अन्नदाता बनें लोकतंत्र के निर्माता

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हवाई प्रलोभन में फंसा किसान

पिछले विधानसभा चुनावों में राजनैतिक दलों ने किसानों को कर्ज माफी के बड़े प्रलोभनों से अपनी सरकारों का गठन तो कर लिया है। लेकिन शनै: शनै: इन मुद्दों पर लगभग सभी राज्य सरकार अपनी घोषणाओं पर असफल होती दिखी है। जिस आक्रामक तरीके से मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में लगभग तीन माह पूर्व कांग्रेस ने सरकार गठन के दस दिन में किसानों के कर्ज माफ करने की बात की थी, वह सौ दिन में भी पचास फीसदी भी पूर्ण होती नहीं दिखी है। इसके पूर्व उ.प्र. एवं कर्नाटक में की गई घोषणाएं किसानों की उम्मीदों पर पूर्णता खरी नहीं उतरी है। केन्द्र की मोदी सरकार ने लगभग पांच वर्ष पूर्व सरकार के गठन के समय किसानों की आय को सन् 2022 तक दुगना करने का लक्ष्य रखा था। अब जब कि देश को सन् — 2022 में पहुंचने के लिये मात्र तीन वर्ष की अवधि शेष है। केन्द्र सरकार की ऐसी कोई दमदार योजना का लक्ष्य दिखाई नहीं देता है जो वर्ष 2022 तक किसानों की वर्तमान आय को दुगना कर दे! अच्छी नीतियों एवं कृषि में पर्याप्त बजट का टोटा एवं किसान की माली हालत सुधारने के उपेक्षित भाव ने ही देश के किसानों को आत्मघात करने को मजबूर किया है।

अनाज भण्डारण नाकाफी

भारतीय किसानों की स्व-मेहनत एवं मिट्टी को सोना बनाने की क्षमता ने खाद्य उत्पादन के मामले में जहां देश आत्मनिर्भर हुआ है। अनाज का निर्यात होकर विदेशी मुद्रा भी अर्जित की जा रही है। लेकिन देश में अनाज के सडऩे एवं नष्ट होने की विडंबना भी कम नहीं है। मौसमी बदलाव, चूहों एवं अन्य जानवर एवं कीड़ों के कारण सरकारी खरीद सहित किसानों के पास भंडारित अनाज का 25 फीसदी हिस्सा नष्ट हो जाता है। सरकारी क्षेत्र में जहां भंडारगृहों का अभाव है तो किसानों को भी स्वयं की फसल सुरक्षित रखने सरकार की और कोई मदद योजना नहीं है। 

सिंचाई योजनाएं बनी अभिशाप

आज देश में 12 करोड़ किसान मात्र 2 हेक्टेयर तक की भूमि का मालिक है। इन किसानों के लिये नहर आधारित सिंचाई परियोजनाएं वरदान की बजाय अभिशाप साबित हुई है। नहरों की नमी एवं सीलन जमीन के एक हिस्से से उसकी उत्पादन क्षमता को नष्ट कर देती है। विगत वर्षों में केन्द्र सरकार के आर्थिक सहयोग से राज्यों ने वर्षा आधारित छोटी सिंचाई परियोजनाएं तालाब एंव पोखरों के निर्माण के लिये अनुदान आधारित योजनाओं को प्रारंभ किया गया है। लेकिन इन योजनाओं में किसानों को मिलने वाली अनुदान राशि इतनी कम है कि योजना वास्तविकता के धरातल पर आने से पहले ही धराशाही हो जाया करती है। यही कारण है कि किसानों ने हकीकत के बजाय सरकारी अफसरों से मिलकर कागजों पर जलाशय बनाकर अनुदान को हड़पने का कार्य किया है। 

