दूध संबंधी रोचक बातें

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दूध क्या है ?

प्रकृति में कुछ सस्तन प्राणी हैं मतलब जिन मादाओं को स्तन होते हैं उन्हें सस्तन प्राणी कहा जाता है। उदा. गाय, भैंस, बकरी, भेड़, बंदरिया, शेरनी, घोड़ी, कुतिया, बिल्ली यह मादाएं प्रसूत (ब्याने पर) होने पर उनके अयन में स्थित विशेष अॅलव्हीओलाय पेशियों में 24 गंटे दूध बनता रहता हैं। यह स्त्राव (दूध) वह अपने नवजात बच्चे को पिलाती हैं। लेकिन प्रसव उपरांत शुरूआती 4-5 दिनों तक थनों से निकलने वाले चिपचिपे पदार्थ को दूध नहीं कहते। उसे खीस या चीका (अंग्रेजी में कोलोस्ट्रम) कहते हैं। इसे पिलाने से नवजात बच्चे के शरीर में रोग-प्रतिरोधी शक्ति पैदा होती है जो उसे कई संक्रमणों से बचाती हैं। अत: जन्म के पश्चात आधे घंटे के भीतर उसे खीस पिलाना निहायत जरूरी होता है। धीरे-धीरे खीस की जगह सामान्य दूध का स्त्रवण शुरू होता है जो गाय में करीब 8-10 महिनों तक शुरू रहता है। दूध पीने से बछड़े को पोषण मिलता है।

दूध में ऐसी कौनसी चीजें होती हैं जिसके कारण उसे पीने वाले बच्चे को पोषण प्राप्त होता है? गाय के दूध में करीब 88 प्रतिशत पानी होता है और शेष 12 प्रतिशत कुल ठोस पदार्थ होते हैं। इसके दो भाग होते हैं जिनमें 3.5 प्रतिशत वसा (फॅट या मलाई) होती हैं तथा 8.5 प्रतिशत वसा विरहित घन पदार्थ होते है। इसमें प्रोटीन, दुग्धशर्करा (यानि लॅक्टोज) खनिज पदार्थ तथा विटामिन्स (यानि जीवनसत्व) होते हैं।

  • भैंस के दूध में करीब 6 प्रतिशत वसा तथा 9 प्रतिशत वसा विरहित ठोस पदार्थ और 15 प्रतिशत कुल ठोस पदार्थ होते हैं।
  • दूध में उपस्थित प्रोटीन से शरीर में मौजूद स्नायुओं को ताकत मिलती हैं, शरीर में संप्रेरकों का निर्माण करने में इनकी भूमिका होती है, शरीर की घिसी हुई पेशियों का मरम्मत का कार्य इनसे चलता है।
  • दूध में उपस्थित लॅक्टोज (यानि दुग्ध शर्करा) से शरीर को ऊर्जा मिलती हैं। खनिजों से हड्डियां मजबूत बनती हैं, रोग प्रतिबंधक शक्ति बरकरार रहती हैं। जीवनसत्व अ बी कॉम्लेक्स, डी,ई तथा के शरीर में विभिन्न कार्य करते है। उदा.जीवन सत्व अ से आंखों का स्वास्थ्य ठीक रहता हैं दृष्टि सामान्य रहती हैं। जीवनसत्व ई तथा के प्रजनन क्षमता को बरकरार रखने में सहायक होते हैं। जीवनसत्व 'बी' काम्लेक्स गुट के राइबोफ्लेबीन शर्करा के चयापचय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इससे ज्ञात होता है कि दूध पीने से स्वास्थ्य पर कई अच्छे प्रभाव होते हैं। हाल ही में राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल, हरियाणा में हुए अनुसंधान से ज्ञात हुआ है कि देशी गायों के दूध में उपस्थित होता हैं जो बहुत फायदेमंद होता हैं। भारत में ज्यादातर लोग शाकाहारी हैं। अत: उनके लिये दूध में मौजूद प्रोटीन केसीन, लॅक्टोअल्कमीन तथा लॅक्टोग्लोब्लुयीन यही अच्छे प्रोटीन के स्त्रोत हैं। अक्सर कई लोगों के जेहन में यह प्रश्न उपस्थित होता हैं कि गाय का दूध अच्छा था भैंस का? इसका  जवाब यह है कि कम शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्ति, बैठकर ज्यादातर काम करने वाले व्यक्तियों के लिये ज्यादा ऊर्जा की जरूरत नहीं होती और गाय के दूध में वसा की मात्रा कम होती हैं अत: उससे कम उर्जा प्राप्त होती हैं। अत: उनके लिए गाय का दूध पीना अच्छा होता हैं। इसके विपरीत बहुत ज्यादा शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्तियों की शारीरिक ऊर्जा की आवश्यकता ज्यादा होती हैं। अब भैंस के दूध में वसा तथा कुल ठोस पदार्थों की मात्रा ज्यादा होने से उससे अधिक ऊर्जा प्राप्त होती हैं। अत: ज्यादा शारीरिक परिश्रम करने वाले लोगों के लिये भैंस का दूध पीना नुकसानदेह नहीं होगा और वे उसे आसानी से पचा सकते हैं।

दूध सबको ज्ञात है लेकिन  विज्ञान के दृष्टिकोण से दूध क्या है? उसका महत्व क्या है? दूध क्यों खराब होता है? कैसे खराब होता हैं? क्या ऐसा दूध मानव को पीना चाहिए? दूध की गुणवत्ता क्या होती हैं? कौनसा दूध बच्चों के लिये अच्छा होता हैं? कौनसा दूध बूढ़े, बीमार लोगों के लिये अच्छा होता हैं? ऐसे कई सवाल जेहन में आते हैं। इन्हीं सवालों के जवाब देने का तथा दूध संबंधित कुछ रोचक तथ्य प्रस्तुत करने का इस लेख में प्रयास किया गया है।

अब सवाल यह आता है कि बूढ़े, बीमार व्यक्ति या वे व्यक्ति जिनकी पाचनशक्ति कमजोर हैं उनके लिये कौनसा दूध अच्छा हैं? तो इसका जवाब हैं बकरी का दूध। जी हाँ, क्योंकि इसका मुख्य कारण यह हैं कि बकरी के दूध में वसा के कण अत्वंत महीन(बारीक या छोटे-छोटे) होते हैं जिसकी वजह से उसे पचाना बहुत आसान होता हैं। इसे प्राकृतिक रूप से एकजीव दूध कहा जाता है वह सही है। डेयरी से प्राप्त बोतल का पॉलीथिन थैली में मिलने वाला दूध छना हुआ, कचरायुक्त, पाश्चरीकृत तथा कई बार होमीजिनाइजड, यानी एकजीव किया हुआ होता हैं अत: उसे गर्म करने पर उसकी सतह पर मलाई की परत नहीं जमती। इस दूध की रसायनिक भौतिक तथा सूक्ष्मजीवशास्त्रीय गुणवत्ता बेहतरीन होती हैं। 

अर्थात् वह दूध मानवी सेवन हेतु सुरक्षित होता हैं। वहीं साफ 'दुग्ध उत्पादन तकनीकी' न अपनाने वाले ग्वाले के दूध में मलाई तो अच्छी मिलेगी लेकिन उसमें कई तरहके सूक्ष्मजीवाणु तथा रोगाणु होने की संभावना रहती हैं। 

  • डॉ. सुनील नीलकंठ रोकड़े
  • मो.: 9850347022
  • प्रधान वैज्ञानिक (पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन),  केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर (महाराष्ट्र)
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