खेती की रीढ़ - बैल

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बैलों में होने वाले रोग, चिकित्सा-बचाव

योक गॉल /गर्दन या कंधा का घाव

यह चमड़े अथवा चमड़े के नीचे होने वाला तीव्र प्रकृति का एक स्थानीय सूजन/शोथ है जो कार्य करने वाले बैलों के एवं भैंसों के गर्दन के ऊपरी भाग पर जुड़ा के लगातार रगड़ से उत्पन्न होता है। भारवाही बैल एवं भैंस जिनका उपयोग भार ढोने के लिए किया जाता है इस रोग से अधिक पीडि़त होते हैं।

कारण:

  • उबड़ खाबड़ रास्ता एवं आवश्यकता से अधिक बोझ।
  • कम उम्र के पशु की गर्दन की नाजुक त्वचा।
  • लम्बे समय तक लगातार कार्य लेना।
  • खुरदरी सतह वाला घाव
  • बैल जोड़ी का सही चुनाव नहीं होना।

लक्षण: गर्दन को ऊपरी भाग में सूजन का आकार क्रिकेट गेंद के आकार से लेकर फुटबॉल के आकार तक का हो सकता है। प्रारंभ में सूजन गर्म एवं दर्दयुक्त होना, छूने पर नर्म अथवा कड़ा होना संक्रमण के कारण सूजन का फोड़ा में परिवर्तन होना प्रभावित जगह पर विसरित कोशिका शोध के कारण चमड़े का सिकुड़ जाना।

चिकित्सा एवं बचाव:

  • पशु को आराम दें।
  • बर्फ के पानी/बर्फ से सिंकाई करें।
  • सूजनयुक्त भाग में आयोडिन लगायें।
  • गंभीर स्थिति में पशु चिकित्सक को दिखायें।
  • पशु चिकित्सक की सलाह लेकर (एस्पिरिन, आइबुप्रोफेन, इन्डोमेथसिन आदि) दवा इंजेक्शन द्वारा दें।

कमजोरी

जब पशु को उसके शारीरिक आवश्यकता से कम आहार मिलता है अथवा अच्छी गुणवत्ता वाला आहार नहीं मिलता है तो उनमें कमजोरी आ जाती है। अच्छी गुणवत्ता वाले भोजन का तात्पर्य ऊर्जा एवं प्रोटीनयुक्त आहार से है ।

लक्षण:

  • शारीरिक भार में कमी।
  • लम्बी दूरी तक नहीं चल पाना।
  • पशुु खड़ा नहीं हो पाना।

बचाव:

  • बैलों को प्रोटीन एवं ऊर्जायुक्त दाना मिश्रण खिलायें।
  • कार्य लेने की अवधि के अनुसार दाना मिश्रण खिलायें।    
  • प्रतिदिन के आहार में मिनरल मिक्सचर अवश्य मिलायें।    
  • प्रतिदिन 50 ग्राम नमक खिलायें।    

झनका /टनका रोग/स्ट्रिंग हाल्ट:

यह बैलों के पिछले पैरों के अनियमित चाल की बीमारी है। इसमें पशु एक या दोनों पैरों से झटका मारकर या खींचकर अथवा खुर रगड़कर चलता है।

कारण: यह रोग स्टीफल सन्धि के लिगामेंट के दोष के कारण होता है। यह संधि घुटने और कूल्हा संधि के बीच का स्थान है।

लक्षण:

  • पशु खड़ा होने के बाद एक या दोनों पैरों से झटका देकर या खुर रगड़कर चलता है ऐसा तभी होता है जब पशु देर तक बैठा रहता है।
  • पशु को चलने में कष्ट होता है, परन्तु कुछ दूर चलने पर चाल में सुधार हो जाता है।
  • खुर रगड़कर चलने से खुर घिस जाता है।
  • उपचार- शल्य चिकित्सा।

लू लगना/हीट स्ट्रोक

यह अत्यधिक शारीरिक ताप की बीमारी है। इससे प्रभावित पशु में लंगड़ापन तीव्र श्वांस गति, बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

कारण:

  • धूप के कारण अधिक गर्मी लगना। 
  • गर्मी में बैलों से अधिक काम लेना।
  • गर्म जगह में बंद करके रखना।
  • गर्मी के मौसम में पानी कम पिलाना।

लक्षण:

  • पशु सुस्त हो जाता है।
  • पसीना निकलना बंद हो जाता है।
  • शरीर का तापक्रम बढ़कर 106-110 डिग्री फॉॅरेनहाइट तक हो जाता है।
  • नाड़ी गति तीव्र हो जाती है। श्वसन गति बढ़ जाती है।
  • मुंह खोल कर सांस लेता है।
  • नथूनों एवं मुख से झागदार स्राव निकलता है।
  • जीभ को बाहर निकालता है।
  • पेट में दर्द एवं अतिसार होता है, लडख़ड़ाकर चलता है।
  • पशु व्यग्र होता है, मूर्छित होता है बेहोश भी हो जाता है।
  • यह अवस्था दो-तीन घंटों से लेकर तीन-चार दिनों तक होती है।
  • उचित चिकित्सा नहीं करने पर पशु कोमा में चला जाता है एवं मृत्यु हो जाती है।

बचाव:

