मटर की उन्नत खेती

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जलवायु: यह शीत ऋतु की फसल है एवं ठण्डे मौसम में अच्छा उत्पादन देती है। बीज के अंकुरण के लिये 22 डिग्री से. एवं फसल की वृद्धि तथा विकास हेतु 13 से 18 डिग्री से. तापमान अनुकूल होता है। पाले से फसल की सुरक्षा जरूरी है। दाने वाली मटर की खेती प्रमुखतया उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और असम में की जाती है।

भूमि: 6.0 से 7.5 पीएच वाली दोमट एवं भुरभुरी दोमट मिट्टी मटर खेती के लिए उपयुक्त होती है।

भूमि की तैयारी: मटर बोने से पूर्व गर्मी में ढेंचा या सनई हरी खाद का इस्तेमाल करें एवं जब खरीफ की फसल निकल जाये तब खेत की जुताई 2 बार कल्टीवेटर से करके या रोटावेटर चलाकर पाटा लगाकर भूमि को समतल बना लेना चाहिए। बुवाई करने से पहले खेत में पानी देकर (पलेवा) बतर आने पर जुताई करें।

बुआई का समय: असिंचित क्षेत्रों में मटर की बुवाई का उपयुक्त समय अक्टूबर का प्रथम पखवाड़ा है। सिंचित क्षेत्रों में मटर की बुवाई अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवम्बर के  प्रथम पखवाड़े तक की जा सकती है।  

उन्नतशील किस्में:

शीघ्र तैयार होने वाली किस्में:-

पूसा प्रगति - फलियों की लंबाई 9-10 से.मी. एवं प्रति फली 8-10 दाने पाये जाते हैं। पहली तुड़ाई 60-65 दिन में हो जाती है एवं पाउड्रीमिल्डयू प्रतिरोधी किस्म है। इसकी उपज 70 क्विं. हरी फलियां प्रति हे. है।

पीएलएम-3- फलियों की लम्बाई 8-10 से.मी. एवं फलियों में 8-10 दाने पाये जाते हैं। पहली तुड़ाई 60-65 दिन में हो जाती है। इसकी उपज 90 क्वि. प्रति हे. हरी फलियां है।

जवाहर मटर -1 - यह जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित किस्म है। इसकी तुड़ाई 70-80 दिन में आरम्भ हो जाती है। इसकी उपज 90-120 क्वि. प्रति हे. हरी फली  है। फल में दानों की संख्या 8 से 9 एवं प्रोटीन प्रतिशत 24.6 प्रतिशत तक प्राप्त होता है।

जवाहर मटर-2- यह ज.ने.कृ.वि.वि. जबलपुर द्वारा विकसित प्रजाति है। इस किस्म का छिल्का मोटा होने के कारण भण्डारण एवं दूरस्थ स्थानों मेे भेजने के लिये उत्तम है। प्रोटीन 24.67 प्रतिशत होता है। इसकी उपज 135 से 150 क्वि. प्रति हे. हरी फलियांं है।

जवाहर मटर-3- यह किस्म टी-19 एवं अर्लीबेजर के क्रास से विकसित की गई है। इसमें फलियों की लंबाई 6-7 से.मी. एवं फली में दाने 7 तक होते हैं। इसकी उपज 75 क्वि. प्रति हे. तक हरी फलियां है।

जवाहर मटर-4- यह किस्म बीज की बुवाई से 75 दिन में तैयार हो जाती हैैै। फलियों की लंबाई 7 से.मी. एवं फलियों में 6 दाने पाए जाते हैं। इसमें प्रोटीन की मात्रा 28.7 तक होती है।

आजाद पी-1- इस किस्म में फलियों की लंबाई 8 से.मी.  तथा वजन 8 ग्राम तक होता है।

पंत उपहार- यह मध्यम अवधि की किस्म है। इसकी उपज बोर्नबिले से अधिक प्राप्त होती है। बुवाई के लिये उपयुक्त समय नबम्वर माह है।

अर्किल- इस प्रजाति की फलियां तलवारनुमा, 8-10 से.मी. लंबी एवं औसतन 5-6 दाने युक्त होती है। फसल बुवाई के 60-65 दिन में पहली तुड़ाई के लिये तैयार हो जाती हैं। यह किस्म पाउड्री मिल्ड्यू सहनशील किस्म है। इसकी औसत उपज 70-80 क्वि. प्रति हे. हरी फलिया हैं।

मटर रबी की एक प्रमुख दलहनी फसल है, जो हमारे आहार में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसका उपयोग दाल, सब्जी, कच्चे दानों के रुप में किया जाता है। मटर के दानों को सुखाकर जिसे फ्रीज मटर भी कहते हैं या डिब्बा बंद करके भी संरक्षित किया जाता है। इसमें 62.1 ग्रा. कार्बोहाइड्रेट्स, 64 मि. ग्रा. राइबोफ्लेविन, 0.72 मि. ग्रा. थाइमीन, 2.4 मि. ग्रा. नियासिन तथा 22.5  ग्रा. प्रति 100 ग्रा. पाच्य प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है। भारत में मटर का कुल क्षेत्रफल 7.13 लाख हेक्टर, उत्पादन 6.56 लाख टन तथा उत्पादकता 919 कि. प्रति हेक्टर है। मल्टीपल क्रापिंग सिस्टम में किसान मटर लगाकर प्रति हेक्टर प्रति वर्ष अपनी उपज में वृद्धि कर सकता है।

