फसल उगाने में हाइड्रोजेल कारगर

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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्वाईल एंड वाटर कंजर्वेशन देहरादून के वैज्ञानिकों की पहल

नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन की वजह से अगर बारिश न हो, मानसून में सूखा पड़ जाए तो ऐसे वक्त में खेतों में हाइड्रोजेल डालकर भी फसलें उगाई जा सकती हैं। हाइड्रोजेल हालांकि नई खोज नहीं है, लेकिन फसलों में इसका परीक्षण पहली बार किया गया है, जो सफल रहा है। हाइड्रोजेल से गेहूं की फसल की वृद्धि 22 फीसदी और गेहूं उत्पादन में करीब 26 फीसदी की बढ़ोतरी का दावा है।

पौधों में 22 फीसदी ज्यादा की वृद्धि हुई

रिपोर्ट के अनुसार, जिन खेतों में हाइड्रोजेल का इस्तेमाल किया गया, उनमें पौधों की वृद्धि दर 22 फीसदी ज्यादा रही। वहां प्रति वर्ग मीटर में 210 पौधे थे। जबकि बिना हाइड्रोजेल वाले खेतों में 163 पौधे ही थे। इसी प्रकार हाइड्रोजेल वाले खेतों में गेहूं की बालियों पर 66 दाने थे जबकि दूसरे समूह में महज 45 दाने ही थे।

 

 नया परीक्षण : हाइड्रोजेल एक सिंथेटिक पालीमर पदार्थ है, जिसमें पानी को सोखने और छोडऩे की अनोखी क्षमता होती है। इसे कृषि अनुसंधान परिषद् के वैज्ञानिकों ने काफी अर्से पूर्व विकसित किया था। खेतों में अब इसका परीक्षण शुरू किया है। 

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्वॉइल एंड वाटर कंजर्वेशन, देहरादून के वैज्ञानिकों ने हाइड्रोजेल का फील्ड ट्रायल किया है। परीक्षण नवंबर 2017 में रबी की फसल के दौरान किया गया। इस इलाके में बारिश कम होती है। एक समूह के खेतों में हाइड्रोजेल डालकर गेहूं की खेती कराई गई और दूसरे में बिना हाइड्रोजेल गेहूं बोए गए। हाइड्रोजेल वाले खेतों में प्रति हेक्टेयर पांच किलोग्राम हाइड्रोजेल डाला गया।

400 गुना पानी सोख सकता है

खेतों में बारिश या सिंचाई के दौरान हाइड्रोजेल अपने वजन से 400 गुना तक पानी को सोख लेता है और गर्मी पडऩे पर उसे छोडऩे लगता है। जिससे मिट्टी को नमी मिलती है। एक बार खेतों में डालने से यह कई वर्षों तक काम करता है। हाइड्रोजेल के इस्तेमाल से प्रति हेक्टेयर में तीन बार के सिंचाई के लायक पानी की बचत भी हुई।

 

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