ऋणमुक्ति की भैंस कहीं पानी में न चली जाय!

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ऋणमुक्ति की भैंस कहीं पानी में न चली जाय!

किसानों की ऋण मुक्ति पर तीन राज्यों में राजनीतिक 'तख्ता पलटÓ हुआ है। उससे बड़ी बात यह है कि बाजार और मौसम सहित कई चीजों में निरंतर पिट रहे किसानों के चेहरे पर ख़ुशी, उत्साह और भरोसा भी आया है।

इस नीति और सरकार की नीयत पर उसके राजनीतिक विरोधियों को भले शक हो, पर समझदार आम आदमी को अभी भी इससे बड़ी उम्मीद है। लेकिन, इसके क्रियान्वयन की बारी आते ही, लगभग सभी के पाँव फूल गए हैं, और नीचे की जमीन सरक सी रही है।

इंदौर से भोपाल आते हुए मैंने खुद देखा कि चार बड़े कस्बों की सहकारी समितियों के दरवाजों पर, हजारों की तादात में मोटर साइकलें खड़ी थीं, और दीवारों पर लगी ऋण-मुक्ति की लिस्टों पर भयंकर बवाल मचा हुआ था।

जितने मुंह उतनी ही बातें, किसी ने बैंक से कर्ज लिया ही नहीं, और वह कर्जदारों की लिस्ट में है, वहीं किसी ने लिया है, किन्तु कर्ज माफी बहुत ही कम रकम की हुई है।

चूँकि साख सहकारी समितियों और बैंक की कस्बाई शाखाओं में कर्मचारी भी कम हैं, जो हर किसान से बात कर सकें, इसलिए 'माथाफोड़ीÓ अब खतरनाक स्तर की भी हो रही है। लिस्टों के आधार पर यदि किसान असंतुष्ट है, तो उससे गुलाबी रंग का फार्म भरवाया जा रहा है। जिसकी जांच होगी। अकेले इंदौर संभाग में ही लगभग 25 हजार गुलाबी फार्म अभी तक आये हैं। स्थानीय जिले और प्रदेश स्तर पर जब पूछा गया कि इन 'गुलाबी फार्मोंÓ का अब क्या होगा? जवाब सब जगह समान था कि 'जांच होगीÓ। जांच कैसी होगी? तो बताया गया कि ऐसे किसानों के फार्म निकलवाए जाएंगे, उनके दस्तखत की कोई हस्ताक्षर विशेषज्ञ जांच करेगा, आरोप पत्र दिए जाएंगे, अदालत से दोषी को कड़ी सजा दिलवाई जायेगी। गवाह, बयान, रिपोर्ट और निर्णय के बीच कितना वक्त लगेगा, किसी को नहीं मालूम, तब तक उस किसान की ऋण-पात्रता या अगले कर्जे का क्या होगा, यह भी किसी को नहीं मालूम। मतलब, भरोसा नहीं कि 'भैंस कब और किस स्तर पर पानी में चली जाएÓ। अफसरों ने इसमें भी एक 'लोचाÓ निकाल लिया है कि फर्जी लोन है, तो किसान को समझा-बुझाकर 'हाँÓ करा ली जायेगी। कुछ पैसे भी दिए जाएंगे और कर्जे को तो घोषणा अनुसार माफ होना ही है। यानी 'साहबÓ की तो उस हालत में भी चांदी ही है। भोपाल में एक उच्च पदस्थ अफसर से जब पूछा गया कि-आखिर यह सब हो कैसे गया? बैंक वालों ने तो सबको आँखों देखते मक्खी निगलवा दी। उनका बड़ा ही मासूम जवाब था कि जब आप पढ़े-लिखे शहरी भी बैंक में कर्जा लेने जाते हैं, तो बिना पढ़े कई जगह किसी के कहने पर दस्तखत करते हैं, वैसे ही गाँव-कस्बों और किसान के स्तर पर भी हुआ होगा। सहकारी बैंकों में गड़बड़ी का आलम तो यह भी है कि बैंक की सिल्लक (नकद राशि) बड़ी मात्रा में ऐलानिया हफ्तों बाहर घूमी थी, लोग पकड़े भी गए, लेकिन अदालत से सब छूट आये। बैंक सिल्लक के राजनेताओं द्वारा उठा लेने और वापरने के भी बहुत किस्से हैं।

