रबी चारा फसलों के मुख्य रोग एवं रोकथाम

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बरसीम 

उत्तरी भारत के सिंचित क्षेत्रों में बरसीम की लोकप्रियता चारे फसलों के राजा के रूप में जानी जाती है साथ  ही साथ इसकी उपलब्धता भी कई महीनों तक होती है। हरे चारे के रूप में लगभग नवंबर से मई तक बरसीम फसल सर्दी, बसंत और गर्मियों के मौसम में 4 से 6 कटाई दे जाती हैं। इससे प्राप्त चारा  पौष्टिक, रसीला और स्वादिष्ट होता हैं जो कि पशुओं में  दूध की मात्रा को बढ़ा देता है। इसमें पर्याप्त मात्रा में  कच्चे प्रोटीन (17 - 22 प्रतिशत),  फाइबर (42-49 प्रतिशत), सेल्यूलोज (24-25 प्रतिशत) और हेमी सेल्युलोज (7-10 प्रतिशत) होते हैं। बरसीम मृदा की भौतिक, रसायनिक और जैविक स्थितियों में भी सुधार लाती है। बरसीम शांत और मध्यम ठंडी जलवायु के लिए अनुकूल है और बुवाई के समय अनुकूलित तापमान 25 डिग्री से. होना चाहिए।

जड़ गलन  रोग 

बरसीम की खेती में जड़ गलन रोग सबसे गंभीर समस्या है। यह आमतौर पर दूसरी कटाई के बाद दिखाई देता है यह रोग किसी पौधे को ग्रसित कर संक्रमण का स्थायी स्रोत का काम करता है। जड़ गलन रोग अनुकूल परिस्थितियां है जैसे कि मिट्टी में ज्यादा नमी, उच्च आद्र्रता और घनी फसल होने से यह रोग आसानी से आ जाता है और तेजी से फैलने लगता हैं। मौसम में तापमान अचानक गिरने व बढऩे कारण पैदा होता है।

ऐसी सभी फसलें जो पशुपालन में पाले जाने वाले उपयोगी जानवरों को खिलायी जाती हैं उन्हें चारा फसलें कहा जाता हैं। रबी मौसम में खेती की जाने वाली प्रमुख चारा फसलों में बरसीम, लूसर्न (रिजका) एवं जई इत्यादि आती हैं। चारा फसलों में भी अन्य फसलों की तरह विभिन्न प्रकार के रोग आते हैं जो कि भारी मात्रा में नुकसान पहुंचाते हैं। चारा फसलों में होने वाले रोगों से फसलों की उत्पादकता, गुणवत्ता एवं बीज उपज में काफी कमी आने लगती है। इस लेख में रबी चारा फसलों के प्रमुख रोगों एवं उनकी रोकथाम के प्रबंधन के बारे में जानकारी प्रदान की गयी है।
रबी चारा फसलों के प्रमुख रोग एवं रोग जनक:
चारा रोग रोग जनक
बरसीम जड़ गलन रोग राइजोक्टोनिया सोलानी ए फुजेरियम  सेमिटेक्टम  और  टीलेन्कोरिन्क्स वुल्गैरिस (मूल गांठ सूत्रकृमि) के मिश्रण से
  स्टेम रॉट स्क्लेरोसिनिया  ट्राईफोलिरम
जई जड़ गलन रोग जटिल फफूंदों के मिश्रण से
  पर्ण धब्बा रोग स्टेगोनोस्पोरा  ऐवेने
लूसर्न जड़ गलन रोग फायटोप्थेरा फफूंद
  डाउनी मिल्ड्यू पेरोनोस्पोरा ट्राईफोलिरम
  रस्ट रोग युरोमाइसेस  स्ट्रिएटस

जड़ गलन रोग लक्षण                                                                 

  • पौधे की जड़ के 5 से.मी. नीचे तक हल्के भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं बाद में वो ही गलन का रूप ले लेते हैं।
  • ग्रसित कमजोर पौधे खेत में दूर से ही दिख जातें हैं।

स्टेम रॉट रोग लक्षण                           

  • संक्रमण के दौरान पत्तियां जैतूनी भूरे रंग की हो जाती हैं।
  • तने के ऊपर सफेद रंग की फफूंद जमा हो जाती है।
  • अंत में छोट-छोटे धब्बे जैसे दिखाई देते हैं और पौधा सडऩे लगता है।

रोग नियंत्रण उपाय

  • ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें।
  • रोग विरोधी किस्म जैसे बुन्देल बरसीम-3 को उगायें।
  • बीज की फफूंदनाशक दवा जैसे कार्बेन्डाजिम (बाविस्टीन) 2 ग्राम दवा प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें।
  • खड़ी फसल में ब्लाईटॉक्स 0.3 प्रतिशत की दर अथवा कार्बेन्डाजिम या बाविस्टीन 0.1 प्रतिशत की दर से  छिड़काव करें।

