मसालों में महाऔषधि अदरक लगायें

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मसालों में महाऔषधि अदरक लगायें

अदरक एक काफी गुणकारी मसाला फसल है। इसका उपयोग मसाले, चटनी, अचार तथा विभिन्न प्रकार की आयुर्वेदिक औषधीय बनाने में होता है। इसे सुखाकर सौंठ बनाई जाती है। विश्व मे सूखी अदरक (सौंठ) के उत्पादन में भारत का प्रथम स्थान है एवं विश्व के कुल उत्पादन का 30 प्रतिशत भारत में होता है। भारतीय सौंठ की गुणवत्ता काफी बेहतर होती है एवं विश्व बाजार में यह जमैका के बाद दूसरे नम्बर पर आती है। वैदिक काल से ही अदरक को 'महाऔषधि के रूप मे जाना जाता है। आधुनिक समय में भी इसे खांसी, जुखाम, जी मचलाना, अपच, गैस, उल्टी एवं पेट दर्द आदि में उपचार के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है। अदरक से कई परिरक्षित पदार्थ जैसे अदरक का शर्बत, अदरक का टॉनिक, अदरक का अचार तथा अदरक की चटनी आदि बनाये जा सकते हैं। 

जलवायु: अदरक के लिए गर्म और नम जलवायु की आवश्यकता होती है। तटीय क्षेत्र जहां 125-200 से.मी. वर्षा होती है अदरक की खेती के लिए उपयुक्त है। भारत में यह मुख्यत: केरल, मेघालय, उड़ीसा, आन्ध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल एंव मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में लगाया जाता है।
मृदा: अच्छे जल निकास वाली उर्वर बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है।
उन्नत किस्में: अदरक की उन्नत किस्में जैसे सुप्रभा, सुरभि, सुप्रिया, सुरूचि आदि है। अच्छी उपज के लिए उन्नत किस्मों के शुद्ध, निरोगी व अच्छे अंकुरण क्षमता वाली किस्में ही बोएं। 

बोनी का समय:
सिंचित दशा मे अदरक की बौनी मई-जून में की जाती है। असिंचिंत अवस्था में जुलाई के प्रथम सप्ताह में बौनी की जाती हैं। देर से बोनी करने पर पौधों की बढ़वार तथा उत्पादन में कमी आ जाती है साथ ही साथ राइजोमस् में सडऩ की संभावना बढ़ जाती है।

खाद एव उवर्रक:
अदरक के अच्छे उत्पादन हेतु प्राय: गोबर की खाद 25 से 30 टन प्रति हेक्टर के हिसाब से बुवाई से 25-30 दिन पहले खेत में अच्छी प्रकार से मिलाए ओर नत्रजन, स्फुर और पोटाश की क्रमश: 75:50:50 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से प्रयोग करें। नत्रजन की एक तिहाई, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोनी के समय दें। शेष नत्रजन को दो भाग में 30 दिन के अन्तराल पर टॉपड्रेसिंग के द्वारा दें एवं तुरंत सिंचाई कर दें।
बीज का चुनाव: अदरक की फसल को प्रकंदों (राइजोमस) द्वारा लगाया जाता है। राइजोमस 2.5 -5.0 सेमी लम्बाई के जिनका भार 30 से 35 ग्राम हो एवं जिन पर कम से कम दो कलिका (बडस) हो का चुनाव करें।
बीज की मात्रा व अंतरण: मध्यम आकार के 15-20 क्विंटल प्रकंद प्रति हेक्टर खेत के लिए पर्याप्त है। प्रकंदों की बुवाई के लिए कतार से कतार की दूरी 30 सेमी व पौधे की दूरी 15 सेमी रखें तथा कंदों को 15 सेमी उठी हुई क्यारियों मे 5 सेमी गहराई पर बोना चाहिए एवं बौनी के बाद हल्की सिंचाई करें।
बीजोपचार: बीज प्रकंदों को बोने से पूर्व 3 ग्राम डायथेन एम 45 प्रति लीटर पानी मे घोल बनाकर उसमे प्रकन्दों को बोनी से पूर्व 30 मिनिट तक डुबोना चाहिए। ऐसा करने से अदरक मेें प्रकंद विगलन की समस्या काफी कम हो जाती है। 
मल्चिंग: कंदों की बुवाई के तुरंत बाद भूमि को सूखी पत्तियों, पुआल आदि से ढक देना चाहिए। मल्चिंग करने से भूमि मे नमी संचित रहती है। एंव खरपतवार की रोकथाम व मृदा मे जींवाश पदार्थ की मात्रा बढती है।
सिंचाई: अदरक मे हल्की सिंचाई करना चाहिए ताकि सिंचाई का पानी खेत मे ज्यादा समय तक न रूके। बोने के समय खेत मे पर्याप्त नमी होना चाहिए। बोने से वर्षा ऋतु शुरू होने तक आवश्यकतानुसार 2 से 3 सिंचाई करना चाहिए। सर्दियों में 10-15 दिन के अंतर से सिंचाई करना उपयोगी सिद्ध होता है।
अतंरवर्तीय फसलें: अदरक का पौधा छाया मे अच्छी वृद्धि करता है इसके लिए अदरक के साथ मक्का, ज्वार, अरहर, अरण्डी आदि की बोनी कर सकते हैं।
कंदों की खुदाई: बोने के 7-8 माह बाद अदरक तैयार हो जाता है। जब पत्तियां पीली पडऩे लगे तथा सूखने लगे, उसके 20-25 दिन बाद खुदाई करके प्रकंदों को निकाल लेना चाहिए तथा खुदाई के बाद छाया मे कंदों को सूखाना चाहिए।
उपज: अदरक की अच्छी एवं समय से देखभाल करने पर एक हेक्टयर खेत मे 150-200 क्ंिवटल उपज प्राप्त होती है।

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