बकरियों का आहार प्रबंधन

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बकरियों को वृद्धि, दुग्ध व मांस उत्पादन, जनन तथा अन्य सभी दैहिक क्रियाओं के लिए उचित पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। पोषक तत्व भोज्य पदार्थ में पाये जाने वाले ऐसे रसायनिक तत्व होते है, जो कि न केवल उनका जीवन काल बढ़ाते हैं बल्कि उनकी प्रजनन एवं उत्पादन क्षमता में भी वृद्धि करते है। मुख्य रूप से पानी, प्रोटीन, शर्करा, रेसा, वसा, खनिज और विटामीन पोषक तत्व है, जो आहार में संतुलित मात्रा में देना अतिआवश्यक है। बकरी पालन को और अधिक लाभकारी बनाने के लिए किसानों को विभिन्न पोषक तत्वों की जानकारी आवश्यक होना चाहिए। इन्हे किस अनुपात में खिलायें की ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाया जा सके कि भी जानकारी जरूरी है। सभी प्रकार के पशु पालन व्यवसाय जैसे मुर्गी, भेड़, सूकर पालन इत्यादि का सबसे महत्वपूर्ण घटक 'पोषण'  होता है क्योंकि इन व्यवसायों में कुल खर्च का 50 से 60  प्रतिशत व्यय इसी घटक पर होता है। किसी भी जाति के पशु की पोषण पद्धति के अध्ययन के पूर्व उस जाति के पशुओं की सेवन प्रवृत्ति, पोषण के सिद्धांत एवं विशेषताओं का ज्ञान पशुपालकों को होना चाहिए। इस लेख में बकरियों की सेवन प्रवृत्ति, पोषण की विशेषताओं की जानकारी दी जा रही है, जो कि निश्चित रूप से बकरी पालकों के लिए बकरियों के विधिवत पोषण हेतु लाभदायक होगी। बकरियों की सेवन प्रवत्ति में अन्य पशु जैसे गाय, भैंस एवं भेड़ की अपेक्षा कुछ भिन्नता के कारण बकरी पोषण के सिद्धांत में भी कुछ भिन्नता होती है, बकरी पोषण की विशेषताएं निम्नानुसार है-

  • बकरी पीछे के दोनों पैरों पर खड़े होकर अच्छी तरह जांच परख या चयनोपरांत ही विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थ का सेवन करती है। बकरी के चरने की इस प्रवृत्ति को ब्राउजिंग कहते है।
  • बकरियां कई प्रकार के  खाद्य सामग्री जैसे- झाडिय़ों के पत्ते, जंगली घास, वृक्षों की पत्तियाँ, खरपतवार एवं अन्य प्राकृतिक पौधे का सेवन भली-भांति करती है ये सामग्री गोवंशी पशुओं एवं भेड़ों द्वारा पसंद नहीं की जाती है।
  • बकरियां कड़वा, मीठा, नमकीन एवं खट्टा स्वादों में अंतर कर सकती है। यह देखा गया है कि बकरियों में गोवंशी पशुओं की तुलना में कड़वे खाद्य पदार्थो को खाने एवं पचाने की क्षमता अधिक होती हैं।
  • अपनी रूचि के खाद्य पदार्थो की खोजों में बकरियां गायें की अपेक्षा लगभग दुगुनी दूरी तक जा सकती है।
  • यह भी पाया गया है कि एक बकरी को रूचिकर लगने वाले पदार्थ दूसरी बकरी हेतु अरूचिकर भी हो सकती है।
  • खाद्य पदार्थो के मिट्टी इत्यादि में सने होने पर बकरियाँ इन्हे ग्रहण नहीं करती हैं।
  • बकरियाँ एक ही तरह के खाद्य पदार्थ को कम पसंद करती हैं। अत: उसके आहार में विभिन्न किस्म के खाद्य अवयवों का उपयोग करना आवश्यक हो जाता है। विभिन्न किस्मों के खाद्य पदार्थो में भी ये प्राथमिकता के आधार पर चयन करती है।
  • बकरियों के चरने एवं खान-पान का व्यवहार अन्य पशुओं की तुलना में अति विशिष्ट होती है। जो चारा एक बकरी को पसंद है वह दूसरी को नापसंद हो सकता है। पैरों द्वारा रौंदा गया मिट्टी लगा चारा खाने के बजाए वे भूखी रहना पसंद करती हैं। अन्य पशुओं के विपरित बकरियाँ कम नमी युक्त चारे पर आश्रित रहना पसंद करती है। 
  • मुख की विशिष्टता बनावट उसे कांटेदार पत्तियां चरने में मदद करती है। बकरियाँ खाने में बड़ी नखरे वाली होती हैं। बकरियों का खान-पान धीरे-धीरे बदलना चाहिए। अधिक दूध व मांस उत्पादन हेतु दुधारू, गाभिन बच्चे तथा प्रजनन के काम आने वाले बकरों आदि को उनके वजन व उत्पादन के अनुसार संतुलित दाना-चारा तथा अन्य पोषक तत्व के साथ उचित मात्रा में खनिज लवण नियमित रूप से दें।
  • बकरियों की चरने की आदत वर्ष में विभिन्न ऋतुओं के अनुसार परिवर्तित होती है।
बकरी एक बहुउद्देशीय उत्पादकता वाला महत्वपूर्ण पालतू पशु है क्योंकि इससे दूध, मांस, खाल, बाल एवं खाद जैसी उपयोगी वस्तुयें प्राप्त होती हैं भारतवर्ष में बकरी को गरीब की गाय कहा जाता है क्योंकि गाय एवं भैंस की तुलना में बकरियों के छोटे आकार के कारण इन पर रखरखाव एवं खानपान पर कम खर्च आता है। इसी के साथ-साथ इस व्यवसाय में जोखिम भी कम रहता है। अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से छोटे तथा भूमिरहित किसानों के लिये  बकरियाँ रीढ़ की हड्डी साबित होती हैं। बकरी जुगाली करने वाला पशु है। यह पूरा खाना एक बार में न खाकर थोड़ा-थोड़ा खाना पसंद करती है। सामान्यतया बकरियों में सारे आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति अच्छे चरागाहों में चरने से हो जाती है। अगर इनके चरने के लिए आसपास जगह उपलब्ध हो, तो ये शरीर की आवश्यकतानुसार पोषक तत्व ग्रहण कर लेती है। पर्याप्त मात्रा में अगर चारागाह उपलब्ध नहीं हो तो बकरियों को बांधकर भी पाला जा सकता है, परंतु यह ज्यादा फायदेमंद नहीं होता। 

