मई में करें सोयाबीन के लिए खेत तैयार

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सोयाबीन की खेती के लिए भूमि की तैयारी करते समय भूमि में जैविक कार्बनिक पदार्थों का प्रतिशत भी ज्यादा से ज्यादा रखें। सोयाबीन के लिए ग्रीष्मकालीन जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य करें। वर्षा प्रारम्भ होने पर 2 या 3 बार बखर तथा पाटा चलाकर खेत को तैयार करें। इससे हानि पहुँचाने वाले कीटों की सभी अवस्थाएं नष्ट होंगी। ढेला रहित और भुरभुरी मिट्टी वाले खेत सोयाबीन के लिए उत्तम होते हैं। इन्ही सब बातों को ध्यान में रख कर किसान भाई अपने खेतों में जुताई, भूपरिष्करण आदि का कार्य मई माह में ही प्रारंभ कर देते हैं। 

गहरी जुताई

फसलों के यथोचित उत्पादन एवं पौधों के समुचित रूप से विकास के लिए भूमि की अच्छी तरह से समुचित जुताई आवश्यक है। प्रारंभिक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के उपरांत देशी हल से तब तक जुताई करें जब तक की मिट्टी की समतल भुरभुरी न हो जाये। जुताई के वक्त हरे खतपतवार को खेत से चुनकर निकल दें तथा खेत को समतल बना लें। क्योंकि खेत समतल रहने से पानी का वितरण सम्पूर्ण खेत में समान रूप से हो पाता है तथा पानी की अत्यधिक अथवा अनावश्यक जमाव को खेत से आसानी से निकाला जा सकता है प्रत्येक जुताई के पश्चात् खेत में पाटा चलाना भी आवश्यक हो जाता है। क्योंकि इससे खेत में नमी बनी रहती है। आखिरी जुताई से पूर्व खासकर रेतीली जमीन में दीमक से बचाव हेतु क्लोरोपायरीफॉस 1.5 प्रतिशत धूल का 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से या अन्य अनुसंशित दवा का भुरकाव भी करें। चिकनी मिट्टी वाले खेतों में वैसे ही दीमक का प्रकोप कम रहता है। 

मिट्टी की जांच

कृषि भूमि की मिट्टी की जाँच कराकर उसके आधार पर खेतों में पोषक तत्वों को भी दें। मिट्टी जाँच के अभाव में दलहनी फसलों में पोषक तत्व नत्रजन, फास्फोरस, तथा पोटाश 2:6:1 अनुपात में प्रयोग करें। नत्रजन, फास्फोरस तथा पोटाश पोषक तत्वों के अतिरिक्त सूक्ष्म पोषक तत्वों तथा जिंक, बोरोन, सल्फर और  लोहे की यदि कमी हो तो इसकी अनुसंशित मात्रा का उपयोग खेतों की तैयारी के समय करें। 

मई की प्रचंड लू भरी धूप एवं मानसून पूर्व की वर्षा के साथ ही किसानों को अपने खेतों की खरीफ फसलों की बुवाई हेतु प्रारंभिक तैयारी में लग जाना चाहिए ताकि वर्षा होने के साथ ही खरीफ फसलों की बुवाई की जा सके। सोयाबीन मध्य प्रदेश राज्य की प्रमुख तिलहनी खरीफ फसल है। और इसकी बुवाई के लिए खेत की तैयारी भी मई माह से ही प्रारंभ कर दें। सोयाबीन की खेती के लिए उचित जल-निकास वाली दोमट भूमि सबसे अच्छी रहती है। पर अम्लीय, क्षारीय अथवा खारे पानी वाली भूमि कतई अनुकूल नहीं होती। पानी के उच्च स्तर वाली भूमि में फाइटोप्थोरा कवक रोग का प्रकोप हो जाता है, अत: ऐसी भूमि पर सोयाबीन की खेती से बचें।

सल्फर का प्रयोग

खेत में जिंक की कमी को पूर्ण करने के लिए 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट, बोरोन की कमी को पूर्ण करने के लिए 10-15 किलोग्राम बोरेक्स तथा सल्फर की कमी पूरा करने के लिए 20-30 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर बुवाई के दौरान प्रयोग करें। लोहे की कमी से पौधों के पत्तों पर लोह पीलिया दिखाई पड़ता है। जिसको दूर करने के लिए 100 क्विंटल कम्पोस्ट या 50 किलोग्राम फेरस सलफेट अथवा 10 क्विंटल पायरेट प्रति हेक्टर दें। जहां तक संभव हो आखिरी बखरनी एवं पाटा समय से करें जिससे अंकुरित खरपतवार नष्ट हो सकें। 

रिज फरो में बुवाई

सोयाबीन की बुवाई का उचित समय जून के अंतिम सप्ताह में या जुलाई के प्रथम सप्ताह तक का है इस समय अच्छे अंकुरण हेतु भूमि में 10 सेमी गहराई तक उपयुक्त नमी होना अति आवश्यक है। बुवाई यथा संभव मेड़ और कूड़ रिज एवं फरो बनाकर करें। सोयाबीन की बुवाई कतारों में करें। कतारों की दूरी 30 सेमी (बोनी किस्मों के लिए) तथा 45 सेमी बड़ी किस्मों के लिए उपयुक्त है। 20 कतारों के बाद कूड़ जल निकास तथा नमी संरक्षण के लिए खाली छोड़ दें। बीज 2.5 से 3 सेमी. गहराई तक बोयें। बीज को खाद के ऊपर अलग अलग बोयें जिससे अंकुरण क्षमता प्रभावित न हो तथा खाद का उपयोग पौधे पूरी तरह कर सकें।

 

  • डॉ. महाराज सिंह, प्रधान वैज्ञानिक 
  • आई.सी.ए.आर.- भारतीय सोयाबीन अनुसंधान  संस्थान, इंदौर 
  • मो.: 09413112652
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