बारानी क्षेत्रों में मसूर लगायें

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भूमि : मसूर वर्षा आधारित फसल होने के कारण ऐसी मिट्टी वाले खेतों का चयन करें जिसमें नमी का संरक्षण हो, दोमट से भारी भूमि इसके लिऐ अधिक उपयुक्त है हल्की एवं शारी भूमि इसकी खेती के लिए ठीक नहीं होती है हल्की भूमि में कई बार सिंचाई करनी पड़ती है मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.0 के बीच हो तथा जल निकास की व्यवस्था हो अन्यथा पौधों के बढ़वार एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

जलवायु :  यह रबी मौसम की ही फसल है अत: ठंडी जलवायु उपयुक्त है इसे समुद्र तल से तीन हजार मीटर ऊचांई वाले क्षेत्रों में भी सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है परन्तु अत्यन्त ठंड एवं पाला पडऩे वाले स्थानों पर मसूर की उपज पर प्रतिकूल असर पड़ता है बीज के विकास पर विपरीत प्रभाव पडऩे से बाजार में उचित मूल्य नहीं मिलता है।

मध्यप्रदेश के असिंचित क्षेत्रों में चने के बाद रबी में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में मसूर मुख्य है। इसकी संरचना ही कुछ ऐसी है कि ये पानी का उपयोग इसके जीवनकाल में कल से कम करता है। इसकी पूरी ब्राम्हकृति छोटी सी झाड़ी जैसी है, तने पर सूक्ष्म रोयें पाये जाते है एवं पत्तियां भी बारीक व लंबी होती हंै। यही कारण है कि अन्य दलहनी फसल की अपेक्षा इसे प्रति इकाई उत्पादन में पानी की कम मात्रा की आवश्यकता होती है। यह पाले तथा ठंड के लिये अति संवेदनशील है, फिर भी अन्य रबी दलहन फसल मटर, चना की अपेक्षा अधिक ठण्ड को सहन कर सकती है। कम सर्दी वाले इलाकों में इसकी उपज कम मिलती है। इस फसल को प्रारंभिक अवस्था में ठंड तथा पकते समय कम तापक्रम की आवश्यकता होती है। इसके दानों में 24.21 प्रतिशत प्रोटीन, 26.0 कि.ग्रा. कैल्शियम, लोहा 6.1 कि.ग्रा. प्रति 100 ग्राम में होता है, राइबोफ्लेविन, नियासिन आदि प्रचुर मात्रा में पाया जाता है देश में मसूर की खेती अधिकांशत: उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश एवं बिहार में होती है, मध्यप्रदेश में बड़े दाने की बहुत अच्छी मसूर पैदा होती है यहां इसकी औसत उपज 4-5 क्विं. प्रति हेक्टेयर है जो कि दूसरे प्रदेशों से कम है क्योंकि मध्यप्रदेश में वर्षा आधारित क्षेत्रों में ही इसकी फसल ली जाती है एवं उकटा प्रतिरोधी किस्मों के विषय में कृषकों को ज्ञान न होना है।

बुआई समय : हमारे देश में असिंचित अवस्था में खरीफ की फसल की कटाई के बाद नमी उपलब्ध रहने पर अक्टूबर के प्रथम सप्ताह से नबम्बर के प्रथम सप्ताह तक मसूर की बोनी करें। सिंचित अवस्था में बोनी मध्य अक्टूबर से मध्य नबम्बर तक की जा सकती है। मध्य नबम्बर के पश्चात बोनी करने से उपज कम मिलती है क्योंकि 15 फरवरी से ही तापक्रम की वृद्धि होने लगती है जिसके दुष्प्रभाव के कारण समय से पूर्व फसल पकने लगती है जिससे बीज छोटा हो जाता है एवं साथ में कई बीमारियां भी आती हैं अत: समय पर बोनी अति आवश्यक है।

भूमि की तैयारी: जब खरीफ में पर्याप्त वर्षा न हो तो खेत में बुआई के पहले सिंचाई करें जब खेत में बतर आ जाये तब दो-तीन बार हल्की जुताई करके बखरनी करें तथा पाटा चलाकर खेत को समतल करें। जिससे नमी संरक्षित रहे। मसूर के लिये अधिक भुरभुरी व बारीक मिट्टी की आवश्यकता होती है जिससे अकुंरण अच्छा होता है।  

