मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना

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देश को अंतत: 20 मार्च 2019 को लोकपाल मिल ही गया। लोकपाल की मांग को लगातार जिन्दा रखने में समाजसेवी, रालेगांव सिद्धी के अन्ना हजारे की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह नियुक्ति देश में चलती लोकसभा चुनावों की मौजूदा प्रक्रिया के बीच हुई है। साथ ही इसी समय मैं भी बेरोजगार हूं जतलाने की भी होड़ लगी है। ऐसे में मैं भी अन्ना हूंं, के उद्घोष के माहौल का स्मरण प्रासंगिक हेागा। हालांकि स्वार्थपरक राजनीति ने उस माहौल को पनपने नहीं दिया, नहीं तो कोई कारण नहीं था कि सालों पहले  संसद में पारित लोकपाल कानून के बावजूद अब तक लोकपाल या कई राज्यों में लोकायुक्तों के ना होने पर भी कोई जनाक्रोश नहीं उभरता। 

सालों पहले भ्रष्टाचार के विरूद्ध आक्रोश को अन्ना ने देशव्यापी आन्दोलन व अभियान का स्वरूप दिया था। आज की तरह मैं चौकीदार हूं या मैं बेरोजगार हूं जैसे सोशल मीडिया में चलाए जाने वाले खोखले, प्रचारात्मक अभियानों की बाजए उन दिनों स्व:स्फूर्त आन्दोलनकारियों के सिर पर रखी हजारों गांधी टोपियों पर लियाा रहता था कि मैं अन्ना हूं।  स्थितियों को भांपते अन्ना ने भी तब खुले मंचों से कैमरों के सामने कई बार कहा कि ये सब अन्ना है। सवाल तब भी कि ऐसे में अपने को अन्ना बतलाना व अन्ना-सा व्यवहार करना क्या लोगों को अन्ना बना पायेगा ? पिछली गलतियों के लिए उनमें ग्लानि बोध जगा  पायेगा? क्या ऐसी ही चिंता मैं भी  चौकीदार हूं का तगमा लगाए लोगों में भी हो सकती है ? 

मैं अन्ना हूं-एक सकारात्मक, ताकतवर वक्तव्य था। कल्पना कीजिए , कीजिए किसी कार्यालय में एक व्यक्ति की, उस मेज, उस कुर्सी तक पहुंच जाने की जहां कागजों, फाइलों को सिक्कों के पहिए ही चलाते हों। वहां पहुंचकर वह व्यक्ति कहे कि मैं अन्ना हूं। ऐसे में उस मेज तक और उसके पास के लोगों में आज भी क्या संदेश जायेगा? शायद यही कि वह व्यक्ति अपने अधिकार से, अपने हक को बिना लिए दिए पाने का संकल्प जतला रहा है। बेशक, उसमें यह धमकी भरा भाव नहीं होगा कि जानते नहीं मैं कौन हूं, मैं किसको जानता हूं अथवा मेरी पहुंच  कहां तक है। ऐसा कहना व जतलाना भी भ्रष्टाचार की परिधि कहां कहां तक है।  

करीब 48 साल बाद पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति पीसी घोष की अध्यक्षता में देश को पहली बार सरकारी संस्थानों में भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने की खातिर लोकपाल नामक संस्थान मिला है। तरह-तरह की लंबी मशक्कत के बाद क्रियान्वित हुए इस कानून को अमलीजामा पहनाने में समाजसेवी अन्ना हजारे की भी अहम भूमिका रही है। प्रस्तुत है, लोकपाल के लिए अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि में आज के हालातों पर वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली का लेख। 

अब जरा आगे बढ़े। कल्पना कीजिए कि उस व्यक्ति के साथ या उसके बाद भी लगातार कई पीडि़त व प्रभावित ऐसी ही चांदी के पहियों से चलने वाली मेजों तक पहुंच  रहे हों और कह रहे हों कि मैं अन्ना हूं तो क्या होगा? एक बदलाव आ जायेगा। उन कुर्सी-मेज संभाले व्यक्तियों को भी कभी न कभी अपने कामों से कहना सुनना और दिखाना होगा कि वे भी अन्ना हैं। उनके मुंह से भी निकलेगा - मैं भी अन्ना हूं। किन्तु यदि जब तक ऐसा न हो, तब तक ऐसी भ्रष्ट मेजों व दफ्तरों तक पहुंचने वाला हर व्यक्ति यदि कहने लगे कि मैं भी अन्ना, तुम भी अन्ना, तो देर सबेर एक क्रांतिकारी परिवर्तन जरूर उपजेगा। 

जब मैं भी अन्ना तुम भी अन्ना का उद्घोष सभी जगह होने लगेगा तो ऐसी स्थितियों में यह बहाना या बेबसी के ये सुर बन्द हो जायेंगे कि हमें तो यह सब ऊपर तक पहुंचाने के लिए करना होता है। तब शायद चौराहों और मेजों के लिये बोली लगना बन्द हो जायेगी। किन्तु तब ऐसा भी होगा कि  ट्रैफिक का सिपाही कानून तोडऩे वालों की तो एक न सुने, पर उल्टा उन्हें यह सुना दे कि मैं भी अन्ना हूं। ये क्या बदलाव नहीं होगा ? 

मतदाता यदि नेताओं के शराब, पैसों के प्रलोभनों का जवाब यह कहकर देने लगे कि मैं भी अन्ना हूं तो क्या होगा। परंतु यह सब तब होता है जब अन्ना के समर्थन में मोमबत्ती जलाने वाले रैलियों, जुलूसों में शामिल होने वाले शुरूआत में ही अपने से यह सवाल ईमानदारी से करें कि क्या वाकई मैं भी अन्ना हूं। अन्यथा भीड़ में यदि वही चेहरे दिखते हैं जो शोषक रहे  हैं, भ्रष्ट रहे हैं तो एक बड़े बदलाव के साथ चलने की इच्छा रखने वालों को भारी धक्का लगता है। अन्ना भी शायद यह समझते थे, तभी तो वे मंच से यह भी चेताते थे कि ऐसा कुछ न करें कि जिससे आंदोलन बदनाम हो। यह डर सच होता दिखा भी था। मैं भी अन्ना हूं की टोपी लगाये लोग हुड़दंगी भी निकले, शराबी भी निकले। जिस मंच से सामने की भीड़ को अन्नाओं की भीड़ बताया जा रहा था, उसी मंच से यह कहना पड़ा कि मैं अन्ना हूं की टोपी लगाये हर व्यक्ति अन्ना नहीं है। सच यह भी है कि रावण ने साधु भेष में ही सीता हरण किया था।  
(सप्रेस)

  • वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली
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