`कृषि प्रधान देश की लोकतांत्रिक गठन प्रक्रिया में कृषि से जुड़े लोगों का किरदार अति महत्वपूर्ण होना चहिये। भारत में लगभग 47 करोड़ जनता का कृषि से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ाव होने के बावजूद यह वर्ग सरकार के गठन में स्वयं की भूमिका को अधिक जागरुक करने का चिंतन करता नजर नहीं आता है। इस देश में एक दशक पूर्व तक ग्रामीण कास्तकार मतदाता जात—पात के साथ क्षेत्र के दंबगों की पसंद पर ही मतदान करता आया है। 2019 के चुनाव में ग्रामीण क्षेत्रों में जहां सोशल मीडिया सर्वाधिक प्रभावशील है तो, इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिन्ट मीडिया ने भी अपनी पकड़ मजबूत की है। ग्रामीण क्षेत्रों में टीव्ही चैनलों को सिर्फ मनोरंजन ही नहीं बल्कि देश एवं विदेश की खबरों से तरोताजा होने के लिए देखा जाने लगा है। आज लगभग प्रत्येक ग्रामीण परिवार के पास स्मार्ट फोन के साथ इन्टरनेट की सुविधा भी है। इसलिये बाहुबल, नशा एवं अन्य सामग्री के प्रलोभन का प्रभाव अब कम हुआ है। शायद कारण भी यही है कि पिछले चुनाव के उपरांत राजनैतिक दल राज्य के साथ देश में भी किसानों से जुड़े मुद्दों पर नियमित चर्चा के साथ किसान को त्वरित समृद्धि देने के हवाई प्रलोभन भी दे रहे हैं।`

फसल बीमा योजना नाकाम

किसानों को सुरक्षा कवच के रूप में वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा बीते वर्ष लायी गई प्रधानमंत्री किसान फसल बीमा योजना जो कि पूर्व योजना से तो बेहतर है। लेकिन सरकार ने इस योजना को बनाते समय ऐसे अनेक सन्देह का स्थान रखा है जो पीडि़त किसान को सुरक्षा देने के बजाय बीमा कम्पनियों का बचाव करती है। व्यक्तिगत फसल नुकसान की दशा में पीडि़त किसान को 48 से 72 घंटों में बीमा कम्पनी को उचित माध्यम से सूचना देनी होती है एवं समयावधि बीतने के बाद क्लेम प्राप्त करने की पात्रता स्वत: ही समाप्त हो जाती है। मुसीबत के समय एक पीडि़त किसान को अल्प समयावधि में बांधा जाना जबकि देश का किसान अशिक्षित या अल्प शिक्षित है, सुरक्षा देने में योजना नाकाम ही दिखाई देती है।

दूसरी तरफ केसीसी ऋण देते समय सहकारी बैंकें सहित राष्ट्रीयकृत बैंकें किसान क्रेडिट कार्ड द्वारा दिये गये ऋण को सुरक्षित बनाने के लिये प्रधानमंत्री फसल बीमा अनिवार्य रूप से करती है। लेकिन यह संस्थाएं फसल बीमा में किसान की वास्तविक फसल लिखने के बजाय जिले की मुख्य फसल को थोकबंद रूप में लिख दिया करते हंै। लेकिन क्लेम के दौरान राजस्व आंकड़ों का सत्यापन होने की स्थिति फसलान्तर के कारण पीडि़त किसान क्लेम लेने में नाकाम हो जाया करता है। 

दो तिहाई सांसद किसान लेकिन...