जई 

जई देश के उत्तरी, मध्य और पश्चिम क्षेत्र में रबी मौसम की सबसे महत्वपूर्ण अनाज की चारा फसलों में से एक है। इसमें पर्याप्त मात्रा में  कच्चे प्रोटीन (10-12 प्रतिशत),  फाइबर (55-63 प्रतिशत), सेल्यूलोज (20-25 प्रतिशत) और हेमी सेल्युलोज (17-20 प्रतिशत) होते हैं। जई का उपयोग पुआल, घास या साइलेज के रूप में भी किया जाता है। इसका अनाज विशेष रूप से घोड़ों, भेड़ और मुर्गी के लिए एक अच्छी फीड बनाता है जई अच्छी तरह से समशीतोष्ण वातावरण के लिए अनुकूल है। यह ज्यादातर उन क्षेत्रों में  होता है जहां सर्दियों के तापमान 15 से 25 डिग्री से. के बीच होता हैं।

जड़ गलन रोग लक्षण

  • जड़ गलन रोग जटिल फफूंदों के मिश्रण से होता है। अंकुरित पौधे की अचानक मृत्यु, रुकी हुई वृद्धि, कमजोर विकास और क्राउन क्षेत्र के क्षय से होती है। 
  • गंभीर संक्रमित टिलर रोक सकते हैं। क्राउन और दूसरे या तीसरे नोड के बीच अक्सर गहरा या लाल-भूरा क्षय होता है।

पर्ण धब्बा रोग लक्षण    

  • हल्के और गहरे भूरे रंग के धब्बे गहरे भूरे रंग के केंद्रों के साथ पत्तियों पर आते हैं। धीरे-धीरे ये पूरे पत्ती की सतह पर फैल जातें हैं।

रोग नियंत्रण उपाय

  • रोग विरोधी किश्म जैसे ह्रस्-६, छ्वह्र-०३-९१, छ्वह्र-०३-९३, छ्व॥ह्र-२०१०-१ का उपयोग करना चाहिए।
  • बीज की फफूंदनाशक दवा जैसे वाीटावैक्स 2.5  ग्राम दवा प्रति कि.ग्रा. बीज की दर या थीरम / 3 ग्राम दवा प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करें।
  • वाीटावैक्स / 0.1प्रतिशत या प्रोपिकोनाज़ोले / 0.1 प्रतिशत का छिड़काव कर सकते हैं।

लूसर्न (रिजका)

लूसर्न को चारा फसल की रानी के रूप में जाना जाता है इसका उत्पादन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और लद्दाख के लेह क्षेत्र के सिंचित क्षेत्रों में होता है।  ज्यादातार इसको वहां उगाया जाता है जहां पानी की आपूर्ति अपर्याप्त और सर्दियों की अवधि कम हो। यह बारहमासी (3-4 वर्ष),  चारा फसल है जिसमें 72 प्रतिशत सूखे पदार्थ पाचन योग्यता के साथ 15 प्रतिशत क्रूड प्रोटीन होता है। यह फसल काफी कम तापमान को भी अच्छी तरह से झेल सकती है।

जड़ गलन रोग लक्षण

  • इससे ग्रसित पौधे सूख जातें है और निचली पत्तियां पीले, लाल और भूरे रंग की हो जाती है।
  • अत्यधिक गंभीर संक्रमण से जड़ों के कमजोर होने से पौधे मर जाते हैं।

रोग नियंत्रण उपाय

  • बीज शोधन करें।
  • जल प्रबंधन करें।

डाउनी मिल्ड्यू 

  • इसका प्रभाव नई पत्तियों पर दिखाई देता है।
  • पत्तियों के नीचे की सतह पर हल्के बैंगनी और भूरे रंग की वृद्धि दिखाई देती है।
  • अंत में पत्तियां झुलसी जैसी प्रतीत भी होती है।

रोग नियंत्रण उपाय

  • मैंकोजेब / 0.25 प्रतिशत का छिड़काव कर सकते हैं।
  • रोग विरोधी किश्म जैसे चेतक,  गओल-2 का उपयोग करना चाहिए।

रस्ट रोग

  • पत्तियों के निचले भाग की तरफ, तना और डंठलों मेें पीले रंग की हेलो से घिरे लाल-भूरे रंग स्पॉट्स दिखाई देते हैं।
  • गंभीर संक्रमण से पत्तियां समय से पहले ही गिर जाती है और पौधा सूखने लगता है।

रोग नियंत्रण उपाय

  • फसल की कटाई के बाद खेत में पड़े रोगी पौधों के अवशेषों को एकत्र करके जला देना चाहिये।
  • रोग विरोधी किश्म का उपयोग करना चाहिए।
  • प्रोपिकोनाज़ोल / 0.1 प्रतिशत का छिड़काव  करना चाहिए।

 

  • नितीश रतन भारद्वाज
  • पुष्पेन्द्र कोली 
  • सुनील नीलकंठ रोकड़े

 email : kolipushpendra@gmail.com

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