कैसे मिटाएं बैलों की थकान - खेती में बैलों का महत्व

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भारत कृषि प्रधान देश है। यहां 70 प्रतिशत से ज्यादा जनता कृषि व्यवसाय से जुड़ी है। यहां पीढ़ी दर पीढ़ी जमीन का वर्षों से बंटवारा होने से औसतन भूधारण सिर्फ 1.56 हेक्टेयर तक आ चुकी है। इतनी छोटी जमीन हेतु ट्रैक्टर रखना किसान के लिए किफायती नहीं हैं। अत: ऐसी कम जमीन पर कृषि कार्य हेतु बैलजोड़ी रखना तथा बैलों द्वारा सारे कृषि कार्य संपन्न करवाना उचित है। खेती में बुवाई्र से पहले जुताई से लेकर निराई, गुड़ाई बीज की बोनी, अंतर, सस्य क्रियाएं, अनाज के बालियों की खलिहान में, अनाज तथा अन्य कृषि उत्पादन की ढ़ुलाई यहां तक की किसान तथा परिवार के परिवहन ऐसे सारे कार्यों में बैलों की जरुरत होती हैं। अब गाय दूध उत्पादन देती हैं, मुर्गी अंडा देती हैं तथा भेड़ ऊन देती हैं यह सब उत्पादन एक तरह का कार्य हैं जो आंखों से दिखाई देता है। लेकिन जो बैल सबेरे से शाम तक खेत में मेहनत का कार्य करता है वह सबको दिखाई नहीं देता है या बहुत महत्वपूर्ण नहीं लगता। लेकिन कार्य तो कार्य है बैल जो भी कार्य करता हैं उसमें उसकी ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा खर्च होता है और ऊर्जा के हृास के कारण वह शाम तक थककर चूर हो जाता है। उसके शरीर से पसीने के जरिये नमक तथा लवण काफी हद तक बह जाने से उसे थकान आती है। दिनभर चलकर उसकी टांगों में दर्द होता है।

सबेरे से शाम तक कृषि कार्य में इस्तेमाल किए गये औजार जू कंधों पर ढ़ोने से उसके कंधों में भी दर्द उत्पन्न होता हैं। अगर हम बैल की ओर यह सब सोचकर नये दृष्टिकोण से देखें तो हमें यह महसूस होगा। अत: उसकी उचित देखभाल तथा प्रबंधन करने से बैलों की थकान मिटाई जा सकती हैं तथा समुचित पोषण प्रबंधन द्वारा उसकी जो ऊर्जा खर्च होती हैं उसकी भरपाई की जा सकती है। ऐसा न करने पर कुपोषण, गलन प्रबंधन अधूरी देखभाल से बैलों की कार्यक्षमता कार्य उत्पादन स्वास्थ्य पर विपत्ति असर पड़ता हैं। अत: यह सब टालने हेतु उनका निम्रलिखित अनुसार प्रबंधन करें-

आवास प्रबंधन- बैलों को अत्यधिक शारीरिक परिश्रम करना पड़ता है और इससे वे थककर चूर हो जाते हैं। अत: शाम को घर लौटने के बाद उन्हें आराम प्रदान करने हेतु आरामदायक आवास निहायत जरुरी हैं। आवास ऊंचाई पर, साफ-सुथरी जगह, सुखे स्थान पर, प्रकाशमान हवादार होना चाहिए। आवास में बैल सबसे ज्यादा समय  जमीन के संपर्क में रहते हैं अत: जमीन कठोर उबड़-खाबड़ पत्थर कंकड़ों से भरी कीचड़ भरी नहीं होनी चाहिए। फर्श नर्म मुलायम सूखा, साफ समतल आरामदेह होना चाहिए। फर्श पर पत्थर या पत्थर की गोटियां जो बहुत गर्म होती हैं या सर्दियों में बर्फ के समान ठंडी होती हैं बैलों के स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं होती। उन पर लगातार बैठने से उनके बदन में बादी पैदा होती है। यहां तक की लगातार कई दिनों तक ठंडे फर्श पर बैठने से उन्हे लकवे की शिकायत भी हो सकती है। ऐसा होने पर कीमती बैल बेकाम हो जाते हैें। अत: जमीन घुम्मस कर समतल बना लें। वह न तो कठोर होना चाहिए और न ही कीचड़ भरी हो। बाड़े की दीवार बाड़े के मध्य में 15 फीट ऊंची तथा बगलों में 10 फीट ऊंची होनी चाहिए। बाड़े के इर्द-गिर्द छायादार वृक्ष लगायें ताकि बैल उनकी ठंडी छाया में बैठकर विश्राम कर सकें बाड़े में पीने के लिए साफ, ठंडा ताजा जल उपलब्ध करवायें।

पोषण प्रबंधन

बैल मेहनती कार्य करते हैं अत: उनकी ऊर्जा, प्रोटीन तथा खनिज लवणों की आवश्यकताएं पूर्ण होना जरुरी हैं। इसके लिए उन्हें पौष्टिक तथा आहार उनके कार्य अनुसार खिलाना चाहिए। अगर बैल साधारण कम मेहनती कार्य कर रहा है तो उसे 5 किलोग्राम चारे की कुट्टी, 20 किलो हरा चारा तथा 2 से 3 किलोग्राम खुराक प्रतिदिन खिलायें। अगर वह ज्यादा कठोर परिश्रम कर रहा है तो उसे 10 किलो चारे की कुट्टी, 25 किलो हरा चारा जिसमें बरसीम या ल्यूसर्न या अन्य कोई फलीहारी वनस्पति का चारा जो प्रोटीनयुक्त, पौष्टिक होता हैं खिलाना चाहिए। इसके अलावा उनके आहार में प्रतिदिन 50 से 60 ग्राम सादा नमक तथा 50 से 60 ग्राम खनिज मिश्रण होना चाहिए। उन्हें भरपेट वांछित मात्रा में पानी पिलावें। गर्मियों में पानी पिलाने से पहले थोड़ा गुड़ खिलावें।

