यूरिया की त्रासदी

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मध्य प्रदेश में शीत लहर अधिकतर क्षेत्र में चल रही है। उसी के साथ लगता है यूरिया के संकट की लहर भी तेज हो रही है, परन्तु लगता है कि विधानसभा चुनाव की गर्मी मंत्रिमंडल के गठन और विभागों के बटवारे को देखने में प्रदेश के विश्व विद्यालय के वैज्ञानिक, कृषि संचालनालय एवं शासन का प्रशासनिक अमला मूकदर्शक बना हुआ है। वास्तव में देखा जाये तो रबी की मुख्य फसलें गेहूं, चना, मसूर, सरसों एवं सब्जियों में आलू, प्याज, लहसुन है। इनमें से विशेष रूप से नत्रजनीय उर्वरक की जरूरत बोनी के पूर्व होती है, यह तो अक्टूबर, नवम्बर में खत्म हो चुका। बोनी के बाद जो गेहूं को ही नत्रजन के रूप में यूरिया की जरूरत बोने के बाद विशेष रूप से पूर्ण सिंचित अवस्था में आवश्यक होती है। पूर्ण सिंचित गेहूं को भी 120 किलो नत्रजन की आवश्यकता होती है। इसमें से भी आधी मात्रा बोने के पूर्व तथा शेष आधी को प्रथम और द्वितीय सिंचाई के साथ देने की अनुशंसा वैज्ञानिकों के द्वारा की जाती है। स्पष्ट है कि अधिकतर यूरिया की आवश्यकता वर्तमान में गेहूं के लिए है।

उपरोक्त परिस्थिति में आखिर हमारे 2 कृषि विश्वविद्यालय, 11 कृषि महाविद्यालय, आंचलिक कृषि, क्षेत्रीय कृषि, अनुसंधान केन्द्र, 43 कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक, साथ में कृषि विभाग का तकनीकी एवं प्रशासनिक अमला संचालनालय एवं जिले से लेकर ग्रामीण स्तर तक पदस्थ है। परन्तु जैसा कि मैंने प्रारंभ में इंगित किया, सभी मूकदर्शक ही बने हुए हैं। ऐसा लगता है कि यूरिया नहीं होगी। प्रदेश में खेती नहीं होगी और उत्पादन एकदम कम हो जायेगा। मैं यहां विशेष रूप से उल्लेख करना चाहता हूं कि देश में खेती पिछले 10,000 से 12,000 वर्षों से हो रही है तथा जनसंख्या के आधार पर समुचित उत्पादन में होता था, पारम्परिक जैविक खेती। पद्धति अंतर्गत ऐसे कई तरल उत्पाद हैं जिनका उपयोग यूरिया के बदले किया जा सकता है। इनमें प्रमुख हंै गोमू्त्र, अमृत पानी, मटका खाद, जीवामृत, कण्डा पानी, मछली टानिक, पंचगव्य तरल मटका खाद रतनजोत के पत्ते के साथ, बायोगैस स्लरी, वर्मीवाश, सोयाबीन टालिका, बायोडीकम्पोजरी इन सबका उपयोग जैविक कृषि पद्धति अपनाने वाले कृषक सफलतापूर्वक कर रहे हैं। खेद है कि इन उत्पादों को कम से कम यूरिया की कमी की स्थिति किसी भी स्तर में देखने में नहीं आई, अंतत: यूरिया की कमी की इतनी हायतौबा नहीं होती और कृषक को इतनी ठंड में लाइनों में लगना, चक्काजाम या पुलिस की सख्ती का सामना नहीं करना पड़ता। अभी भी समय है कि इन उत्पादों का बड़े पैमाने पर सभी स्तर पर करके कृषकों को दुर्दशा से बचाया जा सके।

  • डॉ. जी.एस. कौशल

पूर्व संचालक कृषि (म.प्र.), मो. : 9826057424

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