खेती को लाभकारी बनाने के लिए - रेवडिय़ां बांटना स्थाई समाधान नहीं

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(अशोक कुमठ, मो. 8989557689)

जब तक बीमारी की जड़ तक नहीं जाएंगें तब तक उसका इलाज सम्भव नहीं है। किसानों को वोट के खातिर लोक लुभावन योजनाओं के जाल में फंसानें से खुशहाली नहीं बदहाली होगी। मुझे डर है कि किसान हितैषी स्वांग रचने वाली राजनैतिक पार्टीयां कहीं प्रत्येक पंचायत स्तर पर किसान राम रसोडा योजना आरंभ न कर दे। चकाचक दोनों समय भोजन खाइये और दिन भर चादर तानकर सोइये। कर्ज माफी किसानों की समस्या का स्थाई हल नहीं है। डॉ. इलाज के पहले सभी जांच करवाता है, उसके बाद ही इलाज प्रारंभ होता है। उसी प्रकार पौधों को क्या तत्व चाहिये व मिट्टी में किन तत्वों की कमी है। जब तक इसकी जानकारी किसानों को नहीं होगी, तब तक ऐसी योजना केवल झोला छाप डॉक्टर का इलाज साबित होगी।

प्रत्येक फसल के तीन आवश्यक तत्व होते है- नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश (एनपीके) इसके अतिरिक्त 17 सूक्ष्म तत्वों की आवश्यकता होती है, इसमें 3 तत्व कार्बन, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन तो उसे पानी व हवा से मिल जाता है। किसानों को मिट्टी के तत्वों की कमी का ज्ञान नहीं होने से एनपीके के उपयोग का अनुपात पूरी तरह बिगड़ गया है। यूरिया सस्ता होने के कारण किसान धड़ल्ले से उपयोग कर रहे है। सोयाबीन जैसी फसल जिसमें यूरिया की कोई आवश्यकता नहीं होती है। फिर भी किसान भेड़ चाल से चलकर इसका उपयोग कर रहे है। स्वस्थ फसल और अच्छे उत्पादन के लिये एनपीके के उपयोग का अनुपात 4:2:1 होना चाहिए लेकिन आश्चर्य की बात है, प्रदेश में इसका अनुपात 15:8:1 है और हरियाणा जैसे राज्य में तो ये अनुपात 52:14:8 है। स्पष्ट है कि सरकारी मशीनरी फील्ड में किसानों को कोई जानकारी नहीं दे रही है। किसान अपने परम्परागत ढर्रे पर चलकर ही खेती कर रहेे हैं।

सरकार ने स्वाइल हेल्थ कार्ड की बहुत अच्छी योजना बनाई, लेकिन यह योजना कागजों पर ही ज्यादा चल रही है। जब तक आधार कार्ड की तरह इसकी अनिवार्यता कृषि आदान खरीदने में नहीं की जाएगी तब तक कोई ठोस परिणाम नहीं आ सकते। प्रत्येक खेत की मिट्टी के तत्वों पर आधारित यह कार्ड प्रत्येक किसान के पास होना चाहिये और उसी अनुरूप खाद-बीज, दवॉई, क्रय करना अनिवार्य हो। डीबीटी (डायरेक्ट बेनीफिट स्कीम) में आधारकार्ड के साथ-साथ स्वाइल हेल्थ कार्ड का नम्बर अनिवार्य होना चाहिए। अब समय आ गया हैं खेती की लागत कम करते हुए, उत्पादन बढ़ाने की दिशा में ठोस एवं कारगर उपायों की अनिवार्यता पर जोर दिया जाए। किसानों को वैज्ञानिक खेतीे के लिये प्रशिक्षित किया जाए। प्रत्येक ब्लॉक लेवल पर एक कृषि क्लीनिक की स्थापना हो जिसमें कृषि स्तानक सेवारत रहे। किसान के बीज से लेकर फसल कटाई तक पर उनकी निगरानी रहे। बिना कृषि वैज्ञानिकों की पर्ची के कोई कृषि आदान नहीं खरीदा जाय। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया की निगरानी का अनुबंध किसी निजी क्षेत्र की कम्पनियों को दिया जाए। प्रत्येक फसल के लिए एक सॉफ्टवेयर तैयार हो उसी के अनुरूप खेती हो।

राजनैतिक दल रेवडिय़ां बांटना बंद कर कोई ठोस निर्णय ले, तभी खेती लाभ का धंधा हो सकता है।
 

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