देश की संसद में पहुंचने वाले दो तिहाई सांसद स्वयं को किसान पृष्ठभूमि का ही दिखाया करते हैं। लेकिन किसानों से सम्बंधित इन भ्रमजालों में संशोधन एवं सुधार के लिये अक्सर पहल नहीं कर पाते हैं। खेतों में काम के दौरान प्रत्येक किसान का जीवन पूर्णत: असुरक्षित हुआ करता है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आकाशीय बिजली,  जंगली एवं जहरीले जानवरों के हमले के साथ यांत्रिक मशीनों के साथ काम करते, फसलों पर कीटनाशक का छिड़काव करते समय अनेकों किसान प्रति वर्ष काल के गाल में समाते हैं। लेकिन चंद पैसों की सरकारी मदद के अतिरिक्त इन किसानों के परिवार को भरण-पोषण का सुरक्षित सहारा नहीं मिल पाता है। यही हाल गंभीर बीमारी की चपेट में आने से भी किसानों का हुआ करता है। लेकिन देश के जीवन के लिये अन्न उपजाने वाले अन्नदाता को जीवन सुरक्षा कवच देने की पहल को किसी भी राजनैतिक दल ने अपने एजेन्डे में अभी तक शामिल नहीं की है। होना तो यह चाहिये कि भूस्वामी किसान को कम से कम दस लाख का व्यक्तिगत जीवन बीमा एवं 5 लाख तक स्वास्थ्य बीमा उसे एवं उस पर आश्रित परिवार को न्यूनतम प्रीमियम पर देने की पहल सरकार की होनी चहिये। 

कर्जमाफी सम्मोहनी

कर्ज माफी जैसे मुफ्तखोर योजनाएं राजनैतिक दलों को एकाद बार सत्ता के सौपान तक पहुंचा जरुर देती है। लेकिन किसान को स्थाई लाभ देने नाकाम है। यह योजनाएं त्वरित वोट हथियाने के लिये सम्मोहन कारक के रुप में है। इस तरह चीन्ह-चीन्ह कर बांटी जाने वाली मुफ्त मलाई कृषि विकास के बजट को बरबाद कर आवश्यक विकास योजनाओं को कई वर्ष पीछे धकेल दिया करती है। इसलिये किसानों को भी अब इन मुफ्तखोरी भरे प्रलोभनों पर चिंतन की आवश्यकता है। इस प्रकार की मुफ्त घोषणाओं को सहमति देकर वह आने वाली पीढ़ी को भी अपना वाला भविष्य देने की कोशिश कर रहे हैं। कर्ज माफी जैसी योजनाएं ग्रामीण परिवेश में असमानता एवं अराजकता पैदा करने वाले कारक हैं।  इंडिया रेटिंग्स एवं रिसर्च के उपलब्ध आंकडों में बताया गया है कि विगत समय में विभिन्न राज्यों में कृषक मतदाताओं को आक्रोशित करने जो किसान माफी योजना लागू की गई है, उससे राज्यों का सयुक्त घाटा 33.28 हजार करोड़ तक पहुंच जायेगा।

केन्द्र सरकार के सन् 2022 तक किसान की आय दुगनी करने के दावे पर गौर करें तो नीति आयोग के अनुसार पिछले एक दशक में किसानों की आय में लगभग 5 फीसदी की वृद्धि हुई है। जबकि कृषि विकास क्षेत्र में सरकार का योगदान देश की जीडीपी का 5 फीसदी है। इस आधार पर आगामी 03 सालो में किसानों आय में वृद्धि पांच के बजाय सौ फीसदी हो पाना नामुमकिन। विगत वर्ष केन्द्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के विक्रय मूल्य पर डेढ़ गुना ज्यादा का दावा किया है। लेकिन चालू रबी सीजन में अधिकांश राज्य सरकारें जहां दलहनी फसलों को खरीदने से पीछे हट गई हैं तो गेहूं की सरकारी खरीदी में भी उनकी रुचि नहीं है। अनाज मंडियों में लगभग सभी जिन्सें एमएसपी से बहुत कम दामों में खरीदी जा रही हंै। इन हालात में किसानों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य सिर्फ झुनझुना बन कर रह गया है। किसानों एवं कृषि के वर्तमान हालात एवं भविष्य की संभावनाओं पर आगामी आम चुनाव से पूर्व राजनैतिक दलों के साथ किसान मतदाता का भी गहन चिंतन आवश्यक है। अन्नदाता मतदान अवश्य करें। लेकिन जिम्मेदार राष्ट्र निर्माता के रुप में।

मतदान अवश्य करें

  • विनोद के. शाह, मो.  9425640778
  • email : shahvinod69@gmail.com
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