मौसम का पूर्वानुमान

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मौसम-विज्ञान का  इतिहास: 

हजारों सालों से लोग  मौसम की भविष्यवाणी करते आ रहे हैैं। आज से  650 ईसा पूर्व युनान के लोग बादलों की बनावट के आधार पर मौसम का पूर्वानुमान करते थे। 340 ईसा पूर्व अरस्तू ने अपने ग्रंथ 'मीटिराफलॉजिका' में मौसम की व्याख्या की थी। चीन में भी करीब 300 ईसा पूर्व से मौसम की भविष्यवाणी संबंधी जनश्रुतियां प्रचलित रही हंै। भारत में महाकवि घाघ एवं भड्डरी की कहावतें ख्ेातीहर समाज का पीढिय़ों से पथ प्रदर्शन करते आये है। उत्तर प्रेदेश बिहार एवं उत्तरी छत्तीसगढ़ के गांवों में भी आज भी काफी लोकप्रिय है। सामान्यता मौसम पूर्वानुमान की प्राचीन विधियां विभिन्न घटनाओं के अवलोकन पर अधारित रही है। उदाहरण के लिये यदि सूर्यास्त लाल रंग के साथ होता है तब इस अवलोकन के आधार पर यह माना जाता है कि आने वाले दिनों में मौसम साफ रहेगा। मौसम संबंधी ये अनुभव मौसम के बारे पीढिय़ों से चली आ रही है जनश्रुतियों पर आधारित रहे हैं। हालांकि सभी भविष्यवाणियां विश्वसनीय साबित नहीं होती हंै। और उनमें से भी कुछ भविष्यवाणियां तो सांख्यिकी के पैमाने पर भी खरी नहीं उतरती हैं। कुछ लोगों का मौसम का पूर्वानुमान आसान लगता है। उदाहरण के लिये क्षितिज में काले बादल घिर आये हो एवं हवा भी उसी दिशा चल  रही हो एवं हवा में अधिक नमी हो तो कुछ ही घ्ंाटों में बारिश होने की भविष्यवाणी करना आसान होता है। इसी प्रकार यदि ठंड के दिनों में बादल हों और शाम को आसमान साफ हो जाए तब रात में तापमान के तेजी से कम होने की भविष्यवाणी करना आसान हो जाता है। बादलों को देखकर और हवा के गति के अनुसार मौसम के भविष्यवाणी करने के अलावा विज्ञान और दक्ष गणितीय अवधारणाओं पर आधारित होने के कारण आधुनिक पूर्वानुमान प्रौद्योगिकी अधिक सही साबित होती है आज हम जिस मौसम विज्ञान  को जानते हैं वह वैज्ञानिक रूप से सत्रहवीं सदी में तापमापी व वायुदाब मापी के अविष्कार होने और वायुमण्डलीय गैसों के व्यवहार संबंधी नियमों के प्रतिपादन के बाद अस्तित्व में आाया था। सन् 1636 में ब्रिटिश खगोल वैज्ञानिक एडमंल हैली ने भारतीय ग्रीष्म मानसून पर अपना शोध-प्रबंध प्रस्तुत किया था, जिसमें उन्होने हवाओं की मौसमी प्रवृत्ति को एशिया क्षेत्र के भूमि और हिंद महासागर के बीच के तापमान में अंतर के लिये जिम्मेदार बताया गया था। लेकिन इस समय भी मौसम पूर्वानुमान एक सपना मात्र ही था।

मौसम पूर्वानुमान के वर्तमान युग की शुरूआत सन् 1937 में टेलीग्राफ के अविष्कार के बाद से मानी जाती है। इसे पहले किसी बड़े क्षेत्र में मौसम संबंधी सूचनाओं को एकत्र कर पाना संभव नहीं था। सन् 1840 के अंत तक टेलीग्रॉफ  के अविष्कार ने मौसमी स्थितियों को तत्काल प्राप्त करना संभव बना दिया जिससे संभावित स्थितियों के बारे में पुर्वानुमान करने मे काफी मदद मिलने लगी थी, सन् 1922 मे ब्रिटिश भौतिक विद एवं मनोवैज्ञानिक लेविंस फ्राई रिचर्डसन ने संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान की सम्भावना का प्रस्ताव रखा था, हालांकि उस समय पूर्वानुमान के लिये आवश्यक आंकड़ों की बहुत अधिक मात्रा में जटिल गणना करने वाले तीव्र कम्प्यूटर उपलब्ध नहीं थे। संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान का व्यवहारिक उपयोग 1955 में जब इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर का विकास हुआ तब से आंरभ माना जाता है। 