ऋण मुक्ति के बहाने, अब यह बड़ा ही नहीं, बहुत बड़ा आर्थिक घोटाला सामने आने की उम्मीद है। यह सब तब हुआ है जब गाँव-गाँव 'डिजिटल मेम्बरशिप रिकॉर्डÓ की बात हो रही है, पीओएस मशीन से सौदे हो रहे हैं। हर व्यक्ति का आधार कार्ड कई जगह जुड़ा हुआ है। यानी कस्बाई व ग्रामीण स्तर के समिति और बैंक मैनेजरों की हिम्मत और होशियारी की तो बलिहारी ही है। इस पूरे प्रकरण में हजारों नहीं, तो सैकड़ों करोड़ रुपयों का घपला तो अभी-अभी सामने ही दिख रहा है। जिससे बात करो वह मैनेजरों और उनके दलालों पर ही शक कर रहा है। एक जिम्मेदार अफसर ने कहा है कि यह तो Óआइसबर्गÓ का छोटा सा कोना है। अंदर खेल बहुत बड़ा होगा। मैनेजरों से पूछो तो उनका भी एक ही जवाब है, कि यह ऋणमुक्ति, कोई पहली तो हुई नहीं है, हर बार किसान योजना की बारीकियों को समझे बिना ऐसा ही हल्ला मचाते हैं। लेकिन इन ÓसाहबोंÓ के पास बैंकों और समितियों में पल रहे दलालों की उपस्थिति का कोई जवाब नहीं है। बात मानिये जितने दलाल आजकल सभी बैंकों में घूम रहे हैं, उतने तो मंडी में भी नहीं होते।

मध्य प्रदेश में सरकारी हिसाब से पता चलता है कि 31 मार्च, 2018 तक लगभग 61 लाख किसानों पर करीब 62 हजार करोड़ का कर्ज था। सरकार ने अपनी घोषणा के अनुरूप धन का प्रावधान कर 15 जनवरी 2019 से पंचायत स्तर पर कार्यवाही भी शुरू कर दी। किन्तु, जैसे ही चीजें जमीन पर आईं, सारा गजब सामने ही आ गया।

ग्वालियर जिला सहकारी बैंक की शाखा चीनोर में एक हजार से ज्यादा किसानों के नाम से कोई 'भूतÓ 50 लाख ले गया। भूमिहीन और खेतिहर मजदूर भी वहां के फर्जी कर्जदार हैं। राजधानी से सटे गांवों के किसानों के जितने रुपयों के कर्ज माफ हुए हैं, वे मजाक तो नहीं, बैंक वालों के अपराध ज्यादा लगते हैं। जैसे मजाकनुमा चेक पहले फसल बीमे के आये थे, वैसी ही अब कर्जमाफी हुई है।

शायद आपको याद हो, कि देश में अपनी तरह के अकेले पत्रकार पी साईंनाथ की पुस्तक 'एवरीबॉडी लाइक्स गुड ड्राटÓ में उन्होंने लिखा था कि हर आपदा सरकारी अफसरों की कमाई का बड़ा मेला होती है। आपदा के समय आई नकद पैसों की फसल अफसर ही काटते हैं।

होशंगाबाद और हरदा जिलों के कुछ आंचलिक पत्रकारों से पूछें, तो वे यही कहेंगे कि हमारे यहाँ ही नहीं, सारे प्रदेश में समर्थन मूल्य पर होने वाली खरीद अफसरों की लूट का 'उत्सवÓ होती है और खाद-बीज की कमी भी खेती बाड़ी से जुड़े अफसरों की कमाई का त्यौहार होता है। हरदा जिले की खेड़ा, नीमगांव, कड़ोला और बड़ा अबगांव समितियों में इस तरह के मामले ज्यादा हैं। श्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी के अपराधी भी साख और सहकारी क्षेत्र के कर्मचारी और अफसर ही थे। इसीलिए उस बात के सिर्फ दर्द ही सबको याद हैं। ऋणमुक्ति के अपराधी भी कारकून ही हैं।

यदि अभी इन पर सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई,तो वक्त निकल जाएगा। इन्हें अभी नहीं पकड़ा गया तो वाकई भैंस पानी में जरूर चली जायेगी। फिर चुनाव का परिणाम भी प्रभावित हो जाएगा।

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