सब्जियों के लिए हाईटेक तकनीक

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पॉली ग्रीन हाउस तकनीक: पॉली ग्रीन हाउस या प्लास्टिक ग्रीन हाउस पॉलीथिन शीट का उपयोग कर बनाया जाता है इसलिए इसे पॉली हाउस भी कहते हंै। सामान्यता पॉली हाउस का आकार 25 म 5 मीटर रखा जाता है। इसका फ्रेम जंगरहित लोहे के पाइप द्वारा तैयार किया जाता है , जिसे 600 गैज की पॉलीथिन से ढक दिया जाता है। इसके अंदर बिजली से चलने वाले कूलर तथा हीटर लगाकर तापमान नियंत्रक उपकरण से जोड़ दिया जाता है।

पॉली हाउस तकनीक का सिद्धांत एवं उद्देश्य : पॉली हाउस में तापमान को नियंत्रित करने वाले उपकरण लगा लिए जायें तो अत्यधिक ऊँचे तापमान वाले क्षेत्रों में भी प्रतिकूल मौसम में सब्जियां उगाई जा सकती हैं। ग्रीन हाउस की इस तकनीक का विकास हुआ है और इस तकनीक पर अनुसन्धान जारी है। आजकल संकर किस्मों के महंगे बीज नर्सरी तैयार करने के लिए कम आय से निर्मित पॉलीहाउस काफी प्रचलित हो रहे है। पॉली हाउस में सब्जियों की जैविक खेती आसानी से कर सकते है। जैविक सब्जियों के निर्यात की अत्यधिक मांग है।

सब्जी उत्पादन में आधुनिक तकनीक को हाईटेक कहते हैं। यह तकनीक आधुनिक, मौसम पर कम निर्भरता वाली तथा अधिक पूंजी से अधिक लाभ कमाने वाली है। सब्जियों की खेती के लिए कुछ प्रचलित हाईटेक तकनीक निम्न है।
 

सब्जियों में ड्रिप सिंचाई पद्धति का उपयोग: सब्जियों की अधिक उपज, गुण तथा स्वाद को बनाये रखने के लिए समुचित जल प्रबंधन बहुत आवश्यक है। अभी हाल ही के वर्षों में कुछ सब्जियों में ड्रिप सिंचाई की विधि अच्छी साबित हुई है। इस विधि से सिंचाई करने से 50 से 60 प्रतिशत तक जल की बचत होती है और सब्जियों की उपज जल्दी, गुणवत्ता वाली तथा अधिक होती है क्योंकि पौधों को पानी बराबर नियंत्रित मात्रा में मिलता रहता  है। ड्रिप से पौधों के लिए आवश्यक घुलनशील तत्वों की आपूर्ति करना सुविधाजनक होता है। इससे पोषक तत्व सीधे पौधों की जड़ों को मिल जाते हैं व खरपतवार भी कम उगते हैं।

जैव प्रौद्योगिकी: जैव प्रौद्योगिकी अनुसन्धान याने बायो टेक्रालॉजी में काफी प्रगति हुई है। जिसके फलस्वरूप परम्परागत प्रजनन तकनीकों से जिन गुणों का समन्वय नई किस्म के विकास में असंभव प्रतीत होता था उसे अब इस तकनीक के जरिये सुगमता से प्राप्त किया जा सकता है। सब्जियों में भ्रूण संवर्धन, जीव द्रव्यक तथा पराग संवर्धन और कृत्रिम संकरण तथा आनुवंशिकी के प्रयोग से जैविक तथा अजैविक दवाओं के प्रति सहनशील/अवरोधी किस्में आसानी से विकसित की जा सकती हैं। खरबूजे की दो प्रजातियों कुकुमिस मिटेलिफेरस तथा सी. एन्गुरिया में भ्रूण संवर्धन द्वारा निमाटोड अवरोधी किस्में विकसित की गयी है। सूक्ष्म प्रवर्धन विधि को अपनाकर नर बंध्यता पंक्ति से अधिक पौध तैयार करने में सहायता मिलती है।

जैविक उर्वरकों का उपयोग 

जैव उर्वरकों में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीव वातावरण से नाइट्रोजन लेकर पौधों तक पहुंचाते है। ये सूक्ष्म जीव मृदा के अंदर स्वतंत्र रूप से या सहजीवी जीवन व्यतीत करते है और पौधों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में नाइट्रोजन देते हैं। इन जैव उर्वरकों के प्रयोग से वानस्पतिक वृद्धि के साथ-साथ अधिक उपज मिलती है। इनके प्रयोग से विभिन्न पोषक तत्वों जैसे-नत्रजन, फॉस्फोरस, पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीसियम, जिंक, कॉपर, मैगनीज की उपलब्धता बढ़ जाती है। इनके उपयोग से विभिन्न वृद्धि नियामकों जैसे जिब्रेलिक अम्ल एवं इन्डोल एसिटिक एसिड की सांर्द्रता बढ़ जाती है।

