मिट्टी की सेहत सुधारें मृदा स्वास्थ्य में हरी खाद वापरें

Share On :

improve-soil-health-use-green-manure-in-soil-health

यह देखने में आया कि कृषि में रसायनों का प्रयोग अंधाधुंध होने लगा, जिससे पर्यावरण प्रदूषित तथा भूमि की उर्वराशक्ति का ह्रास होने लगा जो आज तक निरंतर जारी है। यह मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ सभी जीवों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। कृषि में रसायनिक उर्वरक के अत्यधिक प्रयोग से भूमि की विषाक्तता बढ़ गई जिससे बहुत से लाभदायक जीवाणु मर गए तथा भूमि अनुपजाऊ होती गई। ये ऐसी समस्याएं है जो और भी गंभीर होती जा रही है ऐसी स्तिथि में एक सवाल उभरता है कि क्या इन समस्याओं से निजात पाने का कोई तरीका है इसका जवाब है हाँ और वो भी हरी खाद के माध्यम से। 

हरी खाद एक बड़ा ही अच्छा विकल्प है जो भूमि स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य तथा मानव स्वास्थ्य को सुधारता है बिना पर्यावरण स्वास्थ्य को बिगाड़े। हरी खाद के साथ फसल उत्पाद महंगे होने की वजह से किसानों की आर्थिक दशा सुधरती है। हरी खाद के लिए ढेंचा, सनई, ग्वार, मूंग व लोबिया आदि का उपयोग किया जाता है जिनकी बिजाई करके उचित समय या फूल आने की अवस्था तक भूमि में मिला दिया जाता है। चूँकि हरी खाद के रूप में उपयोग की जाने वाली फसलें लेगुमिनेशी कुल की होती है जिनमे नत्रजन प्रतिशत अपेक्षाकृत ज्यादा होता है। इसके  लिए यह भी जरुरी है कि दाल वाली फसलें बौने से पहले इनको राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें, जिससे ये ज्यादा मात्रा में नत्रजन का स्थिरीकरण कर सके। मृदा को उर्वर रखने में हरी खादें बहूत महत्व रखती है। पशु धन में आई कमी के कारण गोबर की उपलब्धता पर भी हमें निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। 

हरी खाद के लिये फसल की ये विशेषतायें 

  • चुनी गई दलहनी फसल में अधिकतम वायुमंडलीय नाइट्रोजन ग्रहण करने की क्षमता होनी चाहिये जिससे जमीन को अधिक से अधिक नाइट्रोजन उपलब्ध हो सके।
  • फसल ऐसी हो जिसमें शीघ्र वृद्धि करने की क्षमता हो ताकि कम समय में कार्य पूर्ण हो सके। 
  • फसल की वृद्धि होने पर अतिशीघ्र अधिक से अधिक मात्रा में पत्तियां व कोमल शाखायें निकले जिससे प्रति इकाई क्षेत्र से अत्यधिक हरा पदार्थ मिल सके तथा आसानी से सड़ सके। 
  • फसल गहरी जड़ वाली हो ताकि वह जमीन में गहराई तक जाकर अधिक से अधिक पोषक तत्वों को खींच सके। हरी खाद की फसल के सडऩे पर उसमें उपलब्ध सारे पोषक तत्व मिट्टी की ऊपरी सतह पर रह जाते हैं जिनका उपयोग बाद में बोई जाने वाली मुख्य फसल के द्वारा किया जाता है। 
  • फसल की जल व पोषक तत्वों की मांग कम से कम हो। 

हरी खाद को प्रयोग करने के आधार पर दो वर्गों में बांटा जा सकता हैउसी स्थान पर उगाई गई हरी खाद

भारत के अधिकतर क्षेत्र में यह विधि अधिक लोकप्रिय है इसमें जिस खेत में हरी खाद का उपयोग करना है उसी खेत में फसल को उगाकर एक निश्चित समय पश्चात पाटा चलाकर या मिट्टी पलटने वाले हल से जोतकर मिट्टी में सड़ा-गला दिया जाता है। 

अपने स्थान से दूर उगाई गई हरी खाद की फसलें

यह विधि उत्तरी भारत में अधिक प्रचिलित नहीं है, परन्तु दक्षिण भारत में हरी खाद की फसल अन्य खेत में उगाई जाती है और उसे उचित समय पर काटकर जिस खेत में हरी खाद देना रहता है इस विधि में जंगलों या अन्य स्थानों पर पेड़ पौधों, झाडिय़ों आदि की पत्तियों, टहनियों आदि को इक_ा करके खेत में मिला दिया जाता है। 

हरी खाद के लाभ

  • मिट्टी में जीवांश तत्व बढ़ता है जिससे मिट्टी की उर्वरता में बढ़ोतरी होती हो। मिट्टी में जीवांश बढऩे से भौतिक व रसायनिक दशा में सुधार होता है जिससे जल धारण क्षमता और वायु संचार अच्छा हो जाता है। 
  • हरी खाद के प्रयोग से मृदा भुरभुरी होती है फसलों की जड़ों का फैलाव अच्छी तरह से होता है।
  • हरी खाद देने से मृदा की क्षारीयता में सुधार होता है।
  • हरी खाद देने से मृदा क्षरण को काफी हद तक कम किया जा सकता है। 
  • हरी खाद से नत्रजन प्रचुर मात्रा में तथा अन्य पोषक तत्व मिट्टी में उपलब्ध हो जाते है जिन्हें पौधे द्वारा आसानी से ग्रहण किया जाता है। 
  • खेत में जीवांश अधिक होने से लाभकारी कीट अधिक पनपते हैं। 
  • हरी खाद केवल नत्रजन व कार्बनिक पदार्थों का ही साधन नहीं है बल्कि इससे मिट्टी में कई पोषक तत्व भी उपलब्ध होते हंै।
  • हरी खाद के प्रयोग से मृदा में सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता बढ़ती है तथा मृदा की उर्वराशक्ति एवं उत्पादन क्षमता भी बढ़ती है।
  • हरी खाद के प्रयोग से मिट्टी  रोगों में भी कमी आती है।
  • रसायनिक उर्वरकों का उपयोग कम कर टिकाऊ खेती की और बढ़ सकते हैं।

हरी खाद में बरतें सावधानियां

  • हरी खाद फसलों में फूल आने से पहले या 45-60 दिनों के अंदर खेत में जरूर मिला दें जब इनके डंठल कोमल हों। 
  • हरी खाद वाली फसलों को पलटते समय खेत में भरपूर नमी बनाए रखना जरूरी जिससे उनका विघटन जल्दी हो।
  • हल्की बालुई मिट्टी में अधिक गहराई और भारी मिट्टी में कम गहराई पर दबाना चाहिए हरी खाद की फसलों को।
  • हरी खाद वाली फसलों को सूखे मौसम में ज्यादा गहराई पर नम मौसम में कम गहराई पर दबाना लाभदायक रहता है।
  • स्थानीय जलवायु के मुताबिक हरी खाद की फसलों की बिजाई करना लाभदायक रहता है।

 

  • डॉ. निरंजन कुमार बरोड़ 
  • डॉ. सुरेश मुरलिया 
  • डॉ. इंदु बाला सेठी 
  • डॉ. सुरेश कुमार 
  • डॉ. लोकेश कुमार
  • डॉ. विष्णुशंकर मीना
  • कृषि अनु. संस्थान, नोगांवा (अलवर)
  • Email-nijubarod@gmail.com
  • Mob. 7300139969
Share On :

Follow us on

Subscribe Here

For More Articles

Releated Articles