फसलों के अवशेषों का समुचित प्रबंधन

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पादप अवशेषों को भूमि में मिलाने के लाभ

  • एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन के घटक के रूप में फसल अवशेष भी अहम योगदान प्रदान करता है। फलस्वरूप मृदा में कार्बनिक पदार्थ की बढ़ोत्तरी से मृदा जीवाणुओं की क्रियाशीलता बढ़ती है जिसके कारण उत्पादन पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। 
  • वातावरण को विपरीत परिस्थितियों से बचाने में सहायक है। 
  • दलहनी फसलों के फसल अवशेष भूमि में नत्रजन एवं अन्य पोषक तत्वों की मात्रा को बढ़ाने में सहायक है। 
  • फसल अवशेष कम्पोस्ट खाद बनाने में सहायक है जो कि मृदा की भौतिक, रसायनिक एवं जैविक क्रियाओं में लाभदायक है। 
  • पादप अवशेष मल्च के रूप में प्रयोग करने में मृदा जल संरक्षण के साथ-साथ फसलों को खरपतवारों से बचाने में सहायक है। 
  • मृदा में जीवांश पदार्थ के बढ़ाने में योगदान करता है। 
  • मृदा जलधारण क्षमता में बढ़ोत्तरी होती है। 
  • मृदा वायु संचार में बढ़ोत्तरी होती है।

पिछले कुछ वर्षों में एक समस्या मुख्य रूप से देखी जा रही है कि जहां हार्वेस्टर के द्वारा फसलों की कटाई की जाती है उन क्षेत्रों में खेतों में फसल के तने के अधिकतर भाग खेत में खड़े रह जाते हैं तथा वहां के किसान खेत में फसल के अवशेषों को आग लगाकर जला देते हैं। अधिकतर रबी सीजन में गेहूं की कटाई के पश्चात विशेष रूप से देखने को मिलता है कि किसान अपनी फसल काटने के पश्चात फसलों के अवशेष  को उपयोग न करके उसको जला कर नष्ट कर देते हैं।

हमारे देश में फसलों के अवशेषों का उचित प्रबंध करने पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता जबकि पौधों के बढ़वार हेतु 16 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, जिसमें कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन प्रकृति से प्राप्त होता है ये तत्व पौधों के लगभग 95 प्रतिशत भाग के निर्माण, बढ़वार एवं उत्पादन में सहायक हैं। उक्त से स्पष्ट है कि पौधों के विभिन्न अंगों (जड़, तना, फूल, फल, दाना आदि) के बढऩे हेतु पोषक तत्व पौधों के जड़ों द्वारा, पत्तियों द्वारा, तनों द्वारा मृदा से अथवा वातावरण से ग्रहण करते हैं। जब किसान भाई खरीफ, रबी, जायद की फसलों की कटाई, मढ़ाई करते हैं तो जड़, तना, पत्तियाँ के रूपों में पादप अवशेष भूमि के अन्दर एवं भूमि के ऊपर उपलब्ध होते हैं। इन फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन कर भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ाने के साथ-साथ वायु प्रदूषण जल प्रदूषण इत्यादि से भी बचाया जा सकता है। इन अवशेषों को यदि मिट्टी पलटने वाले हल से, रोटावेटर से जुताई-पलेवा के समय मिला देने से पादप अवशेष लगभग बीस से तीस दिन के भीतर जमीन में सड़ जाते हैं जिससे मृदा में कार्बनिक पदार्थों एवं अन्य तत्वों की बढ़ोत्तरी होती है। फलस्वरूप फसलों के उत्पादन पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। 

फसल अवशेष जलाने से होने वाली हानियां 

  • फसलों के अवशेषों को जलाने से उनके जड़, तना, पत्तियों में संचित लाभदायक पोषक तत्वों का नष्ट हो जाना। 
  • फसल अवशेषों को जलाने से मृदा ताप में बढ़ोत्तरी होती है जिसके कारण मृदा के भौतिक, रसायनिक एवं जैविक दशा पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
  • पादप अवशेषों में लाभदायक मित्र कीट जलकर मर जाते हैं जिसके कराण वातावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। 
  • पशुओं के चारे की व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

फसलों के अवशेषों का उचित प्रबंधन

हमारे देश में हम फसल अवशेषों का उचित उपयोग न कर इसका दुरुपयोग कर रहे हैं जबकि यदि इन अवशेषों को सही ढंग से खेती में उपयोग करें तो इसके द्वारा हम पोषक तत्वों के एक बहुत बड़े अंश की पूर्ति इन अवशेषों के माध्यम से पूरा कर सकते हैं।

