। किसान इस बात की विशेष सावधानी रखें कि जहां धान की फसल लेनी हो, उस खेत में सबसॉइलर नहीं चलाएं। साथ ही ऐसे खेत जहां मुरम हो या जमीन पथरीली हो वहां भी सबसॉइलर उपयोगी नहीं है। किसान इस यंत्र को खेत के 1-2 बीघा रकबे (ड्डह्म्द्गड्ड शद्घ द्यड्डठ्ठस्र) के हिस्से में चलाकर पूर्व में इससे होने वाले फायदे-नुकसान को परख सकते हैं।

सावधानी बरतें

जहां तक संभव हो पंजा नहीं चलाएं, पंजा चलाने से पानी धीमे-धीमे जमीन में उतरता है। ऐसा देखा गया है, पंजा खेत में हार्ड लेयर का निर्माण करता है, इससे पानी खेत में रुक जाता है। पंजे से तैयार खेत में पानी या तो खड़ा रहता है अथवा तेजी से बह जाता है। अतिवृष्टि के दौरान जब खेत से पानी तेजी से बहता है तो वह मिट्टी का क्षरण करता है। तेज बहता पानी अपने साथ उपजाऊ मृदा, पोषक तत्व आदि भी बहा ले जाता है। कई बार पानी के साथ बीज भी बह जाते हैं, अथवा बीज पर अतिरिक्त मिट्टी चढऩे से जमीन में अधिक गहराई में चले जाते हैं और अंकुरण नहीं होता। दोबारा बोवनी करनी पड़ती है, खर्च बढ़ता है।

दूसरी ओर, यदि लंबे समय तक खेत में पानी खड़ा रहता है तो सोयाबीन फसल की जड़ों में बनने वाली गठानें विकसित नहीं हो पाती हैं। इस दशा में सोयाबीन फसल वातावरण में उपलब्ध नाइट्रोजन तत्व नहीं खींच पाती है। ऐसे में फसल पीली पड़ जाती है। किसानों को अतिरिक्त उर्वरक  जैसे डाई अमोनियम फास्फेट (डीएपी) आदि का उपयोग करना पड़ता है और खर्च बढ़ता है।

      

  • डॉ.देवव्रत सिंह

प्रधान वैज्ञानिक (कृषि मशीनरी) 

  • राजकुमार रामटेके 

वरिष्ठ वैज्ञानिक (अनुवांशिकी और पादप प्रजनन)
आई.सी.ए.आर-भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर

 

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