मंडी और मौसम की मार से ज्यादा घातक

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जमीन का जादू

चूँकि जमीन के मालिकाना हक या उसको लेकर होने वाले झगड़ों से कानून और व्यवस्था सबसे ज्यादा प्रभावित होती रही थी, इसलिए कलेक्टर को ही कानून व्यवस्था का जिम्मा भी दे दिया गया था।

तब से लेकर आज तक, यह व्यवस्था हू-ब-हू लागू है। लेकिन, इस बीच खुद कलेक्टर को या उनके साथ जुड़े अमले को, इतने सारे विकास के काम मिल गए कि जमीन का काम,दिखाई देने वाली प्राथमिकताओं से एकदम हट ही गया है।

'भारतीय किसानों की मुश्किलें मौसम की मार, या मंडी और बाजार की बेरुखी पर ही शुरू या खत्म नहीं होती। सरकारों में रखे जाने वाले जमीनों के हिसाब-किताब का मामला और इससे जुड़े सरकारी अमले की कारगुजारियां भी एक पके हुए फोड़े की तरह है। बचपन में आपने भी याद किया होगा कि 'भारत एक कृषि प्रधान देश है'। तभी तो इस देश को लूटने के लिए अंग्रेज आया था। चतुर अंग्रेज ने अपनी धन वसूली बढ़ाने के लिए,इसी खेती बाड़ी को सोने की खदान मानते हुए, सन् 1772 के आसपास 'कलेक्टर' नियुक्त किये थे।'

काला जादू

प्राथमिकता से हटने का यह मतलब कतई नहीं है कि यह काम हो ही नहीं रहा है। बाक़ायदा हो रहा है और 'काले जादू' में तब्दील होकर रोज बड़ा और बहुत बड़ा होकर तमाम भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र को मुंह चिढ़ा रहा है।

परम्परानुसार पच्चीस-तीस सालों में प्राकृतिक कारणों से जमीन में कुछ बदलाव आते हैं। इससे किसी की जमीन कम-ज्यादा, टेढ़ी-मेढ़ी या ऊबड़-खाबड़ हो जाती है। सबको सबकी जमीन बराबर मिल जाय और गाँव के निस्तार की जमीन भी निकल जाए, इसलिए 'बंदोबस्त' की व्यवस्था होती रही है। राजस्व या भू-अभिलेख की भाषा में यह बहुत महत्वपूर्ण शब्द या प्रक्रिया है। किन्तु पिछले बीस सालों से यह बंद है। इसके बंद होने से आपसी और सामाजिक सम्बन्ध तो बिखरे ही हैं, मूक पशुओं के चरने की जमीन भी दबंगों ने दबा ली हैं। इसको लेकर इतने विवाद हैं कि लगभग हर किसान किसी न किसी विवाद में फंसा ही है। नायब तहसीलदार से लेकर राजस्व मंडल तक कुल छह तरह की अदालतें लंबित मामलों से अटी पड़ी हैं और भ्रष्टाचार से बजबजा रही हैं।

नक्शे में मौजूद पर फाईल गुम

कागज या नक्शे में तो जमीन है, लेकिन भौतिक रूप से है ही नहीं। जमीन भी है, लेकिन उसकी फाइल गुम है। 'गूगल' कुछ कहता है, जमीन पर कुछ और है। इंदौर में एक ही जमीन के दो-दो नक्शे लेकर दो लोग घूम रहे थे। दोनों के नक्शों पर सचमुच के सरकारी सील सिक्के भी लगे हैं और मामला, अदालतों में बरसों से टप्पे खा रहा है।

इसीलिए मध्य प्रदेश के एक पुराने बड़े अफसर इसे 'काला-जादू' कहते हैं। राजधानी के एक वरिष्ठ पत्रकार इस हकीकत को जानते हुए कहते हैं कि यदि ऐसा ही रहा, तो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ भी दूसरों के रास्ते जाकर 'जंगल-राज' हो जाएंगे। जमीनों के हिसाब किताब में गड़बड़ी का आलम यह है कि अपनी नौकरी के दौरान तीन-तीन जिलों के कलेक्टर रह चुके अफसर भी सेवानिवृत्ति के बाद, अपनी जमीनों पर पहुँच कर 'चकरघिन्नी' हो गए।

सरकार के ही दो बड़े अफसर इसलिए भिड़ गए कि जमीन खरीदी के वक्त दोनों के अपने अपने रास्ते थे। किन्तु, मौके पर एक का रास्ता ही गायब मिला। जबकि इन सभी प्रकरणों में सभी सम्बंधित अफसरों ने अपनी पूरी संतुष्टि के लिए अपने तत्कालीन पदस्थी स्थान के भरोसेमंद मातहत, जो रेवेन्यू के जानकार भी थे, को भेजकर दिखवाया था, तभी सौदे भी किये थे।