तालिका को देखकर हम स्पष्ट रूप से अनुमान लगा सकते है कि कितनी अधिक मात्रा में हम अपने देश में मिट्टी के आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति कर सकते हैं विदेशों में जहां अधिकतर मशीनों से खेती की जाती है अर्थात् पशुओं पर निर्भरता नहीं है वहां पर फसल के अवशेषों को बारीक टुकड़ों में काटकर मिट्टी में मिला दिया जाता है यद्यपि वर्तमान में हमारे देश में भी इस कार्य के लिये रोटावेटर जैसी मशीन का प्रयोग प्रारम्भ हो गया है जिससे खेत को तैयार करते समय एक बार में ही फसल अवशेषों को बारीक टुकड़ों में काट कर मिट्टी में मिलाना काफी आसान हो गया है। जिन क्षेत्रों में नमी की कमी हो वहां पर फसल अवशेषों को कम्पोस्ट खाद तैयार कर खेत में डालना लाभप्रद होता है। ऑस्ट्रेलिया, रूस, जापान व इंग्लैंड आदि विकसित देशों में इन अवशेषों को कम्पोस्ट बनाकर खेत में डालते हैं या इन्हें खेत में अच्छी प्रकार मृदा में मिलाकर सड़ाव की क्रिया को सुचारु रूप से चलाने के लिये समय-समय पर जुताई करते रहते हैं।

फसल अवशेषों का उचित प्रबन्ध करने के लिये आवश्यक है कि अवशेष (गन्ने की पत्तियों, गेहूं के डंठलों) को खेत में जलाने की अपेक्षा उनसे कम्पोस्ट तैयार कर खेत में प्रयोग करें। उन क्षेत्रों में जहां चारे की कमी नहीं होती वहां मक्का की कड़वी व धान की पुआल को खेत में ढेर बनाकर खुला छोडऩे के बजाय गड्ढों में कम्पोस्ट बनाकर उपयोग करना आवश्यक है। आलू तथा मूंगफली जैसी फसलों को खुदाई कर बचे अवशेषों को भूमि में जोत कर मिला देना चाहिये। मूंग व उर्द की फसल में फलियां तोड़कर खेत में मिला दें। इसी प्रकार यदि केले की फसल के बचे अवशेषों से यदि कम्पोस्ट तैयार कर ली जाय तो उससे 1.87 प्रतिशत नाइट्रोजन 3.43 प्रतिशत फास्फोरस तथा 0.45 प्रतिशत पोटाश मिलता है।

खेतों के अन्दर कटाई बाद का काम

फसल की कटाई के बाद खेत में बचे अवशेष घास-फूस, पत्तियां व ठूंठ आदि को सड़ाने के लिये किसान भाई फसल को काटने के पश्चात 20-25 किग्रा नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़क कर कल्टीवेटर या रोटावेटर से काटकर मिट्टी में मिला देना चाहिये।

इस प्रकार अवशेष खेत में विघटित होना प्रारम्भ कर देंगे तथा लगभग एक माह में स्वयं सड़कर आगे बोई जाने वाली फसल को पोषक तत्व प्रदान कर देंगे क्योंकि कटाई के पश्चात दी गई नाइट्रोजन अवशेषों में सडऩ की क्रिया को तेज कर देती है। अगर फसल अवशेष खेत में ही पड़े रहे तो फसल बोने पर जब नई फसल के पौधे छोटे रहते हैं तो वे पीले पड़ जाते हैं क्योंकि उस समय अवशेषों के सड़ाव में जीवाणु भूमि की नाइट्रोजन का उपयोग कर लेते है तथा प्रारम्भ में फसल पीली पड़ जाती है अत फसल अवशेषों का प्रबन्ध करना अत्यन्त आवश्यक है तभी हम अपनी जमीन में जीवांश पदार्थ की मात्रा में वृद्धि कर जमीन को खेती योग्य सुरक्षित रख सकते हैं।

फसलों के विभिन्न अवशेषों में नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश तत्वों की मात्रा 
क्र. फसल अवशेष  नत्रजन प्रतिशत फास्फोरस प्रतिशत पोटाश प्रतिशत
1 गेहूं का भूसा 0.53 0.1 1.1
2 जौ का भूसा 0.57 0.26 1.2
3 गन्ने की पत्तियां 0.35 0.1 0.6
4 धान की पुआल 0.36 0.08 0.7
5 राइ/सरसों का तना 0.57 0.28 1.4
6 आलू 0.52 0.09 0.85
7 मूंगफली का छिलका  0.7 0.48 1.4
8 मटर की सूखी पत्तियां 0.35 0.12 0.36

 

  • वर्षा वर्मा
  • भुजेंद्र कुमार
  • लेखराज कुजूर

email : varshalaxmi22@gmail.com

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