नदी-तट के समाज की अनदेखी

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हिमालयी राज्यों में सुरंग (टनल) आधारित जल-विद्युत परियोजनाओं के कारण नदियों का प्राकृतिक स्वरूप उजड़ रहा है। नवंबर, 2018 के अंतिम सप्ताह में यमुना की सहायक टौंस नदी के उद्गम पर प्रस्तावित जखोल-सांकरी जल-विद्युत परियोजना से प्रभावित गांव के लोगों ने मोरी ब्लॉक मुख्यालय में बुलाई गई जन-सुनवाई की कार्यवाही पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। यहां प्रभावित होने वाले लोगों ने कहा था कि पहले गांव में आकर लोगों के हक-हुकूकों की बात सुनी जाएं और फिर इस परियोजना की जानकारी स्थानीय भाषा में लोगों को उपलब्ध कराई जाए। यह बात उत्तराखंड में पिंडर नदी पर प्रस्तावित देवसारी जल-विद्युत परियोजना से प्रभावित लोग भी उठाते रहे हैं। यह स्थिति भारत-नेपाल के बीच महाकाली नदी पर प्रस्तावित पंचेश्वर बांध से होने वाले प्रभावितों के बीच भी है। इस तरह से लोगों को बताए बिना 'विकासकर्ता' जल-विद्युत परियोजनाओं के निर्माण के लिए पहाड़ों में पहुंच रहे हैं।

जहां इस तरह के बांध बने हैं, वहां के लोगों ने पानी के बिना मुर्दा घाटों की पवित्रता और पारंपरिक जल- संस्कृति को लेकर सवाल उठाए हैं। लोगों को डर है कि टिहरी जैसा विशालकाय बांध तो नहीं बन रहा, जिसके कारण उन्हें भारी विस्थापन की मार झेलनी पड़े। सरकार का मानना है कि सुरंग आधारित बांधों से विस्थापन नहीं होगा, परंतु सुरंग के 'आउटलेट' और 'इनलेट' पर बसे सैकड़ों गांवों की सुरक्षा कैसे होगी, इस बारे में परियोजनाओं की डीपीआर (डीटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) भी कुछ नहीं कहती। सन् 1991 के भूकंप के समय उत्तरकाशी में मनेरी-भाली जल-विद्युत परियोजना की टनल के ऊपर के गांव जमींदोज हुए थे और कृषि भूमि की नमी कम हुई थी।

पहाड़ों में सुरंगों के निर्माण में भारी विस्फोटों से लोगों के घरों में दरारें आई हैं, पेयजल स्रोत सूख गए हैं और नदियों को डंपिंग यार्ड बना दिया गया है। सिंचाई नहरों तथा घराटों (एक तरह की चक्की) का पानी बंद हुआ है। चारागाह व जंगल बांध निर्माणकर्ताओं के अधिकार में हो गए हैं। साथ ही लघु एवं सीमांत किसानों की खेतीबाड़ी अधिगृहित हुई है। ये कठिनाइयां उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के हिमालय क्षेत्र की नदियों के किनारे बसे समाज को झेलनी पड़ रही हैं।

