कृषि को उद्योग का दर्जा देने से सुधरेंगे किसानों के हालात

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इंदौर। इन दिनों कर्ज माफी का मुद्दा छाया हुआ है। कर्ज माफी को लगभग सभी राज्यों ने अपनाते हुए इसे सत्ता प्राप्ति का हथियार बना लिया है, जबकि यह कटु सत्य है कि कर्ज माफी से किसान का कभी भला होने वाला नहीं है। यह आत्मघाती प्रवृत्ति है। किसानों की खेती की लागत कम कर इसे मुनाफे का धंधा बनाने के लिए उन्हें खेती से जुड़ी हर चीज समय पर मुहैया करानी होगी। यदि कृषि को उद्योग का दर्जा दे दिया जाए तो निवेशक खेती में निवेश करेंगे। इससे किसानों के हालात सुधरेंगे और कर्ज से मुक्त होंगे, अन्यथा बैंकों का एनपीए बढ़ता जाएगा जिसका देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।

उल्लेखनीय है कि राजनीतिक दलों ने कर्ज माफी को सत्ता प्राप्ति का हथियार बना रखा है। हाल ही में मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में किसानों की कर्ज माफी के मुद्दे पर कांग्रेस ने सत्ता हासिल कर ली। अब इसी मुद्दे पर लोकसभा चुनाव लडऩे की भी तैयारी है, क्योंकि एक दशक पहले 2008 -09 में तत्कालीन संप्रग सरकार द्वारा 70 हजार करोड़ रुपए की कर्ज माफी कर दुबारा सत्ता हासिल कर ली थी। जबकि आर्थिक क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है, कि कर्ज माफी से बैंकों का एनपीए बढ़ेगा और उनकी आर्थिक सेहत बहुत खराब हो जाएगी। कर्ज माफी की आस में किसानों में कर्ज नहीं चुकाने की अनुचित प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है,  इससे बैंकों की वसूली तो प्रभावित हुई ही है, एनपीए भी बढ़ता जा रहा है।

बता दें कि इसके पहले भी देश के कई राज्यों ने किसानों का ऋण माफ किया था, लेकिन इसके बाद भी किसानों के हालात ज्यों के त्यों रहे, क्योंकि ऋण माफी से सिर्फ तात्कालिक राहत मिलती है, दीर्घकालीन लाभ नहीं होता है। बैंकों से कर्ज लेने वाले सभी किसानों का पूरा कर्ज माफ नहीं होता, क्योंकि वह अन्य निजी स्रोतों से भी कर्ज लेते हैं। जो बैंकों के दायरे में नहीं आते। नियमों और शर्तों में उलझने से सभी किसानों के कर्ज माफ नहीं होते हैं। यह भी कड़वा सच है कि किसानों की पूरी फसल कभी भी समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदी जाती। रुपयों की जरूरत होने से कई किसान जल्दी में अपनी उपज मंडी से बाहर स्थानीय व्यापारियों को समर्थन मूल्य से भी कम कीमत पर बेच देते हैं।

यह बात ध्यान देने योग्य है, कि अनाज उत्पादन में सक्षम होने से देश में अनाज भंडारण की व्यवस्था तो कर ली गई है, लेकिन इन दिनों किसानों का रुझान उद्यानिकी फसलों की ओर बढ़ा है। वे आलू , प्याज, लहसुन, फल और सब्जियों का भरपूर उत्पादन करने लगे हैं, क्योंकि यह नकद फसलें हैं, लेकिन इन फसलों के भंडारण के लिए कोई इंतजाम नहीं होने से किसानों को मजबूरन अपनी फसल जल्द बेचना पड़ती है। इससे उन्हें बहुत नुकसान होता है। इसका स्थायी समाधान यही है कि खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिए किसानों को जरूरत पडऩे पर उत्तम बीज, मानक खाद, गुणवत्तापूर्ण दवाइयां, बिजली, सिंचाई, विपणन की सुविधा और समय पर फसल की नुकसानी पर वास्तविक बीमा भुगतान किया जाए। यदि खेती को उद्योग का दर्जा दे दिया जाए तो निवेशकों के आने से न केवल आर्थिक हालात सुधरेंगे, बल्कि किसानों की सहभागिता से उन्हें कर्ज से स्थायी मुक्ति मिलेगी और देश की अर्थव्यवस्था भी अच्छी हो जाएगी।
 

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