अधिक लाभ के लिए मिश्रित खेती

Share On :

mixed-farming-for-more-profit

मिश्रित शस्यन के सिद्धान्त:  मिश्रित खेती से और अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ मौलिक सिद्धान्तों का पालन करना अनिवार्य है, जो निम्नलिखित हैं- 

  • विभिन्न फसलों की वृद्धि का क्रम, उनकी जड़ों की गहराई एवं उनके पोषक तत्वों की आवश्यकता अलग-अलग होती है। यदि दो ऐसी फसलें जैसे- आलू, मक्का, हल्दी, अरहर, मूंगफली, जिनमें एक उथली जड़ वाली तथा दूसरी गहरी जड़ वाली हो तो दोनों भूमि की अलग-अलग सतहों से नमी एवं पोषक तत्वों का भरपूर अवशोषण तथा उपयोग करती हैं। इस प्रकार जल एवं पोषक तत्वों के उपयोग की क्षमता बढऩे से उनकी उपज बढ़ जाती है। 
  • वैज्ञानिकों के विभिन्न शोधों में यह भी पाया गया है कि कुछ फसलों का मिश्रण अधिक सफल होता है जबकि कुछ अन्य फसलों का मिश्रण उतना  लाभ नहीं दे पाते हैं। जैसे- नारियल, केला, $ अदरक फसल प्रणाली में सूर्य के प्रकाश का अधिकतम उपयोग होता है, जिससे तीनों फसलों की अधिक उपज प्राप्त होती है। हल्दी, मक्का, अरहर भी उत्तम मिश्रण है। 
  • सघन अनुसंधान से यह पता चला है कि कुछ फसलें ऐसा प्रभाव उत्पन्न करती हैं जो दूसरी फसलों के लिए अधिक लाभप्रद होती है। उदाहरणार्थ यदि दलहनी फसल मूंग को धान्य फसल ज्वार के साथ उगाया जाता है, तो मूंग की जड़ों में उपस्थित गांठों में एकत्रित हो रहे नत्रजन के कुछ भाग का उपयोग ज्वार द्वारा हो जाने से ज्वार की उपज बढ़ जाती है। 
  • ऊंचे कद वाली फसलों की छाया ऐसी फसलों के लिए लाभप्रद हो जाती है जिन्हें कड़ी धूप की आवश्यकता नहीं होती है। जैसे- अरहर, अनानास, अरहर, हल्दी, अरहर $ अदरक आदि। 
  • कुछ फसलों की उपस्थिति उसकी सहयोगी फसल को कीड़ों के आक्रमण से बचाती है। जैसे- मक्का की फसल में ज्वार, लाल मिर्च में सौंफ तथा चना की फसल में धनियां की मिश्रित खेती कुछ ऐसे ही उपयोगी उदाहरण है।

मिश्रित खेती और अन्तरवर्तीय खेती:  मिश्रित खेती से प्राप्त इन जानकारियों से नई सम्भावनाओं का उदय हुआ है। मिश्रित खेती केवल असिंचित क्षेत्रों की कृषि पद्धति है जहॉ उसका एकमात्र उद्देश्य फसल को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा प्रदान करना है। वैज्ञानिकों ने मिश्रित खेती को सिंचित क्षेत्रों में भी निरूपित किया है। 

हमारे देश में प्राचीनकाल से ही मिश्रित खेती हमारी कृषि प्रणाली का एक अभिन्न अंग रहा है। मिश्रित खेती की संकल्पना मौसम की विपरीत परिस्थितियों में खेती में अनिश्चितता को कम करने की दृष्टिकोण से की जाती है।  जब एक खेत में एक ही साथ दो या दो से अधिक फसलें उगाई जाती हैं, तो यह सम्भावना होती है कि यदि कोई फसल मौसम की असामान्यता के कारण नष्ट हो जाये तो दूसरी या तीसरी फसल से उसकी भरपाई हो जाये और इस प्रकार उस खेत से लाभ प्राप्त किया जा सके। यह सुरक्षा केवल मिट्टी की नमी के दृष्टिकोण से ही नहीं वरन् कीट व रोगों के प्रकोप की स्थिति में भी मिश्रित शस्यन के द्वारा लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

