गेहूं एक ही खेत में बार-बार लगाना लाभदायक नहीं

भूमि की तैयारी : खेत तैयार करने के लिये विभिन्न कृषि क्रियाओं की मात्रा मुख्य रूप से भूमि को किस्म फसल चक्र एवं उपलब्ध सुविधाओं पर निर्भर रहती है। उन स्थानों पर जहां गेहूं की खेती वर्षा के आधार पर की जाती है, विभिन्न कृषि क्रियाओं का उददेश्य मुख्य रूप से मृदा में अधिक से अधिक मात्रा में वर्षा के जल को शोषित करना और नमी को सुरक्षित बनाए रखना होता है। 

गेहूँ की उन्नत किस्में-

. असिंचित एवं अद्र्ध सिंचित क्षेत्रों के लिये- सी 306, सुजाता, जे. डब्लू. एस.17 एच.डब्लू 2004 अमर, एच.आई.1500(अमृता)
ब. सिंचित एवं समय से बोनी के लिए - डब्लू एच. 147, एच.आई 1077 (मंगला) जी.डब्लू 273,जी डब्लू 322, जे.डब्लू 1142 एच. आई.1479 (स्वर्णा), एच.आई. 8498 एम.पी.ओ.1106
. सिंचित एवं पिछेती बोनी के लिए- एचडी 2285 लोक-1, एच.आई.1454 (आभा), जी डब्लू173, एच.आई.1418 (नवीन चंदोसी), एम.पी.4010

गेहूं मुख्यत: शीतोष्ण जलवायु की फसल है। गर्म प्रदेशों में गेहूं की खेती शरद ऋतु में की जाती है। गेहूं की खेती 25 सेमी से लेकर 150 सेमी तक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाती है। गेहूं की खेती के लिए दोमट भूमि सर्वोत्तम होती है। मटियार और रेतीली भूमियों में भी गेहूं की खेती की जाती है। गेहूं को बार-बार एक ही खेत में लगाना लाभदायक नहीं है।

बीज उपचार: बीज जनित रोगों से फसल को बचाने के लिए बीज को कार्बोक्सिन से 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। 

बीज की मात्रा: सामान्य दशाओं में बीज की मात्रा 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर आवश्यक होती है।

बौने की गहराई: 4 से 5 सेमी गहराई पर बौनी जातियों की बुआई करें।

पौधों के बीच की दूरी: सामान्य परिस्थितियों में पंक्ति की दूरी 18-23 सेमी रखते है व पिछेती बुवाई में पंक्तियां 15-18 सेमी की दूरी पर रखें। 

खाद की मात्रा: असिंचित खेती के लिए 40 किलोग्राम नत्रजन,20 किलोग्राम स्फुर व 10 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर आवश्यक है। सिंचाई की सुविधा होने पर 120 किलोग्राम  नत्रजन, 60 किलोग्राम स्फुर व 30 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर आवश्यक है। 

सिंचाई : पहली सिंचाई- मुख्य जड़ बनना आरंभ होने के समय, बोआई से 20-25 दिन के अंदर दूसरी सिंचाई कल्ले फूटने की अवस्था बोने के 40-45 दिन बाद, तीसरी सिंचाई गांठ बनने की अंतिम अवस्था बोने के 65-75 दिन बाद, चौथी सिंचाई-फूल आने के समय बोने के 90-95 दिन बाद, पांचवी सिंचाई-दानों में दूध पडऩे के समय बोने के 110-115 दिन बाद एवं छठी सिंचाई दाना सख्त पड़ते समय बोने के 120-125 दिन बाद करते है।

निंदाई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण : मृदा में वायु संचार,मृदा नमी के संरक्षण व खरपतवार नियंत्रण के उददेश्य से निंदाई-गुड़ाई की जाती है। निराई-गुड़ाई खुरपी या हैंड हो के द्वारा करते है। इससे मृदा भुरभुरी बनती है।

रसायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण: चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नष्ट करने के लिये 2, 4-डी नामक रसायन की 1.0 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करते हैं। यह मात्रा 600-800 लीटर पानी में घोलकर,फसल बोने के 30-35 दिन बाद खेत में छिड़काव करें। गेहूं के प्रमुख सकरी पत्ती वाले खरपतवार फैलेरिस माइनर व जंगली जई हेतु आईसोप्रोट्यूरान 0.75 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से बोनी के 30 से 35 दिन के भीतर प्रयोग करें। 

फसल चक्र: गेहूं की फसल को बार-बार एक ही खेत में उगाना लाभदायक नहीं है। अत: गेहूं को अन्य फसलों के साथ चक्र में उगाना चाहिये।  
 

प्रमुख रोग एवं प्रबंधन: 

गेरूई या रतुआ- गेहूं में तीन प्रकार की गेरूई लगती है। 

1.पीली गेरूई  2. भूरी गेरूई 3. काली गेरूई (रतुआ)

रोग प्रबंधन- रोग प्रतिरोधी किस्मों में यू.पी.115,यू.पी.2121 एचडी 2009 एचडी 2278 एचडी 2307,एचडी 2236, डब्ल्यूएच 147, एचपी 1102 को बोयें जीनेब (डाइथेन जेड-78) का छिड़काव भी काली और भूरी गेरूई को रोकता है अथवा डाइथेन एम-45 नामक दवाई का छिड़काव 0.2प्रतिशत के हिसाब से पानी में घोलकर करें। 

कंडुवा रोग या अनावृन्त कण्डवा- यह बीज जनित फफूंद रोग है। इसमें जब पौधे में बालियां आती हैं तो उनमें दानों के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता हैै और कुछ समय पश्चात पूरी बाली समाप्त हो जाती है। 

रोकथाम-

  • रोगग्रसित पौधों को उखाड़कर बड़ी सावधानी के साथ पॉलीथिन की थैलियों में बंद करके मिट्टी में दबा देना चाहिये। 
  • रोगरोधी (डब्ल्यू.एल.711,एचडी 2009,डब्ल्यू.एल.410 आदि) केा बोना चाहिये। 
  • बीजों को 2.5 ग्राम प्रति किलो की दर से कार्बोक्सिन से उपचारित करें। 

 हानिकारक कीट व उनकी रोकथाम:

 दीमक- यह बड़ी हानिकारक है और जमीन में सुरंग बनाकर रहती है तथा पौधों की जड़ों को खाती रहती है। इसकी रोकथाम के लिए   क्लोरोपायरीफॉस 20 ईसी.1.5 लीटर 400 से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें। 

 तना छेदक- यह गेहूं का मुख्य हानिकारक कीट है। इसका मौथ पत्तियों पर अण्डे देता है। अण्डों से निकलने वाले कैटरपिलर तने में घुसकर   उसे काटने लगते हंै। इसकी रोकथाम के लिए क्विनालफास 25 ईसी.1.0 लीटर 400 से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

 एफिड - यह कीट, पौधों की पत्तियों के रस व बालियों में दाने आते है तो उसके रस को चूसता है। इससे पौधा पीला तथा दाने हल्के हो जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. का 100 एम.एल. प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें।

 

  • महाराज सिंह रघुवंशी 

email : ftraining02@gmail.com

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