खेती - किसानी की दुर्दशा

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खेती---किसानी-की-दुर्दशा-

..... 'खेत-किसान' ... दुर्दशा का पोस्टमार्टम -- अब और कितना-- कब तक ??? !!... ताज्जुब है अभी भी इस बात पर चर्चा हो रही है,और कारण तलाशे जा रहे हैं कि खेती- किसानी और किसान की बदहाली एवं उसकी यह दुर्दशा..क्या है, क्यों है ??? ...समिटों में,सेमिनार,वर्कशॉप, बैठकों और सभाओं में, सभी जगह इसी की चर्चा। मीडिया में भी विशेषज्ञों, नेताओं, बुिद्धजीवियों की टीम इसी के पोस्टमार्टम में। दिशा व दशा पर चर्चा - चिंता। मत- मतांतर। वाद- विवाद। जद्दो-जहद।.... सभी किसान की दुर्दशा का बखान बड़े अच्छे से, लच्छेदार, प्रभावशाली भाषा मे करते  हैं। तर्क के साथ। आंकड़ों के साथ। निश्चित ही हमारे हित में इनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। कम से कम सरकार को आइना दिखाने का काम तो ये कर ही रहे हैं और हमें अन्नदाता भी कहते नहीं थकते। पर कुछ महानुभावों को तो सुनकर कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे वे 'अन्नदाता' कह कर हमें चिढ़ा रहे हों। हम पर तंज कस रहे हों। ... विडम्बना तो यह है की.... समस्या का हल कैसे निकलेगा, उपाय क्या हैं ? हमें  करना क्या होगा.?..  ...  सिलसिलेवार स्पष्ट दिशा हमें कोई नहीं देता। ... परिणाम मत-मतांतर। कंफ्यूजन। उलझन। भटकाव। दिशा भेदन। गुमराही । सब अधर में । निष्कर्ष जीरो।.... अरे भाई पिछले वर्षों में खोजबीन, विचार विमर्श,, इस पर मंथन खूब हो चुका। किसान व उनके प्रतिनिधि, उनके संगठन, नुमाइंदे, वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, और नीति निर्धारक सभी अलग- अलग और एक साथ  बैठकर भी, एक बार नहीं कई बार मंथन कर चुके ( सौभाग्य से अनेक बार मैं भी उसका हिस्सा रहा ) खूब चर्चाएं व चिंताएं हुई। अन्तिम तौर पर  जो सर्वमान्य निष्कर्ष निकला उसे न केवल हमे अच्छे से समझना होगा वरन अमलीजामा भी पहनाना होगा। (1) किसानों के हालात तब तक नहीं सुधरेंगे जब तक उसे उसके उत्पादन का वाजिब दाम नहीं मिलेगा (2) किसानों को पारंपरिक खेती के साथ या हट कर, खेती को बाजार में माँग के अनुरूप नए नए आयामो से जुडऩा होगा। साथ ही खेती की बारीकियों को समझते हुए, कम से कम लागत में अधिक लाभ कमाने के गुणों के साथ, तकनीकियों को अपनाते हुए अब खेती के व्यवसाय को गंभीरता से लेना होगा। (3)  उसे खेती के अलावा अन्य व्यवसायों से भी जुडऩा होगा। तभी उसे सुरक्षा कवच उपलब्ध हो सकेगा। (4) सरकार यदि खेती व किसान को बचाना चाहती है तो उसे उसके उत्पादन की वाजिब कीमत देकर खरीद की गारंटी देनी ही होगी, साथ ही  पेंशन के साथ उसकी वार्षिक आय सुनिश्चित करनी होगी। / (5) अन्य तरह से  किसान के घाटे की पूर्ति करनी होगी। उसे उसकी लागत कम करने हेतु आदान वस्तुएं- खाद, बीज, दवाएं, यंत्र, बिजली, पानी, डीजल, ऋण,सिचाई सुविधाएं  आदि सस्ते में उपलब्ध कराना होगी। बोनस,डायरेक्ट सब्सिडी,सभी किसानों को बिना भेदभाव प्रति एकड़ फिक्स प्रोत्साहन राशि ( जैसे कुछ प्रान्तों में दी जा रही है ) देना होगा। फसल सुरक्षा कवच, बीमा, स्वास्थ्य, शिक्षा, आदि की नि:शुल्क समुचित व्यवस्था करनी होगी (6) किसान को अन्य धंधों/ विकल्पों से जोडऩे युद्धस्तर पर प्रयास करने होंगे। (7) किसानों के हितों को ध्यान में रखकर आयात- निर्यात, बाजार  व्यवस्था व अन्य संबंधित विषयों के लिए देश के किसानों के हितों को ध्यान में  रख कर व्यवहारिक कृषि नीति किसानों के साथ बैठ कर न केवल बनानी होगी, वरन प्रभावी ढंग से उसे लागू भी करनी होगी। अब किसानों, हमारे नुमाईंदों औऱ सरकार को उक्त बिंदुओं पर एक मत होकर, एक माइंडसेट बना कर, एक निश्चित दिशा के साथ.. खेत- किसान की दशा सुधार की 'दिशा' में, दृढ़ इक्षा शक्ति के साथ आगे बढऩा होगा अमलीजामा के लिए हम सबको मिलकर दवाब भी बनाना होगा।  यह हो जाये.. तो किसान समृद्ध होगा। देश समृद्ध होगा।

- के. के. अग्रवाल, अध्यक्ष, 
भारत कृषक समाज, महाकौशल म. प्र.
मो. : 9827068879,  kkajabalpur@gmail. com

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