देश की आवश्यकता अनुसार फसल लें किसान

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देश में कृषि उत्पादों के निर्यात में बहुत उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, जिसका असर देश के भीतर इनके मूल्यों में देखने को मिलता है। इसका प्रभाव देश के किसानों पर सीधे रूप से पड़ता है और उन्हें ऐसी स्थिति में आर्थिक नुकसान सहना पड़ता है। वर्ष 2012-13 में जहां कपास के निर्यात से 20277 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा अर्जित की गई थी, वहीं वर्ष 2016-17 में यह घटकर लगभग आधी 10982 रुपए रह गई। कृषि उत्पादों के मामले में अब बासमती चावल, कपास के स्थान पर प्रथम स्थान में पहुंच रहा है। वर्ष 2012-13 में इसका 10409 करोड़ रुपए का निर्यात किया गया था, जो वर्ष 2013-14 में बढ़कर 29292 करोड़ रुपए तक पहुंच गया था। वर्ष 2016-17 में बासमती चावल का 21604 करोड़ रुपए का निर्यात हुआ जो मुद्रा की दृष्टि से वर्ष में सबसे अधिक था। बासमती चावल के अतिरिक्त सामान्य चावल के निर्यात से भी वर्ष 2016-17 में 17145 करोड़ रुपये की मुद्रा देश को मिली। वर्ष 2016-17 में कृषि उत्पादों के निर्यात की दृष्टि से मसाले, बासमती चावल के बाद दूसरे स्थान पर रहे, जिसका इस वर्ष 19442 करोड़ रुपए का निर्यात किया गया। मसालों के निर्यात में वर्ष प्रति वर्ष वृद्धि देखी जा रही है। वर्ष 2012-13 में मसालों का निर्यात 15177 करोड़ रुपये का ही हुआ था। पिछले कुछ वर्षों में शक्कर, कॉफी, मूंगफली व काजू के निर्यात में बहुत कम उतार-चढ़ाव देखने को मिले। वर्ष 2012-13 में इनका निर्यात क्रमश: 8576, 4711, 4065 व 4069 करोड़ रुपए का हुआ, जिसमें साधारण वृद्धि ही देखी गई। ताजी सब्जियों में भी पिछले वर्षों में वृद्धि देखी गई। वर्ष 2012-13 में जहां ताजी सब्जियों का निर्यात मात्र 3407 करोड़ रुपए का था, वह वर्ष 2016-17 में बढ़कर 5772 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। कृषि उत्पादों के निर्यात में सबसे अधिक झटका तिलहनी खली के निर्यात को लगा है। वर्ष 2012-13 में जहां तिलहनी खलियों के निर्यात से 16519 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा अर्जित की गई थी, वह वर्ष 2016-17 में घटकर 5371 करोड़ रुपये ही रह गई।

हम जितनी विदेशी मुद्रा (227559 करोड़ रुपये) कृषि उत्पादों से कमाते उसका एक तिहाई मात्र खाद्यान्न तेलों के आयात पर खर्च कर देते हैं। दालों के आयात में भी वर्ष 2016-17 में हमने 28523 करोड़ रुपये खर्च किये थे। ताजी सब्जियों के निर्यात से हम जितनी विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं, उससे अधिक (11241 करोड़ रुपये) हम उसके आयात में खर्च कर देते हैं। तिलहनी, दलहनी तथा सब्जियों का उत्पादन बढ़ाने के लिये हमें नये सिरे से सोचना होगा। देश में खाद्यान्न फसलों के स्थान पर तिलहनी, दलहनी तथा सब्जियों के उत्पादन के लिए उचित क्षेत्रों में किसानों को बढ़ावा तथा सुविधायें देनी होगी। किसानों को उनकी सुविधा के बजाय देश की आवश्यकता अनुसार फसलों के चयन के लिए प्रेरित करना होगा।

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