चने की विपुल उत्पादन किस्मों का जेनेटिक कोड जाना

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विश्व के वैज्ञानिकों ने मिलकर

हैदराबाद। दुनिया भर के 21 शोध केन्द्रों के वैज्ञानिकों ने मिलकर 45 देशों की 429 चने की किस्मों चिकपी लाईन्स की अनुक्रमणिका तैयार कर ली है। ये किस्में सूखे एवं गर्मी के प्रति सहिष्णु है। अध्ययन में चने की अनुवांशिक विविधता, अनुकूलन व अन्य लक्षणों का महत्वपूर्ण अध्ययन किया।

इस अध्ययन में चने का उद्गम और एशिया व अफ्रीका में प्रवेश पर भी प्रकाश डाला गया। इन्टरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सेमी एरिड ट्रॉपिक्स (इक्रीसेट) हैदराबाद के नेतृत्व में बीजिंग जीनोमिक्स इंस्टीट्यूट चीन ने मिलकर प्रमुख अनुसंधान संस्थानों के 39 वैज्ञानिकों को टीम में शामिल किया। इसमें भारत से इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएआरआई), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअप), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पल्सेस रिसर्च कानपुर, यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज बैंगलुरू, उस्मानिया यूनिवर्सिटी हैदराबाद शामिल थे। इसके अलावा आस्ट्रेलिया, केनेडा, फ्रांस, यूएसए, साउथ कोरिया आदि देशों के शोध संस्थान भी चने की उच्च पैदावार वाली चने की किस्मों के पुर्नअनुक्रमणिका के अध्ययन में संलग्न थे।

90 प्रतिशत से अधिक चने की खेती दक्षिण एशिया में है। एक अनुमान के मुताबिक सूखे और बढ़ते तापमान के कारण चने की खेती में दुनिया भर में 70 प्रतिशत से अधिक उत्पादकता का नुकसान होता है और लगातार बढ़ते तापमान के कारण चने की उत्पादकता में और कमी होने की संभावना है। इस अनुसंधान के प्रोजेक्ट लीडर व जेनेटिक गेन्स इक्रीसेट के रिसर्च प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. राजीव वाष्र्णेय के मुताबिक जीनोम वाईड एसोसिएशन के अध्ययन ने 13 एग्रोनॉमिक लक्षणों के लिए कई संभावित जींस की पहचान की है, जैसे- REN1, B-2, 3- ग्लूसेस, REF6 जीन्स जो 38 डिग्री तक तापमान को सह सकती है और विपुल उत्पादन देती है।

भारत दलहन में आत्मनिर्भर होगा

इक्रीसेट के डायरेक्टर जनरल डॉ. पीटर कारबेरी के अनुसार इस नई शोध के परिणामों से सीड ब्रीडर को विविध जर्मप्लाज्म और संभावित जींस के उपयोग को बढ़ाकर उन्नत किस्में विकसित करने में मदद मिलेगी ताकि विकासशील देशों में कृषि उत्पादकता में वृद्धि और सस्टेनेबल कृषि विकास हो।

उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया में दालों के सबसे बड़े उपभोक्ता के रूप में उत्पादन की बढ़ती खाई का सामना कर रहा है। यह नया शोध भारत को दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के करीब ले जा सकता है।

विश्व कृषि में महत्वपूर्ण योगदान

डॉ. त्रिलोचन महापात्रा, महानिदेशक आईसीएआर व सचिव डेयर ने कहा कि ये वैश्विक कृषि अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण योगदान है और ये अद्वितीय वैज्ञानिक समाधान दुनिया को अभी झेल रहे मुद्दों को कम करने में मदद करेंगे। आईसीएआर और इक्रीसेट के साथ ही देश में कृषि के लिए आगे बढऩे के प्रयासों के लिए विज्ञान एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

इक्रीसेट गवर्निंग बोर्ड मीटिंग

गत अप्रैल से इक्रीसेट की गवर्निंग बोर्ड में अनुसंधान के लक्ष्य पूरा करने, भागीदारी विकसित और पोषित करने और संस्थान की भविष्य की दिशा पर चर्चा की गई। बैठक में बोर्ड सदस्यों ने कृषि में विज्ञान और नवाचार के योगदान में इक्रीसेट द्वारा की गई प्रगति का समर्थन किया। साथ ही संस्था के लिए भविष्य की रूपरेखा पर मूल्यवान सुझाव भी दिए। प्रोग्राम कमेटी के चेअरमैन डॉ. वेंडी अम्बप्जेर ने आगामी वर्षों के लिए इक्रीसेट की समग्र रणनीति के लिए विभिन्न परियोजनाओं के तहत किए गए कार्यों को परस्पर लिंक करने के महत्व पर जोर दिया।

डॉ. पीटर कारबेरी डायरेक्टर जनरल इक्रीसेट ने CGIAR 2019-21 के बिजनेस प्लान के परिप्रेक्ष्य में '10 एक्शन' को प्रस्तुत किया। आईसीएआर के महानिदेशक और बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. त्रिलोचन महापात्रा ने NARS भागीदारों के साथ निकट से परस्पर जुडऩे की आवश्यकता के बारे में बात की।

 

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