हरा-भरा लॉन लगाएं

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अच्छा लॉन तैयार करने के लिये प्रारंभ से ही पूर्व योजनाबद्ध विधि से कार्य करना आवश्यक है।

प्रमुख उद्देश्य: 

  • सुन्दरता में वृद्धि के लिये             
  • खेल के मैदान बनाने के लिये
  • मनोरंजन के लिये                   
  • वनस्पतिक उद्यानों/पार्को के लिये

प्रमुख विशेषतायें:

  • एक ही प्रकार की घास होना चाहिये। 
  • हरियाली में सर्दी-गर्मी दोनों मौसम को सहन करने की क्षमता हो।
  • हरियाली पूरे वर्ष कोमलता रंग और सघनता को बनाये रखने में सक्षम हो।
  • हरियाली खरपतवारों कीट व रोगों से प्रभावित न हो।
  • हरियाली पर ईमारतों एवं वृक्षों की प्रतिबिम्ब न पड़े।

स्थान का चयन और उसकी तैयारी: सधारणत: हरियाली (लॉन) किसी भी प्रकार की भूमि में बनाई जा सकती है, किन्तु स्थान का चयन बड़ी सावधानीपूर्वक करें इसके लिये ऐसे स्थान का चयन करें, जहां पर बंगले की छाया कम से कम पड़े और घर का पानी इक_ा न होता हो। मई-जून के महीने में हरियाली के लिये निर्धारित स्थान पर 45 से 60 से.मी. गहरी खुदाई करें। खुदाई के उपरांत मिट्टी को 2 सप्ताह तक खुला छोड़ दें ताकि मिट्टी सूर्य की किरणों से पूरी तरह तप जाए। खुदाई का कार्य तीन बार किया जाता है प्रत्येक खुदाई के समय ढेलों को तोड़कर बारिक बनाए और खरपतवारों की जड़ों को निकाल लें। बाद में भूमि को हल्के गार्डन रोलर की सहायता से समतल कर दें, समतल करने के बाद उसे पानी देें ताकि समतल होने का पता चल जाए और खरपतवार भी उग आते है उन्हें नष्ट करें।

आधुनिक गृह वाटिका में हरियाली या घास के मैदान (लॉन ) का एक विशिष्ट स्थान एवं महत्व है। एक उत्तम नियोजित हरियाली स्थान विशेष की शोभा बढ़ाने के साथ-साथ अन्य शोभाकार वृक्षों झाडिय़ों अलंकृत फूलों की क्यारियों की शोभा में भी अभिवृद्धि करती है। बगवानी के इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि हरियाली का महत्व प्राचीनकाल से चला आ रहा है। सभ्यता के विकास के साथ-साथ इसके निर्माण के गति में भी निश्चित रूप से वृद्धि हुई है यही कारण है कि आज गृह वाटिकाओं समुदायिक स्थानों, बंगलों, पार्को आदि में हरियाली को विशेष महत्व दिया जा रहा है। पाश्चात्य देशों में हरियाली को प्रधानता दी जाती है और बड़े उत्सवों के मौके पर बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा हरियाली को एक स्थान से खुरचकर उस स्थान विशेष की शोभा बढ़ाने के लिए बिछावन के रूप में उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि वहां पर हरियाली को एक व्यवसाय के रूप में उगाया जाता है।

खाद और उर्वरक: घास की अच्छी वृद्धि के लिये भूमि में पर्याप्त मात्रा में गोबर की खाद और उर्वरक डालना नितांत आवश्यक है। आमतौर पर 500 क्विंटल गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि के खुदाई के उपरांत जमीन में मिलाई जाती है। घास की अच्छी वृद्धि के लिये 500 से 700 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में 8-12 से.मी. गहराई तक मिला दें। भूमि में चूना उस समय तक नहीं मिलायें जब तक उसका पीएच इमान 5.5 से कम न हो, क्योंकि अधिकांश घासों की वृद्धि कुछ अम्लीय भूमि में अच्छी होती है। 

घास का चयन: हरियाली का निर्माण करने में घास का महत्वपूर्ण स्थान है अत: घास का चयन बड़ी सावधानी एवं सूझबूझ से करें।

विभिन्न क्षेत्रों में उगाई जाने वाली घास:

साइनोडान डेक्टाइलॉन, जोईसिआ जेपानिका, स्टेनोपहर्म सिकण्डेटम, डिकोहोण्ड्रा रीपेन्स, पोआ प्रेटिन्सस, फेस्क्यू ग्रॉस,पैस्पमलम डिस्टिक, पेनिसीटम क्लेण्डीसटावन। 

बीज द्वारा:  इस विधि का उपयोग उन क्षेत्रों में किया जाता है जहां पर रोपण के लिये घास उपलब्ध न हो, एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिये 12 से 15 कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है। बीज बोने का सर्वोत्तम समय वर्षा का प्रारम्भिक काल माना जाता है, भूमि में पर्याप्त नमी होना इस विधि में नितांत आवश्यक है। जब घास 4 से 5 से ऊंची हो जाए तो कटाई करके बाद में रोलर चलाया जाता है। हरियाली (लॉन) तैयार करने में समय अधिक लगता है और खरपतवारों का प्रकोप भी अधिक होता है। 

घास के टुकड़ों को चिपकाना : इस विधि में घास के तनों को जड़ सहित 5-6 से.मी. लम्बाई के टुकड़ों में काट लिया जाता है। दो भाग के टुकड़े, एक भाग गोबर की खाद, एक भाग ताजा गोबर व एक भाग बालू रेत मिलाकर लुगदी बना ली जाती है। इस तैयार लुगदी को जमीन की समतल सतह पर समान रूप् से इस प्रकार फैलाया जाता है कि कोई भी जगह खाली न रहे। इसे नम बनाने के लिये हल्की सिंचाई की जाती है।

