सरकारिता बनकर मर रही बेसहारा सहकारिता

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सबका साथ और सबका विकास वाली बात, हम कहते, सुनते या उस पर वोट लेते और देते जरूर हैं, लेकिन एक व्यवस्था के रूप में उस पर हमारा भरोसा बिल्कुल नहीं है। शायद आपको याद हो कि हमारी तो एक वैदिक प्रार्थना ही है कि साथ चलें, साथ बोलें और साथ ही विचार कर अपना कल्याण करें। यानी, आपको भरोसा करना पड़ेगा कि सहकारिता भारत में अंग्रेज नहीं लाया था, यह तो हमारे खून या उसके गुण-सूत्रों में ही होना चाहिए। लेकिन, आजाद भारत के नियमों, कानूनों, व्यवस्था और प्रशासनिक ढाँचे में अपनाई गई सहकारिता आजकल न सिर्फ बीमार है, बल्कि मरणासन्न भी है।

इसका सबूत यही है कि नवम्बर की 14 तारीख से अगले एक सप्ताह तक रूढि़ कह लें, औपचारिकता कह लें, निमित्त कह लें या परंपरा कह लें, के तहत सहकारिता-सप्ताह मनाया जाता है। मनुष्य का दूसरे मनुष्य को आगे बढऩे में दिया जाने वाला सहयोग, इस सम्बन्ध में वेदों, पुराणों और इतिहास में लिखे प्रसंग याद किये जाते हैं और सात रंगों के झंडे भी लहराए जाते हैं। पर अब यह कुछ नहीं होता। पिछले कुछ सालों से मुझे तो नहीं दिखा।

आजादी के बाद से, आज तक, देश के विकास हेतु अपनाये गए मॉडल से हमें सहमति या असहमति हो सकती है, पर हजारों साल से चले आ रहे, जांचे, परखें और जिए गए रास्ते को बदलने, बिगाडऩे या अपनी सुविधा के हिसाब से बदल देने से उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद क्यों और कैसे की जा सकती है ? 

यही नहीं सहकारी संस्थाएं मरती जा रही हैं और उस पर कोई रंज-गम या चर्चा भी नहीं होती। यह पूरे देश में ऊपर से नीचे तक हो रहा है। आप मजाक मत समझिये, दिल्ली में देश की सहकारिता विकास के लिए बनी सबसे बड़ी संस्था (एनसीडीसी) की बिल्डिंग को ही लोग पायजामा बिल्डिंग के नाम से जानते हैं। प्रदेश की बात करें, तो सहकारिता की सारी शीर्ष संस्थाएं या तो बीमार हैं, मर रही हैं या मर गई हैं। मरी संस्थाओं का अंतिम संस्कार (परिसमापन) या तो चुपचाप हो चुका है, या उसका इंतजार है।

जिलों में भी कमोबेश यही हालत है, और नीचे, ग्राम स्तर पर तो हालत बहुत ज्यादा खराब है। ग्रामीण स्तर की संस्थाएं मरी नहीं हैं, बस उनका नाम भर सहकारी है। वे बजाय लोगों द्वारा चलाये जाने के, सरकारी अमले द्वारा सरकारी वितरण और उपार्जन का काम कर रही हैं। सहकारिता के किसी भी सिद्धांत या परिभाषा के तहत वे सहकारी संस्थाएं तो हैं  ही नहीं। उन पर राज्य सरकार के सहकारिता विभाग के सरकारी बेताल लटके हुए हैं।

सबने देखा तो नहीं होगा, पर सुना जरूर होगा कि कभी मध्य प्रदेश में सहकारिता आंदोलन अपने श्रेष्ठ रूप में था। मरी हुई संस्थाओं में से एक के विशाल भवन में तो राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय लगता है। उस शीर्ष संस्था का नाम ही था मध्य प्रदेश राज्य सहकारी भूमि विकास बैंक। यानी उसके समाप्त होते ही, भूमि विकास गतिविधि प्रतिकूल रूप में कुछ तो प्रभावित हुई ही होगी। मरी हुई दूसरी शीर्ष संस्था की मृत देह के रूप में करोड़ों रुपयों की लागत के सोयाबीन कारखाने बेकार पड़े सड़ रहे हैं। कितने नाम गिने आवास, उपभोक्ता बुनकर, मुद्रण आदि इत्यादि, जीवन और उसकी जरूरतों से जुड़ी लगभग प्रत्येक सहकारी संस्था गंभीर रूप से बीमार है।

अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और सक्रिय काल में सहकारिता से जुड़े रहे, या नीति-निर्माण के स्तर पर भी रह चुके श्री जे. पी. श्रीवास्तव सहकारिता के इन दुर्दिनों या दुर्दशा की शुरुआत 1980 से देखते हैं। यह वही काल था, जब सहकारी संस्थाओं में निर्वाचन की जगह नामांकन हुए थे। उस समय के शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व ने सहकारी संस्थाओं को ग्रामीण विकास के साधन नहीं, राजनैतिक लाभ का औजार मान लिया था। यह वही काल था जब सहकारिता सरकारिता बन गई थी। फिर यह क्रम ऐसा चला कि आज तक जारी है।

अभी चल रही सरकार ने भी लम्बे समय से अधिकांश जगह सहकारिता के चुनाव ही नहीं करवाए हैं। इन्हें भी नामांकन पर ही भरोसा है। साफ है कि नामांकित व्यक्ति की निष्ठा और जवाबदारी उसके राजनैतिक नायक के प्रति होगी, जनता के प्रति क्यों होगी? इसका सीधा-सीधा असर ग्रामीण साख व्यवस्था और खेती पर पड़ा है। सारे राजनैतिक नायक,सारे काम अपने खुद के स्वार्थों और दृष्टि के हिसाब से ही करते या करवाते हैं। सरकारी अमला तो उनके भक्ति-भाव में पहले से रहता है, नामांकित व्यक्ति आड़ के लिए तिनके का अगला काम कर देते हैं। इन्हीं राजनैतिक कारणों से जिला बैंकों की वसूली नहीं हो पाती। इससे बीमार होकर आगे देने के लिए वे नाबार्ड के कृषि ऋण से वंचित हो जाते हैं और काम चलाने के लिए महंगा ऋण लेते हैं। इस बीच फिर चुनाव आ जाते हैं और ऋणमुक्ति की बात चल पड़ती है। यानी फिर कम वसूली और घाटा ही घाटा। यह दुष्चक्र बरसों से चल रहा है। इसका आखिरी नुकसान किसान को होता है।

यहां दु:ख इस बात का है कि सरकार में बैठे हर स्तर के लोग भी जनता के अपने ही हैं, वे भी भारत को जानते समझते हैं और भारत या जनता के कल्याण की बात भी करते हैं, पर जमीनी स्तर पर जिम्मेदारियां बांटने या सत्ता में सभी को भागीदार बनाने में बड़ी और आपराधिक कंजूसी करते हैं।

ऐसा नहीं है कि सारे देश या प्रदेश में सहकारिता निराशाजनक स्थिति में ही है। इस मरुस्थल में भी हरियाली के टापू हैं, पर ये वही हैं, जहां ये सरकारी अति-नियंत्रण से बाहर हैं। जहां, चाहे जैसे हो, सहकारी स्वायत्तता बरकरार है।

सरकारिता बनी सहकारिता में किसानों के नाम से राजधानी से पैसा अनजान अंधी गुफाओं में जा रहा है। तभी तो चपरासी, चौकीदार और समिति सेवकों के यहां छापों में करोड़ों रुपये मिल रहे हैं और नगरीय जनता को लग रहा है, या प्रचार हो रहा है कि सरकारी बजट का बड़ा हिस्सा किसानों के हित में खर्च हो रहा है। भरोसा कीजिये सहकारिता ग्रामीण हो या शहरी, उस पर सरकारी अफसर काबिज हैं। अपने से ऊपर वालों की चाकरी और अपनी नौकरी बचाने के लिए वे बहती गंगा में हाथ तो धोते ही हैं, किसी का राजनैतिक औजार बनने में भी उन्हें कोई हर्ज नहीं होता। इस तथ्य का सबसे अच्छा उदाहरण अपना मध्य प्रदेश है।

अब राजनीति धन कमाने, बलवान होने, साधनों पर काबिज होकर उनका दुरूपयोग करने और चरित्र हनन का साधन बन गई है। इसमें गाँव-गाँव फैली ये सहकारी समितियां बड़ी उपयोगी होती हैं। इसीलिए ऊपर बैठे लोग, इनके ऊपर से अपना नियंत्रण कभी भी नहीं छोडऩा चाहते। इसीलिए नीचे जमीनी स्तर पर योग्य नेतृत्व पैदा ही नहीं होने दिया जाता। मध्यप्रदेश का ही सन्दर्भ ले लें और बताएं कि पिछले पंद्रह या बीस सालों में सहकारिता का एक भी नेता पैदा हुआ है क्या? इसी कारण सहकारिता लगभग बेसहारा या लावारिस हो गई है। यहां तो मंत्री और अफसरों का मन ही जन-गण का मन है।
 

  • कमलेश पारे 
  • Mob.: 9425609231, Email: kpare@rediffmail.com
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