जीवनाशी रसायनों के प्रति इतनी उदासीनता क्यों

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देश में जीवनाशी (पेस्टीसाइड) रसायनों का उपयोग विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कम हो रहा है। इसके बाद भी इनके दुष्परिणामों की खबरें देश के विभिन्न भागों से आती रहती हैं। जीवनाशी रसायनों का उपयोग कीटनाशक, फफूंदीनाशक, खरपतवारनाशक, कृमिनाशक, चूहेनाशक आदि के रूप में होता है। ये रसायन देश ही नहीं पूरे विश्व में फसलों के खेत में तथा संग्रहित अनाज को भण्डारण में नियंत्रित कर खाद्यान्नों के सम्भावित नुकसान को बचाते हैं। एक अनुमान के अनुसार यदि विश्व में इन जीवनाशी रसायनों का उपयोग न हो तो हम फसलों का 40 प्रतिशत उत्पादन को खो देंगे।
भारत में आधुनिक जीवनाशी रसायनों का उपयोग तो वर्ष 1948 में आरंभ हो गया था, परन्तु इनका उत्पादन वर्ष 1992 से हुआ। जब कलकत्ता के निकट डीडीटी तथा बीएचसी का उत्पादन आरम्भ हुआ देश में इन रसायनों का उत्पादन वर्ष 1954 में जहां मात्र 434 टन था, वहीं यह बढ़कर वर्ष 2000 तक 46195 टन तक पहुंच गया। इन 46 वर्षों में इनके उत्पादन में 100 गुना से भी अधिक वृद्धि हुई। देश में जीवनाशी रसायनों का सबसे अधिक उपयोग कपास तथा धान की फसल पर होता है। परन्तु अभी भी देश में इन रसायनों का औसत उपयोग मात्र 290 ग्राम प्रति हेक्टेयर है। पंजाब में इनका उपयोग सबसे अधिक 740 ग्राम प्रति हेक्टेयर होता है। जबकि मध्य भारत के तीन राज्यों छत्तीसगढ़, राजस्थान तथा मध्यप्रदेश में इनका उपयोग मात्र 260, 50 तथा 30 ग्राम प्रति हेक्टेयर के मान से होता है। इन प्रांतों में इतना कम उपयोग एक चिन्ता का विषय है जो किसान तथा कृषि प्रसार अधिकारियों की उदासीनता को दर्शाता है।

देश में वर्ष 2015-16 में इन जीवनाशी रसायनों की खपत सबसे अधिक 11665 टन महाराष्ट्र में रही, इसके बाद खपत में उत्तर प्रदेश था जहां 10457 टन खपत थी। इनकी तुलना में मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में यह खपत क्रमश: 732, 2475 तथा 1625 टन थी। मध्य प्रदेश में इतनी कम खपत किसानों की पौध संरक्षण के प्रति उदासीनता को और उजागर करता है। जिसके परिणाम निश्चित रूप से उत्पादन व उत्पादकता पर पढ़ रहे हैं। इस ओर राज्य सरकार को गंभीरता से सोचना होगा।

देश में वर्तमान  में इन उत्पादकों का एक बड़ा उत्पादक बन गया है। वर्ष 2016-17 में देश से 174 हजार टन फफूंदनाशक, 76 हजार टन नींदानाशक, 54 हजार टन कीटनाशक तथा 70 हजार टन अन्य कृषि रसायनों का निर्यात किया गया। जिसे एक उपलब्धि के रूप में किया जा सकता है। परन्तु देश के भीतर इनकी इतनी कम खपत को भी अप्रबंधित व अनियंत्रित, यह एक विचारणीय विषय है। किसानों को इस ओर जाग्रत करने के लिए एक अभियान चलाने की आवश्यकता है।

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