घास की पट्टियां: इसमें छोटी-छोटी हरी घास सघन एवं खरपतवार रहित स्थान से चुनी जानी चाहिए। इसको पटिटयों के रूप् में निकाला जाता है। ये पट्टियां तैयार समतल जमीन पर बिछा दी जाती है और रोलर चलाकर पानी दे दिया जाता है। ऐसा करने से घास जल्दी स्थापित हो जाती है। 3 महीने में घास मशीन द्वारा कटाई के लिए तैयार हो जाती है।

घासों को सुराखों मेें लगाना : इस विधि में पूर्णतया पकी और छोटी शाखाओं वाली घास का उपयोग करें। इस विधि में खुर्पी की सहायता से जड़ सहित घास को निकालकर उसे समतल भूमि में 5 से 5 से.मी. के फासले पर सुराख बनाकर छोटे -छोटे गुच्छों के रूप में लगा देेते हंै घास लगाने के उपरान्त चारों तरफ से भली -भांति दबा दें और बाद में रोलर चलाकर सिंचाई कर दें। इसके उपरान्त भूमि की किस्म, वातावरण के अनुसार सिचंाई करते रहें,  लगभग 30 से 40 दिन बाद घास की जड़ों की बढ़ोत्तरी शुरू हो जाती है लगभग दो महीने बाद हरियाली (लॉन) दिखाई देनी शुरू हो जाती है। उसके उपरान्त कांट -छांट करें।

हरियाली की देखभाल: 

नियमित सिंचाई- हरियाली की घास की उत्तम वृद्धि और वांछित रंग के लिये हल्की सिंचाई नितांत आवश्यक है, गर्मियों में 4-5 दिन के अंतर से और सर्दियों में 15-20 के अंदर में सिंचाई करें एवं सिंचाई हल्की की जाए।

कटाई एवं बेलन चलाना - घास को सुन्दर एवं समतल बनाने के लिये उसकी कटाई उस समय तक की जाये जब तक घास 15 से.मी. लम्बी हो जाए। सधारणत: ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु में 8-10 दिन के अंतर पर करें जबकि शरद ऋतु 20-25 दिन के अंतर पर करेें।

उर्वरक डालना - हरियाली में उर्वरक डालने के लिये यूरिया, सिंगल सुपर फास्फेट, म्यूरेट ऑफ पोटाश 5:3:1 के अनुपात में मिश्रण तैयार करके 250 कि.ग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से फरवरी अप्रैल व जून के महीनों में समान रूप से डालें।

पलवार (मल्चिंग) - शीतोष्ण क्षेत्रों में जहां पाला पडऩे की आशंका होती है वहां घास को पाले से बचाने के लिये सूखी पत्तियों या सूखी घास को ढककर रखा जाता है, जबकि उष्ण क्षेत्रों में पलवार करने से हानि होती है।

खरपतवार नियंत्रण- उच्चकोटि की हरियाली के लिये घास के साथ उगे खरपतवारों और दूसरी किस्म की घासों को निकालना नितांत आवश्यक है। साल में 3-4 बार घास निकालने की आवश्यकता होती है।

कीट व रोग नियंत्रण - हरियाली में दीमक, केचुए, चीटियां, चूहे और फफंूद आदि क्षति पहुंचाते हैं। अत: इनकी रोकथाम की ओर पर्याप्त ध्यान देना नितान्त आवश्यक हो जाता है केंचुए और दीमक की रोकथाम के लिए 2 किलोग्राम क्लोरोपायरीफास चूर्ण को 300 मीटर क्षेत्र से समान रूप से बिखेर दें। चीटियों को नष्ट करने के लिए कार्बन डाई-सल्फाइड की एक चम्मच मात्रा को इनके बिलों में डालकर जिंक फॉस्फाइड या राइटोबार इनके बिलों में रखें। यदि केंचुओं का अधिक प्रकोप हो तो 2.5 किलोग्राम लेड आर्सिनेट प्रति 300 वर्गमीटर की दर से समान रूप से बिखेरें।

हरियाली को आराम देना - उन हरियाली को आराम देने की आवश्यकता होती है जिनका उपयोग खेलकूद या मनोरंजन या साधनों लिये किया जाता है। इस प्रकार की हरियाली के निरंतर उपयोगी में आने के कारण उनमें उगी घास की वृद्धि रूक जाती है। 

पुरानी हरियाली का नया रूप: जब हरियाली कई वर्ष पुरानी हो जाती है तो वह अभद्र दृश्य प्रस्तुत करती है। अत: ऐसी हरियाली को नया रूप देने की आवश्यकता होती है। ऐसा करने के लिए निम्न कार्य की आवश्यकता होती है -

  • उर्वरकों का नियमित उपयोग  
  • जल निकास की उचित व्यवस्थ 
  • घास की आवश्यकतानुसार कांट-छांट 
  • खरपतवारों को निकालना  
  • कीट व रोगों से बचाव के लिये उचित पौध संरक्षण उपाय । 
  • हरियाली को नव जीवन देने के लिए वर्ष में एक बार (मई के महीने में) घास को बहुत नीचे से काटकर गुड़ाई करके गोबर की खाद एवं मिट्टी का मिश्रण की एक हल्की परत सम्पूूर्ण हरियाली के ऊपर समान रूप सेे बखेर सिंचाई करें। ऐसा करने से घास ओजवान (विगर) और कोमल बनी रहती है। 

 

  • सोनू दिवाकर द्य ललित कुमार वर्मा,
  • हेमंत कुमार द्य एस.पी.शर्मा
  • तोरण लाल साहू द्य पल्लवी वर्मा 
  • email : lalitkumarverm@gmail.com
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