  • बैलों को गर्मी के दिनों में छायादार जगह पर रखें।
  • बैलों से गर्मी के मौसम में 11.00 बजे के बाद एवं 11.00 बजे के पहले काम न लें।
  • अत्यधिक काम नहीं ले। एक घंटे के बाद कुछ मिनट के लिए विश्राम करने दें।
  • बैलों का बाड़ा हवादार एवं ठंडा रखें।
  • गर्मी के मौसम में पानी की मात्रा बढ़ा दें।

उपचार:

  • पशु को छायादार तथा रोशनदान युक्त कमरे में अथवा छायादार जगह पर रखें।
  • कमरे के सभी दरवाजे तथा खिड़कियां खुली रखें।
  • संभव हो तो पंखों की व्यवस्था करें।
  • पशु के सामने बर्फ का टुकड़ा चूसने के लिए रखें।
  • शरीर का ताप कम करने के लिए माथे पर बर्फ रखें अथवा ठंडा पानी डालें अथवा ठंडे पानी से स्नान करायें। 
  • बर्फ के टुकड़े को पशु के शरीर पर रगड़ें।
  • पीने के लिए बर्फ मिला अथवा ठंडा पानी दें। 
  • पानी में नमक मिलायें।
  • यदि पशु के शरीर में पानी की कमी हो गई हो तो शिरा द्वारा सलाइन ड्रिप दिलवायें।
  • गंभीर स्थिति में पशु चिकित्सक की सलाह पर पैरासेटामोल, स्टेरॉइड तथा ब्राड स्पेक्ट्रम एन्टीबायोटिक दवा इंजेक्शन द्वारा दें।

न्यूमोनिया 

कृषि क्षेत्र में मशीनीकरण के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न कृषि कार्यों एवं कृषि उपज तथा सामानों की ढुलाई हेतु बैलों एवं बैलगाड़ी का उपयोग किया जाता है। ग्रामीण परिवेश विशेषकर दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में बैल ही कृषि कार्य हेतु 'रीढ़ की हड्डी' है। पशु ऊर्जा पर स्वास्थ्य का धनात्मक प्रभाव पड़ता है। अस्वस्थ पशु विभिन्न कार्यों हेतु अपनी ऊर्जा का उपयोग करने में असमर्थ होता है। पशुओं से समुचित कार्य लेने हेतु उनमें होने वाली बीमारियों के लक्षणों को पहचानकर त्वरित उपचार अत्यन्त आवश्यक है। बैलों में होने वाले रोगों के लक्षण को पहचानकर उनकी चिकित्सा करने से उनकी ऊर्जा का समुचित उपयोग किया जा सकता है एवं बचाव संबंधित उपाय  अपनाकर बैलों को रोगों से बचाया जा सकता है। कुछ रोग ऐसे हैं जो सामान्यत: कार्य करने वाले बैलों में देखे जाते है। जिनका उल्लेख प्रस्तुत लेख में किया गया है-

कारण:

  • वातावरण में एकाएक परिवर्तन होने के कारण जीवाणुओं के संक्रमण के कारण।
  • शिष्ट रोग जैसे गलघोटू, पोंकनी आदि के कारण।
  • परजीवी जैसे फेफड़ा कृमि के कारण।

लक्षण:

  • शरीर में कंपकंपी एवं थरथराहट होना।
  • शरीर का तापक्रम बढ़ जाना 104-107 डिग्री फारेनहाइट।
  • तेज एवं कष्ट दायक श्वांस।
  • नाक बहना, नाक का स्राव हल्का भूरा अथवा कुछ लाल होना।
  • सांस लेते समय घुर्र-घुर्र की आवाज।
  • कष्टदायक कफ - खांसी।
  • पशु का दुर्बल होते जाना।
  • बैलों के काम करने की क्षमता में कमी।
  • खाना-पीना बंद कर देना।
  • अतिसार एवं कमजोरी।

उपचार:

  • पशु को पूर्ण आराम दें।
  • हवादार रोशनीयुक्त जगह पर रखें।
  • एक बाल्टी खौलते पानी में तारपिन तेल युकलिप्टस तेल टिंचर कैम्फर या टिंचर बेन्जोइन 30 मि.ली. डालकर पशु के सिर पर एक कपड़ा डालकर नाक से सुंघायें।
  • एनालिजन/नोवाल्जिन 30 मिली  मांस में दें।
  • एक्सपेक्ट्रोवैट कफलोन/कैटलफ/ वेटकफ /एक्सपेल्टोवे आदि में से कोई एक 30 ग्राम दिन में दो बार खिलायें। एन्टीबायोटिक जैसे ऑक्सीटेट्रासाइक्लोन, टेरामाइसिन, ऑक्सीमेट इत्यादि एन्टीबायोटिक 20-30 मिली. मांस में दे।

 

  • डॉ. नीलमणि केरकेट्टा 
  • डॉ. व्ही.एम. विक्टर 
  • इंजी. समीर शांतैया 
  • इंजी. अखिलेश कुमार चंद्राकर 
  • पशु ऊर्जा उपयोग पर अखिल भारतीय समन्वित परियोजना, स्वा. वि. कृ. अभि. एवं प्रौद्यो. महावि. एवं अनु. के., इं. गां. कृ. वि.वि., रायपुर (छ.ग.)
  • email :neelmani.kerketta @ yahoo. com
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