प्रबंधन

बैलों के प्रबंधन में कई बातें होती हैं। उन्हें तेज धूप होने पर खेत में कार्य हेतु न भेजें। सबेरे पांच बजे से सबेरे नौ या कम धूप होने पर 10 बजे तक तथा शाम को सूरज की रोशनी कम होने पर 2 से 3 घंटे कृषि कार्य हेतु इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे उन्हें थकान कम होगी, कम कष्ट होगा तथा कार्य उत्पादन ज्यादा होगा। बैल जब काम करने के बाद थक जाते हैं तब वे हॉफने लगते हैं और उनके मुंह से झाग निकलने लगता हैं। उनके कार्य की गति कम हो जाती हैं यह सब अनुभव से जाना जा सकता हैं। ऐसी स्थिति आने पर उन पर रहम करें और थोड़ी देर के लिए काम रोक दें। उनकी गर्दन से जू हटाकर उन्हें किसी छायादार वृक्ष के नीचे आराम करने दें। थोड़ी देर बाद पानी पिलायें। कुछ हरा चारा तथा कुछ सूखा चारा खिलायें। अगर उन्हें मुठ्ठीभर नमक तथा कुछ गुड़ खिलाकर पानी पिलायें तो बहुत बेहतर होगा और ऊर्जा प्राप्त होगी। इससे वे तरोताजा हो जायेंंगे और विश्राम के बाद नये उत्साह तथा उमंग से फिर कार्य कर पायेंगे। इससे उनसे थोड़ा ज्यादा कार्य करवा सकेंगे।

शाम को घर लौटने के बाद उनकी पीठ तथा विशेषकर कूबड़ को गर्म पानी से धीरे-धीरे मलकर धोयें। इसके अलावा पीठ तथा कुण्ड को गुनगुने तेल में कपूर मिलाकर उससे धीरे-धीरे रगड़कर मालिश करें। इससे बैलों को काफी आराम महसूस होगा तथा उनकी थकान दूर हो जायेगी। वे तरोताजा होकर नये उत्साह तथा उमंग से कार्य करेंगे। गर्मियों में कृषि कार्य से निवृत होने के बाद बाड़े में लौटने के कुछ देर बाद उन्हें ठंडे पानी से नहलाएं तथा उनका बदन पीठ तथा कूबड़ धीरे-धीरे रगड़कर मालिश करें।

बैलों के शरीर पर हर हफ्ते खरहरा करें। इससे उनके शरीर की मालिश हो जायेगी जिससे उनके शरीर में खून का संचार अच्छी तरह होगा। खरहरा करने से उनकी त्वचा में लसिका ग्रथियों का स्त्रवण भी सुचारु रुप से होगा जिससे उनकी त्वचा चमकदार और मुलायम तथा निरोगी रहेगी। खरहरा करने से उनके बदन पर अगर जूॅ. किलनी, लीचड़, पिस्सू आदि बाह्य परजीवी मौजूद हों तो वह भरी निकल जायेंगे। खरहरा करने के कई लाभ हैं ओर खर्च कुछ भी नहीं। अत: इस बिना खर्च की तकनीक का अवश्य इस्तेमाल करें।

बैलों को पेट के कृमियों को मारने वाली दवा जैसे अल्बेडझाल या थाईबेडझाल 3 महीने में एक बार पिलावें। इससे पेट के कृमियों का नाश होगा। इसके अलावा बैलों को बरसात शुरू होने से पहले हर वर्ष खुरपका-मुंहपका रोग, गलाघोंटू रोग, जहरी बुखार तथा लंगडा रोड इन रोगविरोधी टीके अनुभवी पशुचिकित्सक द्वारा लगवायें।

उनके खुरों की रोजाना जांच करें। अगर उनमें कांटे लगे हैं तो चिमटे से निकालकर वहां जंतुनाशक मरहम लगायें। अगर बैल सुस्त दिखाई दें तो अनुभवी पशुचिकित्सक द्वारा जांच करवाकर दवा का बंदोबस्त करें। उनके बाड़े में कीचड़ कतई न होने दे अन्यथा वे ठीक से आराम नहीं कर पायेंगे और आराम ना होने पर तरोताजा नहीं हो पायेंगे और दूसरे दिन सुस्त महसूस करेंगे तथा खेत में ठीक से कार्य नहीं कर पायेंगे। 

कीचड़ में कई तरह के कीड़े भी पैदा होते हैं तो बैलों को परेशान करते हैं काटते हैं जिससे उनमें थाइलेरिवासिस जैसी बीमारियां भी हो सकती हैं। अत: जब बैल खेत में निकल जाते हैं तब सूखा मुरम डालकर कीचड़ पर परत लगवायें। बाड़े से पानी की निकासी की व्यवस्था करें। बाड़ें से पानी की निकासी की व्यवस्था करें। बाड़े में कड़वे नीम, तुलसी की पत्तियां निलगिरी की पत्तियां जलाकर धुआ करें जिससे कीड़ों का प्रकोप कम होगा। बाड़े में कीटनाशी दवा का छिड़काव भी कर सकते हैं।

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