बकरियों की शुष्क पदार्थ की आवश्यकता: शुष्क पदार्थ से अभिप्राय बकरी को दिये जाने वाले कुल सूखा चारा, हरा चारा तथा दाना मिश्रण की मात्रा में उपलब्ध शुष्क पदार्थ की मात्रा से है । शुष्क पदार्थ की अवश्यकतानुसार हम दिये जाने वाले चारे एवं दाने की मात्रा निर्धारित कर सकते हैं। देशी बकरियाँ आहार की गुणवत्ता एवं शारीरिक अवस्था अनुसार शरीर के वजन का 2.5 से 5.5 प्रतिशत शुष्क भोज्य पदार्थ का सेवन करती है, जो कि अन्य जुगाली करने वाले पशुओं की सेवन क्षमता से अधिक है।

  • प्राय: यह देखा गया है कि प्रति ईकाई शारीरिक आकार के आधार पर छोटी नस्ल की बकरियों का अन्र्तग्रहण बड़ी नस्लों की अपेक्षा अधिक होता है। 
  • बकरियों में वाटर इकोनामी में दूसरे पशुओं की तुलना मे कॉफी दक्ष होती है। मांस उत्पादन हेतु अपेक्षाकृत कम पानी की आवश्यकता होती है। उन्हे दूध, वृद्धि तथा मोहेर इत्यादि उत्पादन के लिए स्वच्छ पानी आवश्यक है। गर्मी के मौसम में परिवेश तापमान बढऩे से पानी की आवश्यकता बढ़ जाती है, तथापि बकरियां अन्य पशुओं की अपेक्षा बहुत कम हाफती है। सामान्यत: बकरियों में शुष्काहार अन्र्तग्रहण व पानी का अनुपात 1:4 होता है अर्थात् 1 किलो शुष्काहार खाने पर 4 लीटर पानी की आवश्यकता होगी। दुधारू बकरियों में दुध उत्पादन हेतु कम से कम 1.3 लीटर पानी की अतिरिक्त आवश्यकता होती हैं।
  • बकरियाँ वृद्धिशील पौधों की मुलायम पत्तियाँ एवं ठंडलों का ही सेवन करती है एवं ठंडलों एवं तनों को छोड़ देती है। 
  • बकरियां कड़वे, नमकीन, मीठे व खट्टे स्वादों के बीच विभेद कर लेती है तथा कड़वे पदार्थों का गाय व भेड़ की तुलना में अधिक सरलता से खा लेती है।
  • यह भी पाया गया है कि बकरियाँ चराई के दौरान किसी एक पौधों को एक निश्चित समय तक सेवन कर उसे छोड़ देती है एवं दुबारा उसे नहीं खाती हैं।
  • बकरियों की रेशेदार सूखे चारे को पचाने की क्षमता भेड़ एवं गोवंशी पशुओं से अधिक होती हैं। अत: ऐसे आहार से अन्य पशुओं की तुलना में बकरियों को अधिक ऊर्जा मिलती है। इसलिये बकरियों में भेड़ एवं अन्य गोवंशी पशुओं की अपेक्षा पशु खाद्यों की शारीरिक उपलबधता अधिक होती है।

 

  • डॉ. अशोक कुमार पाटिल 
  • डॉ. आर. के. जैन
  • ashokdrpatil@gmail.com
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