जैविक खेती आज की आवश्यकता

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आज व्यवसायिक खेती के नकारात्मक पहलुओं, कृषि आदानों की बढ़ती कीमतों एवं टिकाऊपन को बढ़ावा देने वाली वैकल्पिक कृषि की खोज के बढ़ते प्रयासों के मद्देनजर जैविक खेती एक महत्वपूर्ण विकल्प है। जैविक खेती, खेती का एक उन्नत तरीका है, जिसमें भूमि की सजीवता, जल की गुणवत्ता एवं जैव विविधता आदि को बनाये रखते हुए दीर्घकाल तक पर्यावरण को प्रदूषित किये बिना टिकाऊ उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। विश्व के लगभग 164 देशों में प्रमाणित जैविक खेती की जा रही है। वर्ष 2012 में विश्व में 37.5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल जैविक खेती में था। भारत में वर्ष 2003 से 2012 के दौरान जैविक खेती के क्षेत्रफल में लगभग 35 गुना वृद्धि हुई। अब नीति आयोग के अनुसार भारत के कुल कृषि क्षेत्रफल का 20-25 प्रतिशत जैविक खेती के अंतर्गत लाया जा सकता है।

राजस्थान में लगभग 2,17,712 हेक्टेयर क्षेत्रफल में जैविक खेती की जा रही है। राजस्थान में जैविक खेती में आसानी से परिवर्तन की परिस्थितियां विद्यमान है लेकिन फसलों के लिए जैविक आगतों की उपलब्धता, प्रमाणीकरण की लागत तथा बाजरे में जैविक उत्पादों के सही मूल्य का अभाव इस प्रदेश में जैविक खेती को आगे बढ़ाने में मुख्य बाधाएं हैं। अत: राज्य सरकार द्वारा विभिन्न फसलों एवं पद्धतियों के लिए उन्नत जैविक खेती की उन्नत तकनीकों के विकास के लिए राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों की एक अनुसंधान परियोजना स्वीकृत की गई है।

जैविक खेती की सामान्य शस्य क्रियाएं

  • गर्मी की गहरी जुताई करें।
  • उपयुक्त फसल चक्र अपनाएं तथा फसल चक्र में दलहनी फसलों का समावेश सुनिश्चित करें।
  • विभिन्न फसलों में सिफारिश अनुसार ही जैविक उर्वरकों का उपयोग करें।
  • भूमि में जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिए हरी खाद का प्रयोग करें।
  • पौधों के पोषण के लिए विभिन्न जैविक खादों का प्रयोग करें।
  • फसल अवशेष को खेती में मिला दें।
  • रसायनिक तत्वों से मुक्त जल द्वारा फसलों की सिंचाई करें।
  • खरपतवार नियंत्रण हेतु समय पर निराई-गुड़ाई, समय पर बुवाई की सही विधि, फसल चयन एवं अंत:शस्य आवश्यक है।
  • फसलों की रोग प्रतिरोधक किस्मों का प्रयोग करें।
  • रोग नियंत्रण हेतु बीजोपचार जैसे सूर्य किरण/ गर्म जल से उपचार, ट्राइकोडर्मा का उपयोग आदि।
  • कीट नियंत्रण के लिए जहां तक संभव हो स्थानीय स्तर से प्राप्त जैव अवशेषों जैसे नीम के पत्ते, नीम की निम्बोली, नीम/ करंज की खली इत्यादि का कीटनाशी के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

जैविक खेती क्या है: जैविक खेती एक ऐसी पद्धति है जिसमें रसायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों तथा खरपतवारनाशियों के स्थान पर जीवांश खाद्य पोषक तत्वों जैसे- हरी खाद, गोबर की खाद, केंचुए की खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु कल्चर, जैवनाशियों व बायो एजेंट्स जैसे क्राईसोपा आदि उपयोग किया जाता है जो कि आसपास के वातावरण, पशुओं तथा मानव जाति पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं डालते हैं। इसलिए कहते हैं कि -

जैविक खेती से बढ़ जाता है पशु, मानव एवं धरती का प्यार।
जीवांश पर निर्भर रहकर देती टिकाऊ खेती का आधार।

जैविक आदानों की आवश्यकता

किसी भी खेती को पारंपरिक खेती की ओर उन्मुख करने के लिए लिए सबसे पहला कदम है उस मिट्टी की खोई उर्वरता की पुनस्र्थापना। इसके लिए आवश्यक है रसायनिक उपादानों तथा जैविक प्रक्रियाओं का अधिकाधिक प्रयोग। पोषण प्रबंधन तथा मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ाने के लिए फसल अवशिष्ट, पशु मल, वनीय घासफूस व पत्ती कचरा, हड्डी खाद, बूचड़ खाने का अवशिष्ट तथा हरी खाद इत्यादि प्रमुख उपादान है। अच्छे परिणामों के लिए इन सभी जैविक पदार्थों का कम्पोस्ट में परिवर्तन आवश्यक है। किसी भी कम्पोस्ट की गुणवत्ता उसके कच्चे माल तथा कम्पोस्ट प्रक्रिया की गुणवत्ता पर निर्भर है।

जैविक खेती में उपयोग होने वाले प्रमुख खाद, तरल खाद एवं जैव कीटनाशी -

मुख्य खादें: गोबर की खाद, कम्पोस्ट, केंचुए की खाद वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद और नाडेप कम्पोस्ट।

जैव उर्वरक: राइजोबियम, एजोटोबेक्टर, एजोस्पारिलियम और पीएसबी।

तरल खादें: पंचगब्य, वर्मीवाश, गौमूत्र, कम्पोस्ट, मटका खाद, भभूत अमृत पानी, सींग खाद जैसे जैवगतिकी नुस्खा 500 तथा सिलिका खाद जैसे जैवगतिकी नुस्खा 501।

जैव कीटनाशी: ट्राइकोग्रामा, ट्राइकोडर्मा तथा विभिन्न नीम कीटनाशी।

जैविक खेती का महत्व

  • भूमि की उर्वराशक्ति में बढ़ोत्तरी एवं टिकाऊपन।
  • जैविक खेती प्रदूषण रहित।
  • कम पानी की आवश्यकता।
  • पशुओं का अधिक महत्व।
  • फसल अवशेषों को खपाने की समस्या नहीं।
  • गुणवत्ता की पैदावार।
  • कृषि मित्र जीव सुरक्षित एवं संख्या में बढ़ोत्तरी।
  • स्वास्थ्य में सुधार।
  • कम लागत एवं अधिक लाभ।

जैविक खेती के मार्ग में आने वाली बाधाएं

  • भूमि संसाधनों को जैविक खेती से रसायनिक खेती में बदलने में अधिक समय नहीं लगता लेकिन रसायनिक से जैविक में जाने में अधिक समय लगता है।
  • शुरुआती समय में उत्पादन में कुछ गिरावट आती है जो कि किसान सहन नहीं कर पाते। इस हेतु किसानों को प्रोत्साहन देना जरूरी है।
  • आधुनिक रसायनिक खेती में मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट कर दिया अत: निर्माण में 3-4 वर्ष लग सकते हैं।

 

  • डॉ. ममता देवी चौधरी 
  • डॉ. राम गोपाल सामोता 
  • कीट विज्ञान विभाग, श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि 
  • महाविद्यालय, जोबनेर (राजस्थान)
  • email : ramgopal.765@gmail.com 
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