पक्षियों का गांव है राजस्थान का मेनार

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राजस्थान के उदयपुर से 40 किलोमीटर दूर चित्तौडग़ढ़ मार्ग पर एक गांव है- मेनार। वैसे तो यह आम गांवों की तरह है पर पक्षियों से विशेष लगाव के कारण खास बन गया है। देश-दुनिया में पक्षियों के गांव (बर्ड विलेज) के नाम से इसकी पहचान बन गई है। यहां साल भर सैलानियों, पक्षी प्रेमियों, पक्षी निरीक्षकों, पर्यावरणविदों और प्रकृति प्रेमियों का तांता लगा रहता है। ये लोग यहां आते हैं, तालाब किनारे पक्षियों को निहारते हैं, उनका कलरव सुनते हैं और नीले समंदर की तरह विशाल तालाब में पक्षियों की अठखेलियां और क्रीड़ाओं का आनंद लेते हैं। यहां के दो तालाब पक्षियों के लिए ही हैं। तालाबों का नाम भरमेला और ढंड है। यहां न कोई नाव चलती है, न मछलियों का शिकार। न कोई ध्वनि प्रदूषण है और न ही कोई मानवीय गतिविधि। एकाध साल पहले तक तालाब की जलभूमि में खेती होती थी, तरबूज-खरबूज लगाए जाते थे। गांव के लोगों ने सामूहिक रूप से निर्णय लेकर उसे भी बंद करवा दिया जिससे पक्षियों की गतिविधियों में कोई खलल न पड़े।

पक्षियों की सुरक्षा के लिए गांववाले और पक्षीप्रेमी सचेत हैं। उन्होंने तालाब के किनारे लगे पेड़ों को काटने पर पाबंदी लगाई है। तालाब के ऊपर से बिजली की हाईटेंशन लाइन गई थी, जिससे टकराकर पक्षी मर जाते थे। ग्रामीणों ने उसे हटवाया। इस साल जब अधिक तापमान से तालाब का पानी गरम हो गया और मछलियां मरने लगीं, तब ग्रामीणों को चिंता हुई। उन्होंने मछलियों को उथले तालाब से गहरे तालाब में स्थानांतरित किया और तालाब का पानी भी बदला। जिससे मछलियों को बचाया जा सके। इससे ग्रामीणों की जीवों के प्रति गहरी चिंता व संवेदनशीलता का पता चलता है। यहां पक्षियों को परेशान करने वाली हर तरह की गतिविधियों पर गांववालों की नजर रहती है। जैसे कोई फोटोग्राफर पक्षियों को उड़ाकर तस्वीरें लेता है तो उसे ऐसा करने से रोका जाता है। स्वाभाविक तरीके से तस्वीरें लेने पर कोई मनाही नहीं है।

जलसंकट और रेगिस्तान के लिए प्रसिद्ध हमारे राजस्थान में एक गांव ऐसा भी है जहां सिर्फ पक्षियों की पूछ-परख होती है। उदयपुर के पास मेनार गांव में विकास की हर योजना पक्षियों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई और अमल में लाई जाती हैं। इस कमाल के गांव के बारे में बता रहे हैं, बाबा मायाराम। 

पक्षियों के प्राकृतिक रूप से अनुकूल वातावरण बना रहे, इसकी कोशिश की जाती है। गांव के पक्षी मित्र धर्मेंद्र मेनारिया बताते हैं कि कई बार यह बात सामने आती है कि तालाब को पर्यटन की दृष्टि से कृत्रिम रूप से कांक्रीट-सीमेंट से बनाया जाए। लेकिन इससे पक्षियों को नुकसान होगा। धर्मेंद्र का मानना है कि न तो सड़क बनाने की जरूरत है और न ही तालाब को पक्का करने की, न बीच में टापू बनाने की और न ही पेड़ों को काटने की। प्राकृतिक रूप से जैसा है, वैसा ही रहने दें, तभी पक्षी आएंगे और रहेंगे। अन्यथा वे यहां से चले जाएंगे।