दलालों, दबंगों की घुसपैठ से मुख्य सचिव भी परेशान

एक सेवानिवृत्त मुख्य सचिव ने बड़े दर्द के साथ एक बार कहा था कि प्रदेश के लगभग आधे कलेक्टरों को 'जमीन से जुड़ा' यह काम आता ही नहीं है। ऊपर से उनके माथे पर इतना काम है कि वे चाहकर भी, इसे सीख ही नहीं पाते। इसका फायदा नीचे का तंत्र उठाता है। दलालों और दबंगों की घुसपैठ से रोज नई-नई परेशानियां भी आ रही हैं। ये सब परेशानियां वक्त की मार से कम थोड़ी हैं।

नीचे के अमले से पूछो,तो वह अपने स्तर पर आये कई कामों का रोना रोते मिलेगा। मिलने वाले कई कामों का एक बड़ा ही मज़ेदार किस्सा है। एक धर्म-प्रेमी सरकार ने प्रदेश के सारे 'मंदिरों' की गिनती का फरमान प्रदेश भर के पटवारियों को भेजा। इस आदेश में टाइपिंग की गलती से 'मंदिर' का 'म''ब' टाइप हो गया। बस फिर क्या था, निर्धारित समय सीमा में जानकारी भेजने के जुनून में 'बंदरों' की गिनती हुई व पटवारियों को करनी भी पड़ी।

कामों की बहुतायत, राजनीति के नित-नए दबाव और सभी स्तर पर बैठे दबंग, दीमक की तरह भू-अभिलेख या राजस्व व्यवस्था को खाये जा रहे हैं और इसका असंतोष एक पके फोड़े का मवाद बनकर रिस भी रहा है।

इसमें सरकारी तंत्र का योगदान बराबरी का है। बरसों बरस तक सीमांकन-बटांकन नहीं होना आम बात है, जमीनों की फाइलें गुमना भी सामान्य है, पर जमीन का ही गुम जाना तो आपराधिक लापरवाही लगता है। खासकर तब, जब कोई व्यक्ति फौज की नौकरी कर वापस लौटता है, और उसकी जमीन गायब मिलती है।

ऐसा नहीं है कि सरकार में बैठा कोई भी आदमी यह बात जानता न हो। इस तरह के प्रकरणों के अदालतों में तीन-तीन, चार-चार पीढिय़ों तक लंबित रहने को जानते हुए ही,सरकार ने 'नेशनल जुडिशियल डेटा ग्रिड' की तरह 'रेवेन्यू कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम' बनवाया है। इसमें उन सभी छह स्तरों की अदालतों के लंबित प्रकरणों का 'ट्रैक' रखा जा सकेगा, जिन्हें इसी काम के लिए अधिकार दिए गए हैं।

राजधानी के एक वरिष्ठ पत्रकार का अनुभव तो और भी बड़ा दुखदायी है। वे अपनी पैतृक भूमि का सीमांकन व बटांकन कराने के लिए बाकायदा राज्यस्तरीय अफसरों, कमिश्नर और कलेक्टर से बात कर, परिवार के सदस्यों के साथ अपनी जमीन पर पहुंचे थे। इसमें सीमांकन-बटांकन की सारी वैधानिक प्रक्रिया भी पूरी की गई थी। इस सबके बावजूद, इस काम में लगे 6 रेवेन्यू इन्स्पेक्टर,चार पटवारी और चार कोटवार सुबह से शाम तक, उनकी पंद्रह एकड़ जमीन को सही ढंग से नहीं नाप पाए थे।

सर्वेयरों की सेटिंग

उन्हें बताया गया कि अब 'जरीब' से नपती बंद है, 'टोटल स्टेशन मशीन' से यह काम होता है। लेकिन, इस मशीन पर सबको काम करना नहीं आता। जिन एकाध-दो को ट्रेनिंग दी गई है, वे भी ठीक से काम नहीं कर पाते हैं। इसलिए इस काम को व्यापार बनाकर कई समानांतर सर्वेयर सब जगह घूम रहे हैं। इनकी सेटिंग बाक़ायदा ऊपर से नीचे तक है और भ्रष्टाचार अपनी जगह बरकरार है।

चूँकि यह विषय किसी भी सरकार का, कभी भी एजेंडा नहीं रहा, इसलिए, हालात बहुत खराब हैं और फिर 'कृषि कर्मण' टाइप के अवार्डों में ऐसी बातें देखी कहाँ जाती हैं ?
 

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