मौसम का हमारे दैनिक जीवन से गहरा संबंध है। हर कोई यह जानना चाहता है कि आने वाले दिनों का मौसम कैसा होगा वास्तव मे मौसम पुर्वानुमान काफी समय से लोगों के बीच हंसी का विषय बना हुआ है जिसके कारण वर्तमान में अनेक लोग पुर्वानुमानों के प्रति गंभीर नहीं होते हैं। मौसम पूर्वानुमानों की अनिश्चितता के चलते लोगों के मस्तिष्क में इससे संबंधित कई प्रश्न उठते है जैसे मौसम का सही-सही अनुमान क्यों नहीं लगाया जा सकता। मौसम पूर्वानुमान कैसे किया जाता है। हम इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानने की कोशिश करेंगे। मौसम पुर्वानुमान द्वारा अगामी घंटों, आने वाले दिनों या अगले सप्ताह में संभावित मौसम की भविष्यवाणी की जाती है। मौसम का अध्ययन करते हुए मौसम संबंधी भविष्यवाणी करने वाले वैज्ञानिक कहा जाता है । वर्तमान में मौसम पूर्वानुमान के लिये मौसम वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न स्थानों पर अधारित मौसम के आंकड़ों उपग्रह से प्राप्त चित्रों व आकड़ों और सुपर कम्प्यूटरों का उपयोग किया जाता है, हालांकि पहले इनका उपयोग नहीं किया जाता था।

मौसम का पूर्वानुमान लगाना : 

मौसम पूर्वानुमान का आरंभिक चरण में मौसम और मौसमी आंकड़ोंं से संबंधित सूचनाएं प्राप्त की जाती हैं। भूमि की सतह के साथ ही विश्व भर में दिन में दो बार छोड़े जाने वाले गुब्बारों की मदद से वायुमंडल के विभिन्न स्तरों से मौसम संबंधी आंकडो़ं को एकत्र किया जाता है। वायुमंडल की विभिन्न ऊंचाईयों मौसमी गुब्बारों की मदद से तापमान, दाब, आद्र्रता, और पवन गति जैसे मौसमी आंकड़े प्रतिदिन रिकॉर्ड किए जाते हैं।

मौसम पूर्वानुमान में उपयोगी अन्य दूसरी तकनीक उपग्रह प्रौद्योगिकी में उपग्रह मौसम वैज्ञानिकों को दिन के किसी भी समय बादलों का दृश्य उपलब्ध कराते हैं। अलग-अलग समय में बादलों की स्थिति के आधार पर हवा व बादलों की गति के बारे में पता लगाया जा सकता है। कृषि संबंधित मौसम पूर्वानुमान क्षेत्र की कृषि मौसम विभाग के वेद्यशाला से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर कृषि मौसम सलाह सेवायें प्रदान की जाती है। यह सेवायें 1800-180-1551 नम्बर में फोन लगाकर, पंजीकृत  मोबाईल में मौसम संबंधी सलाह संदेश प्राप्त कर, समाचार चैनलों/समाचार पत्रों  आदि के माध्यम से कृषि मौसम संबंधी सलाह सेवा का लाभ ले सकते है। 

मौसम वैज्ञानिक मौसम पूर्वानुमान में डॉप्लर रेडार का उपयोग भी करते है। डॉप्लर रेडार में डॉप्लर प्रभाव को आधार बनाकर हवा की गति मापी जाती है, वैज्ञानिकों ने मौसम विशेषकर टांरनेडों और हेरिकेन जैसे खराब मौसम के बारे अधिक जानकारी प्राप्त की है। डॉप्लर रेडार द्वारा न केवल बादलों में बनने वाली वर्षा और हिम बल्कि तूफान के अंदर की हवा को भी देखा जा सकता है। मौसम पूर्वानुमान में बहुत अधिक संख्या में विभिन्न कारकों व उच्च तकनीकी उपकरणों के उपयोग के शामिल होने के बाद भी मौसम की भविष्यवाणी करना आसान कार्य नहीं है, इसका एक कारण मौसम पूर्वानुमान में वायु, तापमान, वायुदाब हवा की दिशा एवं वेग और हवा में नमी की मात्रा को किसी समय एक साथ हजारों स्थानों पर मापना होता है। जो अपने आप में एक बड़ा काम है। सुपर कम्प्यूटर द्वारा समय के साथ तरल अवस्था होने वाले परिर्वतन से संबंधित जटिल समीकरण को हल किया जाता है। कम्प्यूटर में आंकड़े प्रेषित किये जाने पर संख्यात्मक मॉडल के आधार पर मौसम मानचित्र पर पूर्वानुमान देखा जा सकता है। मौसम वैज्ञानिक मौसम मानचित्र को देखकर उस पर उपस्थित आंकड़ों के आधार पर मौसम का पूर्वानुमान करने समर्थ होते हैं। 

पूर्वानुमान लगाना: 

प्राय: अल्पकालीन मौसम पूर्वानुमान आगामी 72 घंटों के लिये किया जाता है जिसमें किसान वर्षा, शीतलहर,  लू  व आंधी से संबंधित सलाह दी जाती है। 3 -10 दिन  तक के पूर्वानुमान को मध्यम अवधि का पूर्वानुमान कहते हंै जिसमें किसान को तापमान, वर्षा संबंधित पूर्वानुमान किया  जाता है एवं 10 दिन से लेकर एक सीजन तक के पूर्वानुमान को दीर्घकालीन मौसम पूर्वानुमान कहते हैं। इसमें किसान भाइयों के खेती के लिये फसल योजना निर्माण हेतु आवश्यक सलाह दी जाती है।

  • यमलेश कुमार निषाद 
  • email: yamleshnishad@gmail.com
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