क्या पशु भी खर्राटे लेते हैं

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कारण - इस रोग का फैलाव विभिन्न प्रकार के कारण होता है। इनमें प्लॅनीरबीस, लिमनिया जाति की लार्वा की बढ़वार होकर यह रोग निर्माण करने वाले फरकोसर्कस सर्केरिया पानी में प्रवेश करते हैं। ऐसा दूषित पानी तंदुरूस्त पशु ने पी लिया तो उसे इस रोग की बाधा हो जाती है। यह जंतु पशु के नाक के नजदीक की चमड़ी में प्रवेश करते हैं और वहां तेजी से  पनपते हैं। इन परोपजीवियों की नाक में मौजूद धमनियों में संपूर्ण बढ़वार होती हैं। इन परोपजीवियों में कुछ नर तथा कुछ  मादा होते है। इनका मिलन होने के पश्चात मादा अंडे देती है। इन अंडों का बूमरंग नामक आदिवासी लोगों द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले हथियार की माफिक होता है। उनकी दुम पर चीन जैसे भाग होते हैं। इस भाग में बहुत ज्यादा तादाद में अंडे देने से तथा इन अंडों के विशिष्ट रचना की वजह से उस जगह इस रोग की शुरूआत होती हैं। उस जगह धमनियां फूल जाती हैं तथा नाक में बारबार चुभने से वहां पेशियों की फूलगोभी के माफिक बढ़वार होती हैं। उस जगह पीप भी तैयार होता है। इस पीप के जमाव के कारण जितनी हवा सांस लेने हेतु चाहिए उतनी हवा फेफड़ों में जाती नहीं हैं। जब पशु सांस लेता हैं तब एक अलग सा खर्राटे भरते वक्त आती है वैसे आवाज आती हैं। इसलिये इस रोग को खर्राटे रोग कहते हैं आंग्लभाषा में इस रोग को 'स्नोरिंग डिसीज' कहते हैं।

लक्षण - इस रोग का प्रमुख लक्षण खर्राटे जैसी आवाज आना हैं। पशु की नाक से चिपचिपा पदार्थ बहता है तथा नाक में फूलगोभी जैसी पेशियों की बढ़वार दिखाई देती हैं। कभी-कभी नाक से बहने वाले स्त्राव में खून भी आता हैं। पशु बारबार छींकता रहता हैं।

मानव खर्राटे लेते हैं यह सर्वविदित है। लेकिन कभी-कभी पशु भी खर्राटे लेते हैं यह जानकर आश्चर्य होगा। जी हां कभी-कभी किसी पशु को विशिष्ट बीमारी होने से वह भी खर्राटे लेते हैं। यह बीमारी सभी प्रकार के पशुओं में हो सकती है। इस रोग को ग्रामीण इलाकों में 'नाकाडी' .या 'घुरघुरी' या स्थानिक भाषा में अन्य नाम से भी जाना जाता है।

उपचार - अनुभवी पशुओं के डाक्टर द्वारा पशु की तुरन्त जांच करवायें। नाक से बहते स्त्राव की पशुरोगविकृती शास्त्र प्रयोगशाला से जांच करवायें। रोग की तसल्ली होने पर अॅन्यीमलीन, सोडियम अन्टीमोनी टार्टारेट, ट्रायकोरोकोन, टार्टर इमेटीक इन दवाओं को डाक्टर की सलाह अनुसार दें।

बचाव -  बाड़़े में साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें। पशुओं को ताजा, साफ पानी पिलावें। पानी के टंकी की हर हफ्ते कम से कम एक या दो बार सफाई करें। उसमें काई (शैवाल) न बढऩे दें।  

टंकी के अंदरूनी भाग को ईट से घिसकर सफाई करें तथा चूने से लिपाई करें। चूना पाउडर डालकर थोड़ा पानी डालें। इससे होने वाली रसायनिक प्रक्रिया तथा गर्मी से काई, जंतु, कीड़े काफी हद तक मर जाते हैं। औटर टंकी साफ हो जाती हैं। चूना लगाने के बाद कुछ देर रुके। जब वह अच्छी तरह सूख जाये तब ताजा साफ पानी भरें। पानी के नल को साफ कपड़ा तथा जाली लगायें ताकि पानी में अगर कचरा है तो टंकी में ना गिरे।

  • पशुओं को जंगल में तालाब या नाले का पानी न पिलावें। विशेषकर अगर वहां की मौजूदगी है तो वहां कतई पानी न पिलावें। मोरचूद (नीला थोथा) या नमक डालने से काई (अल्गी) का नाश हो जाता हैं।
  • कीचड़ बीमार पशुओं को अलग जगह दूर बांधे तथा उनके चारा पानी का अलग प्रबंध करें। जब तक वे स्वस्थ नहीं होते तब तक उन्हें स्वस्थ पशुओं के साथ न रखें।
  • फेसकॉन या ब्लुसाईड जैसी कुछ दवायें बाजार में उपलब्ध होती हैं जिनके छिड़काव का नाश हो जाता है।

 इस प्रकार सावधानी बरतें तो अपने बहुमूल्य पशुधन को इस बीमारी से बचा सकते हैं तथा समय पैसे की बरबादी टाल सकते हैं।

 

  • डॉ. सुनील नीलकंठ रोकड़े
  • मो. : 9850347022 
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