सत्ता परिवर्तन के साथ - खेती को नई दिशा देने की जरूरत

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सत्ता-परिवर्तन-के-साथ---खेती-को-नई-दिशा-

(डॉ. जी.एस. कौशल)

लंबे अंतराल के बाद म.प्र., छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान में शासन परिवर्तन हुआ है। तीनों ही राज्यों में कांग्रेस को दायित्व मिला है। तीनों राज्यों की सरकार को किसान एवं खेती के संबंध में उच्च स्तरीय विशेषज्ञों की  कमेटी बनाकर नीति निर्धारित करना उपयुक्त होगा। तीनों राज्यों की भौगोलिक स्थिति एवं समस्या काफी हद तक एक समान है। मैं यहां विशेष रूप से म.प्र. के संबंध में ही बात करूंगा, परंतु यह राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ के लिए भी उतनी ही उपयुक्त रहेगी। 

कृषक वर्तमान में विषम परिस्थितियों से जूझ रहा है, उसे सही दिशा की नितांत आवश्यकता है। अत: नए नेतृत्व की भूमिका अहम रहेगी। चुनाव के पूर्व कांगे्रस ने अपने वचन पत्र में कई वादे किए हैं, इन्हें समयावधि में पूर्ण करना आवश्यक है, जिसका लाभ 5-6 माह बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में कृषकों को दिला सके। 

वचन पत्र का मुख्य मुद्दा कृषकों का ऋण 10 दिनों में माफ करना है। प्रदेश की वित्तीय स्थिति अत्यंत ही विकट है, सरकार ऋण में डूबी हुई है। ऐसे में ऋण माफी के लिए धन राशि की व्यवस्था करना एक टेढ़ी खीर है, परंतु इसे तो पूरा करना ही होगा। वैसे कृषि नीति ऐसी होना चाहिए कि कृषक को ऋण की आवश्यकता नहीं होना चाहिए विशेष रूप से अल्प अवधि ऋण। ऋण माफी एक समय तो दी जा सकती है, पर इसे हमेशा के लिए प्रभोलन नहीं बनाया जा सकता। अत: वर्तमान शासन को ऐसी वास्तविक नीति एवं योजनाएं बनानी होंगी, जो जमीन पर कृषकों के पास पहुंचे, उसका लाभ कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने में मिले। योजना ऐसी होना चाहिए जिसमें लागत कम और उत्पाद का उचित मूल्य शासन पर निर्भर नहीं रहते हुए मिल सके। इस सिद्धांत का मूलमंत्र 1998-2004 के बीच गौ आधारित, प्राकृतिक जैविक खेती के रूप में सफलतापूर्वक प्रदेश के साथ देश को दिया था। इस नीति का पालन किया होता तो प्रदेश जैविक खेती में सिरमौर होता। देश-विदेश में प्राकृतिक जैविक उत्पादों की अत्यधिक मांग है। इस खेती पद्धति के आदान कृषक अपने प्रक्षेत्र पर ही तैयार करता है, जिसकी लागत कम होती है, उत्पादन में सतत बढ़ोत्री मूल्य प्राप्त होता है। इसी के साथ उपभोक्ता की मांग ग्राम आधारित गृह उद्योग के बने प्राकृतिक उत्पादों की लगातार बढ़ रही है। अत: प्राकृतिक, वैदिक कृषि पद्धति एवं ग्राम आधारित गृह उद्योगों के संबंध में स्पष्ट नीति बनानी होगी। 

  • किसानों को कर्ज की जरूरत न पड़े।
  • प्राकृतिक जैविक खेती की नीति बने। 
  • कृषि उपज विपणन की नीति बनायें। 
  • कृषि एवं उद्यानिकी विभाग में आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत। 

भारत सरकार 26 फसलों से भी अधिक का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के रूप से निर्धारित करती है। यह देखना होगा कि क्या सभी फसलों का निर्धारित मूल्य कृषक को मिल रहा है, वास्तविकता तो यह है कि यह गेहूं एवं धान तक ही सीमित है। शेष फसलें तो बाजार पर ही निर्भर है, जिसका उचित मूल्य कृषक को नहीं मिलता। इसी के साथ उद्यानिकी फसल विशेष रूप से टमाटर, आलू, प्याज एवं लहसुन के हाल बहुत ही खराब हैं। अत: इन फसलों के लिए विशेष नीति बनाना होगी। प्रदेश में भावान्तर योजना पूर्ण रूप से अव्यवहारिक एवं असफल रही है। शासन को मण्डी एक्ट का परिपालन कराते हुए एमएसपी पर क्रय व्यापारियों द्वारा  सुनिश्चित किया जाना होगा तथा मार्केटिंग एवं भण्डारण विशेष रूप से करना होगी। 

प्रदेश द्वारा लगातार कृषि कर्मण पुरस्कार प्राप्त किया जाता रहा है, इसके विरुद्ध कृषकों की आत्महत्याएं भी लगातार बढ़ती रही हैं। आत्महत्या मामले में प्रदेश तीसरे पायदान पर है। अत: प्राप्त पुरस्कारों एवं वास्तविक उत्पादन की समीक्षा कर वस्तु स्थिति कृषकों एवं उपभोक्ताओं को सामने लाना होगी। इस अध्ययन के आधार पर क्षेत्रवार फसलवार नीति निर्धारित हो सकेगी। जहां तक कृषकों की आत्महत्याओं का प्रश्न है, इस संबंध में वर्ष 2012 में मानव अधिकार आयोग द्वारा विशेषज्ञों की समिति की रिपोर्ट के आधार पर विस्तृत अनुशंसाएं शासन को प्रस्तुत की थी, यदि उनपर क्रियान्वयन किया जाता तो काफी हद तक आत्महत्याओं को रोका जा   सकता था। 

कृषकों को दिन के समय बिजली प्रदाय, आदान एवं सिंचाई जल की लगातार प्रदाय व्यवस्था भी सुनिश्चित करना होगी। यह भी देखना होगा कि जितनी सिंचाई बताई जा रही है वह वास्तव में फील्ड में उपलब्ध है। 

 

मुद्दे तो कई हैं, परंतु प्रारंभ में ही देखना होगा कि कृषि कल्याण एवं उद्यानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी विभाग का तकनीकी एवं प्रशासनिक अमला जो पूर्णता: ध्वस्त हैै वह निर्धारित नीतियां का अमल कृषकों के हित के करने में सक्षम है, नहीं तो इसमें आमूलचूल परिवर्तन की दिशा में विचार करना होगा। इसी प्रकार कृषक आयोग को भी सक्रिय करना आवश्यक है। 

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