अस्पी एलएम पटेल - फार्मर ऑफ द ईयर अवॉर्ड 2017

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अस्पी के शिखर पुरुष स्व. श्री एल.एम. पटेल

अमेरिकन स्प्रिंग एंड प्रेसिंग वक्र्स प्रा.लि. (अस्पी) पौध संरक्षण यंत्रों के क्षेत्र में एक चिर-परिचित प्रतिष्ठित नाम है। अस्पी के पितृ पुरुष स्व. श्री लल्लूभाई पटेल और अस्पी एक दूसरे के पर्याय है। सरल, सहज सादगी से भरपूर स्व. श्री लल्लूभाई के जीवन का केवल एक ही लक्ष्य था- खेती का विकास और किसानों की समृद्धि। उन्होंने अपने सक्रिय जीवन में अनेक गांवों को गोद लेकर विकास की राह दिखाई, कई शिक्षण संस्थाओं को निरंतर सहायता और सहयोग दिया, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षण के क्षेत्र में अनेक संस्थान स्थापित किए और स्थापित संस्थानों में अनुसंधान केन्द्रों का निर्माण किया।

उनके द्वारा स्थापित अस्पी एग्रीकल्चरल रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन कृषि एवं कृषि यंत्रीकरण के क्षेत्र में उच्च शिक्षा, शोध को प्रोत्साहित कर रहा है।

12 मार्च 1996 को श्री एल.एम. पटेल अवसान के बाद अस्पी ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेअरमेन श्री शरद पटेल, ज्वाईंट एमडी श्री किरन पटेल एवं युवा संचालकगण श्री जीतेन्द्र पटेल एवं श्री राजीव पटेल एवं उनके सहयोगियों ने महसूस किया कि स्व. श्री एल.एम. पटेल की सोच, दूर दृष्टि और कृषि विकास के प्रति उनके समर्पण के विचार को चहुं ओर प्रसारित करना चाहिए। और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लए उत्कृष्ट किसानों को अस्पी एल.एम. पटेल अवॉर्ड से सम्मानित करने से बेहतर कुछ नहीं हो सकता था। बागवानी, वर्षा आश्रित खेती और विशेषरूप से महिला कृषकों को प्रतिवर्ष पिछले 24 वर्षों से गरिमामय समारोह में पुरस्कृत किया जाता रहा है। पुरस्कार में अस्पी द्वारा एक लाख रुपए की सम्मान राशि के साथ ट्रॉफी और प्रशस्ति पत्र दिया जाता है।

चयन समिति

डॉ. के.एल. चड्डा चेयरमैन, डॉ. पी.एम. हल्डान्कर संचालक अनुसंधान, डॉ. आर.बी. डुम्बरे पूर्व संचालक अनुसंधान, डॉ. डी.जे. पटेल पूर्व प्रिंसिपल एंड डीन, श्री सागिर अहमद एसएमएस- टी कल्टीवेशन, डॉ. वी.एन. पटेल एसएमएस- किचन गार्डेन ।

 

जैविक चाय उत्पादक अस्पी फॉर्मर श्री भाबेन्द्र मोहन

कुछ दिन पूर्व मुम्बई में हुए पुरस्कार समारोह में वर्ष 2017 के पुरस्कार दिये गये। इन पुरस्कृत किसानों की सफलता की कहानी कृषक जगत के पाठकों के लिए क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत की जाएगी। इसी कड़ी में पहले कृषक हैं बागवानी श्रेणी में चाय उत्पादक किसान आसाम के डिब्रूगढ़ जिले के सीपोन तहसील के श्री भाबेन्द्र मोहन बोरगोहेन।

37 वर्षीय श्री भाबेन्द्र अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद अपने पैतृक व्यवसाय चाय बागान में जुड़  गए। उनके पास 53 हेक्टेयर जमीन है जिसमें 3 हेक्टेयर में वे चाय की खेती करते हैं और बाकी 2 हेक्टेयर में धान की फसल लेते हैं। 6 गाय और 5 बकरी के साथ कुछ मुर्गी पालन भी करते हैं। आप अपने खेत में जैविक तरीके से चाय उत्पादन करते हैं। आपकी नवोन्मेषी खेती, आधुनिक और पारंपरिक तरीकों का उपयोग (Hand crafted organic tea production) देखने भारत के विभिन्न इलाकों से लोग आते हैं।

 

 

आप चाय पर केन्द्रित वल्र्ड टी एंड कॉफी एक्सपो के विभिन्न आयोजनों में भी भाग लेते रहे हैं।

चाय उत्पादन : श्री भाबेन्द्र अपने चाय बागानों में टोकलाई टी रिसर्च इंस्टीट्यूट, जोरहट आसाम द्वारा विकसित चाय की किस्में टीवी 23, 25, 26 एवं टीएस 463, 465 लगाते हैं। बागानों में जल निकासी का उचित प्रबंध कीट-रोगों से बचाव के लिए बायो पेस्टिसाईड्स का उपयोग और अनुसंधान केन्द्र की सिफारिशों को पूरी तरह अमल में लाते हैं।

मार्च से दिसम्बर तक वे चाय की तुड़ाई करते हैं। लगभग 40-45 राउंड कटाई के होते और एक राउंड 4-5 दिन का होता है। श्री भाबेन्द्र अपने बागान से प्रति हेक्टेयर 9 से 11 टन चाय का उत्पादन लेते हैं। हाथ से तोड़ी, सुखाई, बीनी चाय पत्तियों का मूल्य सवंर्धन कर, हेंड क्राफेटेड ग्रीन टी में बदल कर श्री भाबेन्द्र मोहन बोरगोहेन (अस्पी अवॉर्डी 2017) को लागत पर दुगने से अधिक आमदनी होती है। 

 

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