पानी बचाओ नहीं तो एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ेगा

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 इंदौर। जल है तो जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि प्रकृति की इस अनुपम देन का हम मूल्य नहीं समझ रहे हैं। मानव अपने निज स्वार्थ के कारण न केवल जल का दुरूपयोग कर रहा है, बल्कि जल संरक्षण के प्रति भी लापरवाही भी बरत रहा है। इसीलिए देश में जल संकट गहराता जा रहा है। आइये  विश्व जल दिवस पर हम पानी बचाने का संकल्प लें।

उल्लेखनीय है कि प्रति वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1993 में संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा के द्वारा इस दिन को मनाने का निर्णय लिया गया था। इसका उद्देश्य वैश्विक जल संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों को प्रोत्साहित कर जल के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। इस वर्ष के विश्व जल दिवस की थीम - किसी को पीछे नहीं छोडऩा (लिविंग नो वन विहाइंड) है।

खेती के लिए भी पानी की कमी महसूस की जा रही है। बारिश की कमी से उत्पादन भी प्रभावित होता है। धरती का 70% से अधिक हिस्सा पानी से ढंका हुआ है। पृथ्वी का 96.5त्न पानी महासागरों में है। इसीलिए पीने योग्य पानी की मात्रा कम है, वहीं औद्योगिकीकरण और गलत गतिविधियों ने पानी को प्रदूषित कर दिया है। लगातार नीचे गिरते जलस्तर ने भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। हिमालय क्षेत्र उत्तराखंड में भूमिगत जलस्तर हर साल 50 सेमी नीचे खिसक रहा है। हमारे देश में भू-जल का अति दोहन हो रहा है। आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया में जितना भूमिगत जल निकाला जाता है उसका एक चौथाई हिस्सा अकेले भारत ही निकालता है, जो चीन और अमेरिका से भी ज्यादा है। इसीलिए उत्तरी और मध्य भारत के शहरों और गांवों में पेयजल संकट ज्यादा है। यह बात एक अंतर्राष्ट्रीय गैर लाभकारी संगठन वाटर एड के विश्लेषण में सामने आई है। 16.3  करोड़ लोगों के घरों  के पास स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। इनमें ग्रामीण क्षेत्र में 15त्न और शहरी क्षेत्र में 7त्न लोग शामिल हैं।

केंद्र सरकार द्वारा जल का समुचित उपयोग करने और भू जल का अतिदोहन नहीं करने की चेतावनी के बावजूद जब नागरिकों ने इसे नहीं माना तो अब सरकार ने भू-जल का दुरूपयोग रोकने और देश में सुदृढ़ भू-जल नियामक तंत्र विकसित करने के उद्देश्य से भू-जल दोहन पर आगामी 1 जून से  शुल्क वसूलने का फैसला किया है। सरकार के निर्देश पर केंद्रीय भू-जल प्राधिकार ने इसके लिए संशोधित दिशा निर्देश जारी किए हैं, जिसके अनुसार जल संरक्षण शुल्क की दरें इलाके की श्रेणी, उद्योग के प्रकार और भू-जल दोहन की मात्रा के हिसाब से अलग-अलग होंगी। सम्भावना है कि इससे अति भू-जल दोहन पर लगाम लगेगी। 

प्राय: देखा गया है कि बड़े शहरों से लेकर कस्बों तक में जल संरक्षण के प्रति उतनी गंभीरता देखने को नहीं मिलती, जितनी की अपेक्षा की जाती है। कई घरों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगाए जाने से बारिश का पानी छतों से नालियों और नालों में बहकर बर्बाद हो रहा है। शहरों में कॉलोनियों और मोहल्लों में सीमेंटीकरण का प्रचलन बढ़ गया है। इस कारण बारिश का जो पानी जमीन के भीतर जाना था, वह बंद हो गया। इससे भी भू-जल स्तर नीचे चला गया। इसे लेकर नगर निगम और आम नागरिक भी लापरवाह बने हुए हैं, जबकि भू जल बचाने का यही एकमात्र विकल्प है। इसलिए समय रहते पानी को बचाने के लिए इसका सीमित उपयोग करने, वर्षा जल को संग्रहित करने और पुराने जल स्रोतों की साफ-सफाई कर उनके पुनरुपयोग करने का संकल्प लेने से ही जल संकट से बचा जा सकता है, अन्यथा यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पानी की एक -एक बून्द के लिए तरसना पड़ेगा।

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