पोषण से भरपूर सब्जी अरबी

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जलवायु

अरबी को गर्म और आद्र्र जलवायु की आवश्यकता होती है। यह ग्रीष्म और वर्षा दोनों मौसम में उगाई जाती है। उत्तरी भारत की जलवायु अरबी के लिए उपयुक्त है वैसे इसे उष्ण और उपोष्ण देशों में उगाया जा सकता है।

भूमि की तैयारी

अरबी के लिए पर्याप्त जीवांश एवं उचित जल निकास युक्त रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। खेत की तैयारी के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से और तीन-चार बार देशी हल से जुताई करें। खेत की तैयारी के समय 250 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से अरबी बुवाई के 15-20 दिन पहले खेत में मिला दें।

उर्वरक

मृदा जांच के उपरांत ही उर्वरकों का प्रयोग करें। अधिक उपज प्राप्त करने के लिए नाइट्रोजन 100 कि.ग्रा., फॉस्फोरस 60 कि.ग्रा. तथा पोटाश 80 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें और नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फॉस्फोरस व पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा बुवाई के पूर्व खेत में मिला दें। शेष नाइट्रोजन को दो बराबर भागों मे बांटकर बुवाई के 35-40 दिन और 70 दिनों बाद खड़ी फसल में टॉप-ड्रेसिंग के रूप में दें।

अरबी को घुईयां, कुचई आदि नामों से भी जाना जाता है। इसकी खेती मुख्यत: खरीफ मौसम में की जाती है लेकिन सिंचाई सुविधा होने पर गर्मी में भी की जाती है। इसकी सब्जी आलू की तरह बनाई जाती है तथा पत्तियों की भाजी और पकौड़े बनाए जाते हैं उबालने पर इसकी खुजलाहट समाप्त हो जाती है। कंद में प्रमुख रूप से स्टार्च होता है। आसानी से मिल जाने के बावजूद अरबी बहुत अधिक लोकप्रिय सब्जी नहीं है पर इसके फायदे चौंकाने वाले हैं। ये फाइबर, प्रोटीन, पोटेशियम, विटामिन ए, विटामिन सी, कैल्शियम और आयरन से भरपूर होती है। इसके अलावा इसमें भरपूर मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट भी पाए जाते हैं।

बोने का समय 

खरीफ जून से 15 जुलाई और जायद फरवरी-मार्च में बुवाई की जाती है

 बीज की मात्रा एवं बीजोपचार

बुवाई के लिए अंकुरित कंद 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की जरूरत पड़ती है। बोने से पहले कंदों को कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत  मेन्कोजेब 63 प्रतिशत डब्ल्यूपी 01 ग्राम/लीटर पानी के घोल में 10 मिनट डुबोकर उपचारित कर बुवाई करें।

बोने की विधि

समतल क्यारियों में- कतारों की आपसी दूरी 45 सेमी. तथा पौधे की दूरी 30 सेमी. और कंदों की 05 सेमी. की गहराई पर बुवाई करें।

मेड़ बनाकर- 45 सेमी. की दूरी पर मेड़ बनाकर दोनों किनारों पर 30 सेमी. की दूरी पर कंदों की बुवाई करें। बुवाई के बाद कंद को मिट्टी से अच्छी तरह ढंक दें।

उन्नत किस्में

पंचमुखी, सफेद गौरिया, सहस्रमुखी, सी-9, बापटला सलेक्शन प्रमुख हैं।

सिंचाई  

खरीफ में अरबी को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। अच्छे उत्पादन हेतु बरसात न होने पर 10-12 दिन के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें।

निराई-गुड़ाई

खरपतवारों को नष्ट करने के लिए कम से कम दो बार निंदाई-गुड़ाई करें तथा अच्छी पैदावार के लिए दो बार हल्की गुड़ाई जरूर करें। पहली गुड़ाई बुवाई के 40 दिन बाद व दूसरी 60 दिन के बाद करें। फसल में एक बार मिट्टी चढ़ा दें। यदि तने अधिक मात्रा में निकल रहे हों, तो एक या दो मुख्य तनों को छोड़कर शेष सब की छंटाई कर दें।

खुदाई एवं उपज         

अरबी की खुदाई कंदों के आकार, प्रजाति, जलवायु और भूमि की उर्वराशक्ति पर निर्भर करती है। साधारणत: बुवाई के 130-140 दिन बाद जब पत्तियां सूख जाती हैं तब खुदाई करें। उन्नत तकनीक का उपयोग करने पर 300-400 क्विंटल/ हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो सकती है।

भण्डारण    

अरबी के कंदों को हवादार कमरे में फैलाकर रखें। जहां गर्मी न हो। इसे कुछ दिनों के अंतराल में पलटते रहें। सड़े हुए कंदों को निकालते रहें और बाजार मूल्य अच्छा मिलने पर शीघ्र बिक्री कर दें।

पौध संरक्षण

झुलसा रोग: झुलसा रोग से पत्तियों में काले-काले धब्बे हो जाते हैं। बाद में पत्तियां गलकर गिरने लगती हैं। इसका उपज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसकी रोकथाम के लिए 15-20 दिन के अंतर से डाईथेन एम-45, 2.5 ग्राम/लीटर या कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत मेन्कोजेब 63 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर पानी के घोल का छिड़काव करते रहें। साथ ही फसल चक्र अपनाएं।

 

 

सूंडी व मक्खी कीट :  अरबी की पत्तियों को खाने वाले कीड़ों सूंडी व मक्खी कीड़ों द्वारा हानि होती है क्योंकि यह कीड़े नई पत्तियों को खा जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. साइपरमेथ्रिन 3 प्रतिशत ई.सी. 01 मिली. लीटर या ट्रायजोफॉस 40 प्रतिशत ई.सी. 2 मिली./लीटर पानी का 500 ली./हे. घोल बनाकर छिड़काव करें।

 

 

  • रूपाली पटेल 

    असम कृषि विश्वविद्यालय, जोरहट
    email : roopalipatel847@gmail.com

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