इसके अलावा गांव के धारे (छोटे झरने) व जलस्रोत सूखे थे। इन्हीं कारणों से पहाड़ों पर पड़ी दरारों के कारण भू-स्खलन हो रहा है, लेकिन इसके बारे में 'पर्यावरण प्रभाव आकलन' (इन्वायरनमेंट इंपैक्ट असेसमेंट) रिपोर्ट कुछ भी नहीं कहती। कहा जाता है कि पंचायतों और गांवों की क्षमता पैसों की कमी के कारण घट रही है और इसलिए बांध निर्माता कंपनियों की पहचान 'विकासकर्ता' के रूप में बनाई जा रही है। हालांकि इस तरह से गांव की व्यवस्था को अक्षम समझना बड़ी भूल है। इसी के चलते पूरी परियोजना स्थानीय कसौटी पर खरी नहीं उतर पा रही। मसलन-पहाड़ों में निर्मित व प्रस्तावित जल-विद्युत परियोजनाओं के निर्माण में स्थानीय लोगों को कम समय के लिए न्यूनतम रोजगार दिया जाता है। हिमालयी नदियां पूरे विश्व में जलभंडार के रूप में प्रसिद्ध हैं, लेकिन विकास और समृद्धि के दावों ने नदी धाराओं के प्राकृतिक प्रवाह को बांधों से बाधित कर दिया है। इनसे नदियों का अस्तित्व ही खतरे में हैं और वर्षा-पोषित एवं हिम-पोषित तमाम नदियों पर संकट खड़ा हो गया है। इस भू-भाग की संवेदनशीलता को नजरअंदाज करते हुए बनाए जा रहे करीब 560 बांधों से भागीरथी, यमुना, टौंस, अलकनंदा, भिलंगना, सरयू, महाकाली, मंदाकनी आदि पवित्र नदियों पर संकट मंडरा रहा है और वर्षा-पोषित कोसी, रामगंगा व जलकुर आदि नदियों का पानी निरंतर सूख रहा है।

इसको ध्यान में रखें, तो नदियों के उद्गम से लेकर आगे लगभग 100 किलोमीटर से अधिक तक श्रृंखलाबद्ध दर्जनों सुरंग बांधों का निर्माण खतरनाक संकेत दे रहा है। सुरंग के ऊपर आए उत्तराखंड के अनेक तटवर्ती गांव, चाहे वे सिंगोल-भटवाड़ी, फाटा ब्यूंग (70 मेगावाट) हो या विष्णुगाड-पीपलकोटी (444 मेगावाट), भिंलग-घुतू जल विद्युत परियोजना (24 मेगावाट) हो या श्रीनगर जल-विद्युत परियोजना (330 मेगावाट), का प्रारंभ से ही विरोध कर रहे हैं। पहाड़ों में सुरंगों के निर्माण में भारी विस्फोटों से लोगों के घरों में दरारें आई हैं, पेयजल स्रोत सूख गए हैं और नदियों को डंपिंग यार्ड बना दिया गया है। सिंचाई नहरों तथा घराटों (एक तरह की चक्की) का पानी बंद हुआ है। चारागाह व जंगल बांध निर्माणकर्ताओं के अधिकार में हो गए हैं। साथ ही लघु एवं सीमांत किसानों की खेती-बाड़ी अधिगृहित हुई है। ये कठिनाइयां उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के हिमालय क्षेत्र की नदियों के किनारे बसे समाज को झेलनी पड़ रही हैं। इसका विकल्प है, हिमालय क्षेत्र में ही सिंचाई नहरें और घराट, जिनमें पानी की उपलब्धता के आधार पर छोटी टरबाइनें लगाकर हजारों मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है।

इसके लिए सरकार को ऐसी जलनीति बनानी चाहिए, जिसमें ग्राम पंचायतों से लेकर जिला पंचायतों तक की भागीदारी हो। टिहरी जनपद की सर्वोदयी संस्था 'लोक जीवन विकास भारती' की प्रेरणा से दो-तीन स्थानों पर सिंचाई नहर से छोटी पनबिजली बनाकर उदाहरण भी प्रस्तुत किए गए हैं। यह काम लोगों के लिए, लोगों द्वारा कराया जाए, तो बेरोजगारी भी समाप्त की जा सकेगी। मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों को शायद ही पता हो कि हिमालय में हम खुद जानबूझकर अपने लिए भारी पर्यावरणीय आपदा रच रहे हैं। कई नामी-गिरामी वैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की चेतावनियों को अनसुना कर इस सबसे नए, 'बच्चे' पहाड़ से निकलने वाली अनेक नदियों पर सैकड़ों बांध बनाकर मैदानी इलाकों और खुद पहाड़ों को खतरे में डाला जा रहा है। नदियों के स्वभाव से चिर-परिचित किनारे के समाज से पूछकर ऐसी बांध परियोजनाएं बनाई जातीं, तो संभवत: इनका कोई विकल्प सूझ सकता था।    

  • सुरेश भाई
     
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