जलवायु परिवर्तन से खाद्यान्न संकट की आहट

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इंदौर। जलवायु परिवर्तन के दंश को पूरी दुनिया झेल रही है। इसका खतरा चहुंओर मंडराने लगा है। असामयिक मौसम परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएं इसके संकेत हैं। जलाशयों के पानी की शुद्धता, खाद्य पदार्थों की उत्पादकता और पौष्टिकता पर भी इसका विपरीत प्रभाव पडऩे लगा है। इससे  प्रकृति के अस्तित्व के साथ ही मानवीय जीवन पर भी सवाल खड़ा हो गया है। इन संकेतों को गंभीर चेतावनी के रूप में समझा जाना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि होना है। इसी कारण फसलों में पोषक तत्वों की कमी होती जा रही है। जिनमें जिंक, आयरन और प्रोटीन प्रमुख है। भारत के लिए यह बात इसलिए ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि हमारा देश पहले ही कुपोषण की समस्या से जूझ रहा है। पर्यावरणीय कारणों, अंधाधुंध खेती और अति जल दोहन से जमीन रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही है। भारत में बंजर भूमि की बहुतायत है। यह खतरे की घंटी है। जिसे अनसुना नहीं किया जा सकता।

जलवायु परिवर्तन से कृषि पर मंडराते खतरे के प्रति अंतराष्ट्रीय संस्थानों ने भी आगाह किया है। एक रिपोर्ट के अनुसार निकट भविष्य में जलवायु परिवर्तन का कृषि व्यवसाय पर बुरा असर पड़ेगा। इससे खाद्य संकट की समस्या और बड़ जाएगी। बड़ी जनसंख्या वाले भारत जैसे देश में तो लोगों की उदरपूर्ति करना मुश्किल हो जाएगा। एक शोध अध्ययन के अनुसार तापमान में दो डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि होने से गेहूं की उत्पादकता में बहुत कमी आ जाएगी। वर्षा आधारित फसलों के अलावा रबी की फसलों को भी बहुत नुकसान होगा। वर्षा की मात्रा कम होने पर किसानों को सिंचाई के लिए कम पानी मिलेगा। जलवायु परिवर्तन से मिट्टी की उर्वराशक्ति भी कम होगी। पशुओं की दूध देने की क्षमता भी कम हो जाएगी। अगले एक दशक में हालात और जटिल होंगे।

हमारे देश में अधिकांश खेती असिंचित है। इससे कृषि विकास दर भी प्रभावित होगी। एक सर्वेक्षण के अनुसार यदि तापमान  एक डिग्री सेंटीग्रेड बड़ता है तो यह खरीफ के सीजन में किसानों की आय को 6.2 प्रतिशत कम कर देता है। इसी तरह असिंचित जिलों में रबी में 6  प्रतिशत की कमी कर देगा। वहीं वर्षाकाल में औसतन 100 मिमी बारिश की कमी होने पर खरीफ में किसानों की आय 15 फीसदी और रबी में 7  प्रतिशत की गिरावट हो जाती है। जबकि अति वर्षा से बाड़ से प्रभावितों की संख्या में 6  प्रतिशत का इजाफा हो जाता है। बता दें कि देश में 25  करोड़ लोग हर साल बाड़ से प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार ध्रुवीय क्षेत्र में तेजी से बर्फ पिघलने के कारण  समुद्र के जल स्तर में अचानक वृद्धि होने से देश के तटीय इलाकों में भी खतरा बडऩे की आशंका है। इन सब हालातों को देखते हुए जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को गंभीरता से लेने की जरूरत है, ताकि आने वाली खाद्यान संकट की चुनौतियों से निपटा जा सके।
 

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