कई मायनों में अलग है इंदौर का कृषि महाविद्यालय

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इंदौर। इंदौर का कृषि महाविद्यालय इस मायने में अलग है, कि यहां छात्रों को शैक्षणिक के अलावा अन्य गतिविधियों के संचालन, अनुसंधान के साथ ही रोजगार प्राप्ति के अवसर भी मिलते हैं। किसानों से संवाद के साथ  मौसम संबंधी जानकारी भी दी जाती है। यहां की कम्पोस्ट खाद बनाने की पहली विधि दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इंदौर कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. यू.आर. खंडकर ने ऐसे ही अनेक बातें कृषक जगत से हुई चर्चा में साझा कीं।

गत जुलाई इंदौर कृषि महाविद्यालय में नियुक्त हुए अधिष्ठाता डॉ. यू.आर. खंडकर ने बताया कि गत 3 दिसंबर को कॉलेज में गेहूं अनुसंधान केंद्र इंदौर के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एसवी साईं प्रसाद के मुख्य आतिथ्य में कृषि शिक्षा दिवस मनाया गया। विश्व मृदा दिवस पर भी कार्यक्रम आयोजित किया गया। अध्ययनरत करीब 500 छात्रों के लिए अंग्रेजी की विशेष शाला लगाने के साथ ही उनके व्यक्तित्व विकास के लिए विशेषज्ञों को भी आमंत्रित किया जाता है। रोजगार के साथ ही अपने छात्रों की उपलब्धियां गिनाते हुए अधिष्ठाता ने बताया कि पिछले सत्र में कॉलेज के चार छात्रों का चयन अ.भा.जूनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए हुआ है। वहीं राष्ट्रीय स्तर की निबंध प्रतियोगिता में यहां के छात्र श्री आकाश कुशवाह को 5  हजार का प्रोत्साहन पुरस्कार मिला है। अंतिम वर्ष के छात्रों को रूरल एग्रीकल्चर वर्क एक्सपीरियंस (रावे) कार्यक्रम के तहत खुद करो, खुद सीखो में 6  माह का व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है, जिनमें छात्र किसानों के साथ रहकर खुद खेती करते हैं। अभी छात्र मशरूम उत्पादन की तकनीक सीखने के साथ ही खुद मार्केटिंग भी कर रहे हैं।

  • हजारों किसानों को भी लाभ मिला
  • महात्मा गांधी पधारे थे कॉलेज में
  • होल्कर और सिंधिया रियासतों का संगम

अनुसंधान का लाभ किसानों को

कृषि महाविद्यालय की विविध गतिविधियों की जानकारी देते हुए विज्ञान और कृषि रसायन प्राध्यापक डॉ. संजय कुमार शर्मा ने बताया कि अनुसंधान परियोजनाओं का लाभ किसानों को देने के लिए किसान मेला, प्रशिक्षण कार्यक्रम और खेत प्रदर्शन भी किए जाते हैं। किसानों को कृषि उद्यानिकी की नवीन पद्धतियों से अवगत कराने के साथ ही विशेष मौकों पर कृषि वैज्ञानिकों को गांवों में भेजा जाता है। अब मिट्टी परीक्षण के नमूनों का  15-25 दिन में विश्लेषण कर रिपोर्ट दे दी जाती है, जिसमें जरूरत के मुताबिक सिंचाई और खाद की अनुशंसा की जाती है। 

कृषि मौसम सेवा

ग्रामीण कृषि मौसम सेवा योजना के तहत किसानों को 5 दिन पूर्व मौसम की सूचना प्रति मंगलवार और शुक्रवार को एसएमएस से दी जाती है। इससे अब तक 80 हजार किसान लाभान्वित हो चुके हैं। श्री शर्मा ने बताया कि कॉलेज में शुष्क खेती अनुसन्धान परियोजना 25 सालों से संचालित की जा रही है। बारानी खेती, फसलोत्पादन, वाटर हार्वेस्टिंग और मृदा संरक्षण पर भी कार्य जारी है। यहां चने, करड़ी (कुसुम) कपास, ज्वार आदि की उन्नत किस्में भी विकसित की गई है। कपास की किस्म  आरवीएस -11 दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय है। यहां की कम्पोस्ट खाद बनाने की पहली विधि विश्व प्रसिद्ध है। 1924 तक यह कॉलेज इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट इंडस्ट्रीज के अधीन था, जिसमें होल्कर और ग्वालियर अंचल शामिल था। यहां की कम्पोस्ट खाद बनाने की विधि का 1936 में महात्मा गाँधी ने भी अवलोकन किया था। 1959 में यह पृथक अस्तित्व में आया। वर्तमान में यहां के सोयाबीन और गेहूं अनुसंधान केंद्रों की सक्रियता के चलते कृषि क्षेत्र में हासिल हुई उपलब्धियों को देखते हुए इंदौर में केंद्रीय कृषि विश्व विद्यालय स्थापित करने की मांग जायज है।

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