सरकार के बांयें हाथ को नहीं पता दायां क्या कर रहा है

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100 दिन में सिर्फ तबादले ही तबादले

 

(विशेष प्रतिनिधि)

भोपाल। देश में और मध्य प्रदेश में किसानों की बदतर होती स्थिति के लिए जहां सरकारें जिम्मेदार हैं वहीं कृषि विभाग को रसातल में पहुंचाने का बीड़ा भी इन्हीं किसान हितैषी सरकारों ने उठा रखा है। लगभग 100 दिन की प्रदेश सरकार ने आधी-अधूरी ऋण माफी और अधिकारियों के तबादलों के अलावा कुछ नहीं किया। गाजर-मूली की तरह स्थानान्तरण किए जा रहे हैं फिर वह प्रथम श्रेणी का अधिकारी हो या चतुर्थ श्रेणी का। आईएएस अधिकारी भी अछूते नहीं रहे। राज्य सरकार तो 15 साल बाद बनी है, कुछ नियम -कायदे भूल भी गई हो परन्तु सूत्रधार तो वही हैं।  

ध्य प्रदेश के कृषि विभाग का बेड़ा गर्क करने में मंत्री, अधिकारी सभी जुटे हैं। साप्ताहिक बदली में कृषि संचालक भी बदले जा रहे हैं। मध्य प्रदेश के कृषि संचालक श्री मुकेश शुक्ला के चुनावी ड्यूटी पर जाने के बाद 29 मार्च को अपर संचालक श्री बी.एम. सहारे को प्रभार पूर्णरूप से सौंपा गया, पर तकनीकी संवर्ग के अधिकारी का संचालक बनना बड़े साहब लोगों को रास नहीं आया। इसलिए हफ्ते भर बाद ही 5 अप्रैल को मंडी बोर्ड के प्रबंध संचालक श्री फैज अहमद किदवई को प्रभार सौंपने के आदेश मंत्रालय से जारी कर दिये गये।

यहां उल्लेखनीय है कि श्री सहारे का आदेश कृषि विभाग द्वारा निकाला गया तथा प्रतिलिपि भी सामान्य प्रशासन विभाग को दी गई। इसके पश्चात श्री किदवई का आदेश हफ्तेभर बाद सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा निकाला गया। आदेश देखकर यह प्रतीत होता है कि कृषि विभाग द्वारा निकाले गये आदेश की सामान्य प्रशासन विभाग को जानकारी ही नहीं थी, क्योंकि आदेश में उल्लेख है कि श्री शुक्ला के ड्यूटी पर प्रस्थान करने की तिथि से प्रभावशील होगा। मतलब बीच का एक सप्ताह कृषि विभाग भगवान भरोसे चल रहा था या फिर कहें कि सरकारी विभागों में आपसी सामंजस्य या तालमेल की कमी है कि एक हाथ की दूसरे हाथ को खबर नहीं है। 

यह जानकारी देने का उद्देश्य किसी अधिकारी की योग्यता पर सवालिया निशान खड़ा करना नहीं है वरन कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभाग की बागडोर स्थायी रूप से ऐसे अधिकारी को सौंपी जानी चाहिए ताकि मैदानी फौज का मनोबल बना रहे। आचार संहिता के दौरान तदर्थवाद पर चल रहा पदस्थापनाओं का दौर अनेक प्लेटिनम प्लाजाओं को जन्म देता है। 

किसानों की कौन सुन रहा है? यह और बात है। इन प्रभारी कंधों पर महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी टिका कर सरकार क्या लक्ष्य प्राप्त करेगी? समझना आसान है। खरीफ का सीजन शुरू होने को है, जायद का सीजन चल रहा है। बीज की दरें तय नहीं हुई हैं। संभागीय बैठकों की परम्परा तो लगभग मृत प्राय: है। किसान की आमदनी दोगुनी, उसकी कर्जमाफी, बीमा राशि वितरण, सब दिवा स्वप्न पिछली सरकारों के साथ भी थे और ऐसे हुकुमरान रहेंगे तो आगे भी कुछ नहीं बदलेगा। किसान और किसानी अभिशप्त है, पीढ़ी दर पीढ़ी नारों जुमलों के बीच अपना जीवन काटने।

उद्यानिकी विभाग

इधर मध्य प्रदेश उद्यानिकी विभाग के तो पिछले दस दिन में इतने खसम हो गये कि विभाग अब दया के काबिल भी नहीं बचा। संचालक उद्यानिकी श्री सत्यानंद का स्थानान्तरण 27 मार्च के आदेश में हुआ तथा श्री यू.के. सुुबुद्धि को संचालक उद्यानिकी बनाया गया। इसके पश्चात श्री कवीन्द्र कियावत को 4 अप्रैल को उद्यानिकी आयुक्त सह संचालक बनाया गया, वे पदभार ग्रहण किए बगैर महाराष्ट्र चुनावी ड्यूटी पर चले गए। इसके पश्चात 5 अप्रैल को पुन: एक आदेश के तहत प्रमुख सचिव उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण श्री अनिरुद्ध मुखर्जी को आयुक्त सह संचालक उद्यानिकी का प्रभार सौंपा गया। वर्तमान में श्री मुखर्जी के पास उपरोक्त पदों के अलावा एम.पी. एग्रो के एम.डी., प्रशासन अकादमी तथा विमानन जैसे 3 विभागों का प्रभार है। अर्थात् कुल मिलाकर 5 विभागों के कर्णधार श्री मुखर्जी अब कौन-कौन से विभागों का भला कर पाएंगे, यह वक्त बताएगा। जानकारी के मुताबिक श्री मुखर्जी पांचों विभागों में बैठने का मन बना चुके हैं। यदि ऐसा संभव हुआ तो पूरा दिन व समय केवल आने-जाने में व्यतीत हो जाएगा। एक अधिकारी पर इतनी जिम्मेदारी क्या सरकार की ज्यादती नहीं ?

कृषि और उद्यानिकी जैसे विभाग जिनका सदैव जीवंत संपर्क किसानों से आवश्यक है जिन किसानों के दम पर सरकारें बनती और बिगड़ती हैं, उनको स्थाई मुखिया न मिलने पर मैदानी अमले को सही संदेश भी नहीं जाता। इन हिचकोले लेते तबादलों से पता चलता है कि सरकार इन महत्वपूर्ण विभागों के प्रति कितनी संवेदनशील एवं गंभीर है।

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