बोर्नविले- इस किस्म में पुष्प सफेद, लंबे एवं घने होते हैं। प्रथम तुड़ाई 80 से 85 दिन में होती है। फलियों में दाने 7-8 एवं मीठे होते हैं। औसतन उपज 90-100 क्वि. प्रति हे. हरी फलियों की उपज प्राप्त होती है।

मटर अगेती- इस किस्म में फलियां, बुवाई के 45-50 दिन में तुड़ाई योग्य हो जाती है। फली में दाने 5-6 एवं इसकी उपज 45 से 55 क्वि. हरी फलियां प्रति हेक्टर है। मटर के बाद गेहूं की फसल लेने के लिये अच्छी किस्म है।

मध्यम तैयार होने वाली किस्म:

आजाद मटर-3- यह किस्म कानपुर कृषि विश्वविद्यालय में विकसित की गई है। इसके पौधे मध्यम आकार के पत्तियां बड़ी, सीधी एवं हरे रंग की होती है। फलियों की तुडा़ई 65 से 70 दिन में की जा सकती है। फलियों में दानों की संख्या 7-11 तक होती है। हरी फलियों की उपज 65-70 क्वि./प्रति हेक्टेयर है।

बीज उपचार: बीज को थायरम 3 ग्रा./कि.ग्रा. या बाविस्टीन 2 ग्राम/कि.ग्राम. की दर से उपचारित कर लें एवं इसके बाद 3 ग्रा./कि.ग्रा. राइजोबियम से भी उपचारित करें।

बीज की मात्रा: शीघ्र पकने वाली किस्मों के लिये 100-120 कि.ग्रा. एवं मध्यम व देर से पकने वाली किस्मों के लिये 80 से 90 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है।

खाद एवं उर्वरक: अच्छी सड़ी हुई खाद 20 टन/प्रति हे. की दर से खेत की तैयारी के समय खेत में अच्छी तरह से मिला दें। 20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60-70 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 35-40 कि.ग्रा. पोटाश बुवाई के समय दें।

बीज बोने की दूरी: शीघ्र तैयार होने वाली किस्मों के लिये पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 5-6 से.मी. रखें। मध्यम एवं देर से पकने वाली किस्मों में, 45 से.मी. पंक्ति से पंक्ति का अंतर 45 से.मी. तथा पौधे से पौध कीे दूरी 8-10 से.मी. रखें। खेत में पलेवा देकर बतर आने पर 5-7 से.मी. गहराई पर बोनी मशीन द्वारा बुवाई करें।

फसल चक्र:-         
सोयाबीन -मटर अगेती किस्म-    गेहूॅ    
सोयाबीन- मटर -मूंग (ग्रीष्म कालीन)
बरबटी- आलू-    मटर

खरपतवार नियंत्रण: खेतों में पलेवा करके बुवाई करने से काफी संख्या में खरपतवार खत्म हो जाते हैं। रसायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिये बुवाई के 48 धंटे के भीतर पेन्डीमिथालिन नामक दवा 3.3 कि.ग्रा./हे. की दर से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

सिंचाई: हरी मटर के लिये फूल आने पर प्रथम सिचंाई करें एवं बीज के लिए दूसरी सिंचाई दाना बनते समय करें। मटर में दो सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। इसे फव्वारा विधि से सिंचाई करना उचित रहता है।

फसल सुरक्षा:

प्रमुख कीट:- 

पर्ण सुरंगक- पत्तियों में सुरंग बना देता है, जिससें पत्तियों मेें आड़ी तिरछी धारियां दिखाई देती हैं। ज्यादा प्रकोप होने से पत्तियां सूख जाती हैं। कीट प्रभावित फलियों को तोड़ देना चाहिए एवं फसल चक्र अपनायें। गर्मी में गहरी जुताई करें। रसायनिक नियंत्रण के लिये डाईमिथिएट 30 ईसी 1.5 मि.ली. पानी/हे. की दर से घोलकर छिड़काव करें।

फली छेदक- यह कीट अत्यंत हानिकारक होता है। इसकी इल्ली फली में घुसकर दानों को खाती रहती है। इसके नियंत्रण के लिये क्विनालफॉस 2 मिली./लीटर मात्रा पानी में घोलकर छिड़काव करें। 

तनामक्खी-  इसका प्रकोप पौधों की शुरू की अवस्था में तने में होता है। जिससे पौधा कमजोर होकर पीला पड़ जाता है एवं अंत में सूख जाता है। इसके नियंत्रण के लिये मेलाथियान 50 ईसी 2 मि.ली./प्रति लीटर पानी में घोलकर प्रयोग करें।

प्रमुख रोग:- 

उकठा रोग- यह रोग जीवाणु द्वारा होता है। इसमें पौधे सूखकर मर जाते हे। इसके नियंत्रण के लिये बाविस्टिन से उपचारित करके बीज को बोना चाहिये। फसल चक्र अपनायें एवं गर्मी में गहरी जुताई करें।

  • विनोद कुमार

  email : vinodkjnkvv@gmail.com
 

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