दूर-दूर की कतारों में लगायी जाने वाली फसलें जैसे अरहर, गन्ना, कपास आदि की बुआई के बाद लम्बे समय तक कतारों के बीच के स्थान का कोई उपयोग नहीं हो पाता है। गन्ना और अरहर की फसलों की प्रारंभिक वृद्धि दर बहुत ही कम होती है, जिसके कारण कतारों के बीच खाली स्थान में खरपतवार की समस्या उत्पन्न हो जाती है, जो मिट्टी से नमी एवं पोषक तत्व ग्रहण करने के साथ-साथ मुख्य फसल के पौधों को भारी प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए विवश कर देते हैं। जिसके परिणामस्वरूप फसल की उत्पादकता पर बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यदि दो कतारों के बीच इस खाली स्थान का उपयोग ऐसी फसल को लगाकर किया जाये, जो कम दिनों में तैयार हो और उसकी प्रारम्भिक वृद्धि दर तेज हो, तो यह फसल, मुख्य फसल से किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा किए बिना अपना जीवन चक्र पूरा कर लेगी। मुख्य फसल जब तक अपनी तीव्र विकास अवस्था में पहुंचेगी तब तक दूसरी फसल कट जायेगी। इस प्रकार मुख्य फसल के पौधों को बिना हानि पहुंचाए हुए एक नई अतिरिक्त फसल इसी खेत से एक ही समय में ली जा सकती है। इस पद्धति को समानान्तर खेती की संज्ञा दी जाती है। जैसे- गन्ने की फसल में आलू, गन्ने में प्याज, गन्ने में धनियां, गन्ने में लहसुन इत्यादि समानान्तर फसल के उदाहरण हैं। घटती हुई कृषि योग्य भूमि और बढ़ती हुई आबादी को भोजन प्रदान करने के लिए यह अत्यावश्यक है कि प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ाई जाए। मिश्रित खेती उपज बढ़ाने का एक प्रमुख माध्यम है। उन क्षेत्रों में जहां रोजगार के साधन कम हैं, उन स्थानों पर इसको अपनाने से लोगों को रोजगार के अतिरिक्त अवसर उपलब्ध होते हैं और प्रति व्यक्ति आय में भी वृद्धि होती है। मिश्रित, अन्तरवर्तीय एवं समानान्तर खेती में सिंचित एवं असिंचित अवस्था में लगायी जाने वाली फसलों की एक सूची नीचे दी जा रही है, जो किसानों के लिए उपयोगी एवं लाभप्रद सिद्ध होगी। 

सिंचित क्षेत्र के लिए मिश्रित फसल प्रणाली: रबी मक्का $ आलू, आलू+बाकला, रबी मक्का+राजमा, (मैदानी क्षेत्रों के लिए), रबी मक्का+धनियां, (हरी पत्तियों के लिए), शरदकालीन गन्ना+मिर्च, गन्ना+धनियां, गन्ना+ मगरैला, गन्ना+लहसुन, गन्ना+आलू, गन्ना+ गेहूं, गन्ना+अजवाइन, गन्ना + मसूर, बसन्त कालीन गन्ना+भिण्डी, गन्ना+मूंग, गन्ना+उड़द, प्याज+अजवाइन, प्याज+भिण्डी, प्याज + मिर्च। 

असिंचित क्षेत्र के लिए मिश्रित फसल प्रणाली:  असिंचित क्षेत्रों के लिए अनाज तथा दलहनी फसलों का मिश्रण अधिक उपयोगी होता है साथ ही मिट्टी की उर्वराशक्ति भी बनी रहती है:- 
बाजरा+मूंग, बाजरा+अरहर, मक्का+उड़द, गेहूं+चना, जौ+चना, जौ+मटर, ज्वार+अरहर व गेहूं+मटर। 

अनाज की फसलों का तिलहन के साथ मिश्रण:  गेहूं + सरसों, जौ+ सरसों, गेहूं+ अलसी, जौ+ अलसी।

दलहनी फसलों का तिलहनी फसलों के साथ मिश्रण: अरहर+मूंग, अरहर + उड़द, अरहर+ मूंगफली, चना $ अलसी, चना+सरसों, चना+ धनियां, मटर+ सरसों, मटर $ कुसुम।

दो से अधिक फसलों का मिश्रण: ज्वार+ अरहर + मूंग, बाजरा + अरहर + मूंग, ज्वार + अरहर + $ उड़द, जौ + मटर + सरसों, चना + सरसों+अलसी, गेहूं+चना+सरसों। 

मावठे का लाभ उठायें

मावठा व्यापक क्षेत्रों में गिरा है। प्रकृति की इस अनमोल देना का लाभ सभी रबी फसलों में मिलेगा। भूमिगत नमी से यह नमी मिलकर पौधों को बढ़ायेगी जिससे फसल की दशा पर सकारात्मक बदलाव आयेगा। जिन कृषकों ने असिंचित गेहूं में उर्वरक नहीं डाला है अथवा सिफारिश से कम डाला है उन्हें सलाह दी जाती है कि 50-60 किलो यूरिया प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेतों में बिखर दें। नमी में उपलब्ध होकर पौधों की दशा बदलेगा। इसी तरह सरसों की फसल में भी 50 किलो यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से डाला जा सकता है। सरसों की फसल में माहो का आक्रमण बढ़ सकता है। स्थितियां भांपकर रोगर या मेटासिस्टॉक्स 1 मिली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर एक छिड़काव करना हितकर होगा।

वर्तमान में दिनोंदिन बढ़ती हुई जनसंख्या के बोझ के कारण दिन प्रति दिन कृषि योग्य भूमि पर दबाव बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थिति में मिश्रित शस्यन को अपनाकर किसान बन्धु प्रति इकाई भूमि से अधिक उत्पादन प्राप्त कर अपनी आय को बढ़ा सकते हैं। साथ ही इससे रोजगार के अतिरिक्त अवसर भी प्राप्त होंगे। आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें अपनी मानसिकता बदलना होगा। आज के सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में मिश्रित खेती किसान बन्धुओं के लिए वरदान साबित होगी। खेती की इस प्रणाली को अपनाने से अधिक आमदनी तो प्राप्त होती ही है, साथ में भूमि की उर्वराशक्ति में भी वृद्धि होती है। इसके अलावा फसल में रोग व्याधियों का प्रकोप भी कम हो जाता है।      

  • डॉ. अजय कुमार सिंह     
Share On :

Follow us on

Subscribe Here

For More Articles

Releated Articles