पक्षी कृत्रिम वातावरण में रहना पसंद नहीं करते। पक्षियों के लिए प्राकृतिक माहौल जरूरी है। तालाब के आसपास झाडिय़ों की सफाई की जरूरत भी नहीं है। पेड़ों पर और आसपास की झाडिय़ों में पक्षी आश्रय पाते हैं। इन सब कारणों से मेनार पक्षियों की पसंदीदा जगह है। यहां 170 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियां हैं। जिसमें स्थानीय व प्रवासी पक्षी दोनों शामिल हैं। यहां जलीय व स्थलीय दोनों तरह के पक्षियों की प्रजातियां हैं। प्रवासी पक्षी ज्यादातर शीत ऋतु में आते हैं और यहां रहते हैं। वे ज्यादा ठंडे इलाकों से अपेक्षाकृत कम ठंडे इलाकों में रहना पसंद करते हैं। यहां शीतकाल के आरंभ से ही, अक्टूबर-नवंबर माह से देश-विदेश से पक्षियों का आना शुरू हो जाता है और वे यहां फरवरी-मार्च तक रहते हैं। इनमें से कुछ को तो मेनार ऐसा भा जाता है कि वे यहीं के होकर रह जाते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण शिवा डुबडुबी है, जो करीब दो दशक पहले हिमालय की तराईयों से यहां आई और यहीं रह गई। उसे यहां की आबोहवा और वातावरण ऐसा भाया कि फिर वह वापस नहीं गई। अब यही शिवा डुबडुबी यहां की शान है। तालाब किनारे उसे बहुत देर तक देखा जा सकता है। सिर पर कलगी, लम्बी चोंच है, पानी में खेलते इसे देखना आनंददायक था। वह जरा सी आहट होने पर पानी में डूब जाती है। तैराक जैसी चपलता और फुर्तीली है। पानी में रहती है और पानी में ही तैरता हुआ घोंसला बनाती है, उसी में प्रजनन करती है। यहां मोर, कोयल, कौवा, तोता, नीलकंठ, बगुला, बतख, जलमुर्गी, कबूतर, गौरेया, सुर्खा, नकटा आदि कई प्रजाति के पक्षी देखे जाते हैं। कई बार मेनार गांव आ चुके आयरलैंड के पक्षी विशेषज्ञ पाल पैट्रिक कुलेन का कहना है कि उन्होंने ऐसी जगह कहीं और नहीं देखी, जहां पक्षी मनुष्य से नहीं डरते। 

पक्षियों की दुनिया अलग है। मोटे तौर कह सकते हैं कि जो उड़ते हैं वे पक्षी कहलाते हैं, उनके पंख होते हैं। ऐसा भी दिखाई देता है कि सभी पक्षी एक जैसे होते हैं- वे उड़ते हैं, घोंसला बनाते हैं, अंडे देते हैं, लेकिन बारीकी से देखने पर इनमें काफी भिन्नता है। छोटी चिडिय़ा से लेकर पक्षी बहुत बड़े भी होते हैं। कुछ चिडिय़ाएं ऐसी हैं जो हजारों मील सफर करती हैं। एक देश से उड़कर बहुत दूर, दूसरे देश पहुंच जाती हैं। अलबत्ता, प्रकृति के साथ मानवीय छेड़छाड़ के कारण पक्षियों को नुकसान पहुंचता है। अव्वल तो पेड़ पर ही पक्षी रहते हैं, अगर पेड़ नहीं रहेंगे तो वे कहां रहेंगे। इसी प्रकार, रासायनिक खेती के कारण कई बार पक्षियों के मरने की खबरें आती रहती हैं। जहरीले कीटनाशकों से उनकी मौत हो जाती है। खेती के लिए पक्षी बहुत उपयोगी हैं। एक तो वे कीट नियंत्रण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और दूसरे, उनकी बीट से भूमि उर्वर होती है। हाल के कुछ दशकों से तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। ज्यादा गरमी सहन न करने के कारण भी पक्षी मर जाते हैं। कुछ सालों से बड़े जीवों को बचाने की मुहिम तो चली है, पर पक्षियों पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। हालांकि पक्षियों पर लोक गीत, कहानियां व लोक कथाएं बहुत सी हैं। सतपुड़ा अंचल में फड़की नृत्य भी होता है, जो एक चिडिय़ा होती है। छत्तीसगढ़ में सुआ ( तोता) नृत्य प्रचलित है। इससे पक्षियों और मनुष्य के बीच रिश्ते का पता चलता है। बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को पक्षी बहुत अच्छे लगते हैं।  लेकिन अब तक पक्षियों के संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। अगर मनुष्य सभी प्राणियों में अपने आप को श्रेष्ठ होने का दावा करता है तो उसे सभी पक्षियों समेत सभी प्राणियों के संरक्षण व संवर्धन का दायित्व लेना चाहिए। इससे पर्यावरण व जैव-विविधता का भी संरक्षण होगा और इससे बेहतर और सुंदर दुनिया बनेगी। इस दृष्टि से मेनार गांव के लोगों का पक्षियों के प्रति विशेष लगाव, उनके प्रति गहरी संवेदनशीलता और उनका संरक्षण अनुकरणीय और सराहनीय है।

  • बाबा मायाराम
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