सब्जियों की जैविक खेती : सब्जियों के रोगों तथा कीड़ों से रक्षा करने के लिए विभिन्न कीटनाशी रसायनों का प्रयोग किया जाता है पर इसके अवशेष मानव शरीर तक पहुँच जाते हंै जिससे की कैंसर आदि भयावह रोगों के उत्पन्न होने का खतरा रहता है। इसी वजह से जैविक विधि से उगी सब्जियों की मांग निरंतर बढ़ रही है इस तरह की सब्जियों को उगने से तुड़ाई तक हानिकारक रसायनों से दूर रखा जाता है।

नई शीतकालीन विदेशी सब्जियां: अनुसंधान में कुछ नई शीतकालीन विदेशी सब्जियों को अपनी जलवायु तथा मिट्टी की स्थिति में सफलतापूर्वक उगने की तकनीक किसानों के लिए उपलब्ध हुई है। इनमें प्रमुख है ब्रोकली, ब्रसल स्प्रोउस, चाईंनिस कैबेज,लीक, पार्सेले, सेलनी, लेट्टूस, चेरी टमाटर, रेड कैबेज, एस्पेराग्स, फ्लोरंस, फिनल, आरटीचोक आदि।

पादप नियामकों का प्रयोग: सब्जी उत्पादन में वृद्धि नियामकों का प्रयोग काफी बढ़ रहा है। ऑक्सिन जैसे-आईएए, आईबीए,2-4 डी तथा जिब्रेलिन द्वारा टमाटर, बैंगन, मिर्च तथा मूली के बीजों का उपचार करने से अंकुरण तथा पौधों की बढ़वार और उपज में काफी वृद्धि होती है। कद्दूवर्गीय सब्जियों के पौधों में कई प्रकार के लिंग वाले फूल आते हैं। इनमे मोनोलिसियस लिंग वाले फूल आते हैं। इनमे यदि मादा फूलों की संख्या बढ़ाई जाये तो इनमे फलों की पैदावार में वृद्धि होती है।

संकर किस्मों का विकास : अधिक उपज , फसलों का आकर्षक रंग, सुडौल आकार, कीट व  रोगों की प्रतिरोधकता तथा अधिक समय तक भण्डारण क्षमता संकर किस्मों की मुख्य विशेषतायें हंै। 
टमाटर, बैंगन, पत्तागोभी, भिन्डी, मिर्च, फूलगोभी, खरबूजा, तरबूज व कुष्मांड कुल की सब्जियों में संकर किमों का प्रयोग अधिक हुआ है।

सब्जी उत्पादन में समन्वित कीट प्रबंधन 

बहुत से कीटों ने कीटनाशी रसायनों के परत अवरोध क्षमता विकसित कर ली है। सब्जियों की बहुत कम अन्तराल पर बार-बार तुड़ाई की जाती है जिससे की हानिकारक कीटनाशी दवाइयों के अवशेष भी बने रहते हैं। सब्जियों की टिकाऊ खेती की प्रणाली को अपनाने के लिए अत्यंत आवश्यक है कि सब्जियों में कीट नियंत्रण के लिए समन्वित कीट प्रबंधन को अपनाया जाये। 
सूक्ष्म जीवों के अतिरिक्त प्रकृति में बहुत से कीट मित्र भी पाए जाते है। ये कीट परभक्षी कीट कहलाते है। अंडा परजीवी ट्राईकोग्रामा का प्रयोग टमाटर के फल छेदक कीट के नियंत्रण में काफी सफल रहा है। कीट प्रबंधन में प्रयुक्त सूक्ष्मजीव एवं मित्र कीट का विवरण इस प्रकार है।

सूक्ष्मजीव  नियंत्रित कीट
ट्राईकोग्रामा जेसिलिएनेसिस टमाटर का फल छेदक कीट तथाभिंडी का तना, फल छेदक कीट 
क्राईसोपर्ला कार्निया भिन्डी का एफिड तथा पत्तागोभी का एफिड
एचएनपीवी   टमाटर का फल छेदक कीट
एसएनपीवी स्पोड़ोपटेरा लिटुरा
बीटी  डायमंड बेक माथ, टमाटर का फल छेदक कीट तथा भिन्डी का तना एवं फल छेदक कीट 

 

  • डॉ. अदिति गुप्ता
  • aditigupta.fn@gmail.com
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