बीज की मात्रा: मसूर के सही उत्पादन पाने के लिए पौधों की संख्या का पर्याप्त होना आवश्यक है इसके लिए बड़े दानों वाली जाति का 50-60 कि.ग्राम. एवं छोटे दाने वाली जाति का 35-40 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर बोना चाहिए। बोआई कतार में करें, कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. रखें, देरी से बुआई करने पर 20-25 से.मी. कतारों की दूरी रखें, बुआई नारी या सीड ड्रिल से 5-6 से.मी. की गहराई पर उपयुक्त होती है।

मृदा उपचार:    मृदा जनित रोगों से बचने के लिए यह अति आवश्यक तकनीक है इसके लिए दो कि.ग्राम. ट्राइकोडरमा विरडी या ट्राइकोडरमा हरजियेनम को 100 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद या बायो गैस स्लरी मिलाकर नम करके एक सप्ताह तक ढंककर अंधेरे स्थान में रखें तत्पश्चात बुआई से पूर्व खेत में फैलायें जिससे मृदा जनित रोगों की रोकथाम हो जाये।

बीजोपचार: मसूर में मुख्य रूप से उकटा रोग का प्रकोप होता है जिससे कभी-कभी शत-प्रतिशत हानि हो जाती है इस लिये बुआई के लिए बीजोपचार अति आवश्यक है दो ग्राम थायरम एवं 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम से प्रतिकिलो बीज उपचारित करें तत्पश्चात 5 ग्राम राईजोबियम एवं 5 ग्राम पीएसबी कल्चर प्रति किलो ग्राम बीज की दर से मिलाकर थोड़ा पानी छिड़क कर अच्छी तरह से मिलायें जिससे कल्चर बीज से चिपक जायें इस तरह बीजोपचार के बाद बीज को छाया में सुखा कर फिर बोनी करें।

खाद एवं उर्वरक: मृदा उपचार के बाद मिट्टी परीक्षण के आधार पर की गई अनुसंशा के अनुसार ही खाद उर्वरक दें। 100-125 क्ंिवटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से गोबर खाद या कम्पोस्ट खाद अवश्य दें। गोबर खाद देने पर उर्वरकों की मात्रा आधी करना उचित होगा सिंचित फसल के लिये 20-25 कि.ग्रा. नत्रजन एवं 30-40 कि.ग्रा. स्फुर का उपयोग प्रति हेक्टेयर करेें। गंधक की कमी वाले क्षेत्रों में 20 कि.ग्रा. गंधक सिंगल सुपर फास्फेट दें।

सिंचाई: मसूर सामान्यत: असिंचित क्षेत्रों में ही ली जाती हैै। इसलिए यदि सिंचाई सुलभ हो तो बुआई पलेवा लगाकर करें इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है एवं अंकुरण अच्छा होता है मसूर में इसके बाद एक सिंचाई अगर पानी उपलब्ध हो तो फूल आने के पहले (बोनी के 40-45 दिन बाद) देने से उपज अच्छी होती है यदि मावठ की बरसात हो जाए तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है अधिक सिंचाई मसूर को हानि पहुंचा सकती है।

निंदाई-गुड़ाई: रसायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए बुआई से पूर्व फ्लूक्लोरिन 0.75 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर 600 ली. पानी में घोलकर छिड़कें। इस फसल में बोनी के बाद 50 दिनों तक खरपतवारों को नियंत्रण में रखें नहीं तो इसके बढ़वार में दुष्प्रभाव पड़ेगा। मसूर में खरपतवार की समस्या सिंचित फसल या मावठ की वर्षा होने पर हो सकती है ऐसी स्थिति में 'हो यंत्र' एवं 'हो साइकिल यंत्र' चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें इससे गुड़ाई भी हो जाएगी भूमि में वायु संचार बढ़ेगा जो कि मृदा स्वास्थ के लिये अति आवश्यक है।

रोग नियंत्रण: मसूर में मुख्य रूप से उकटा रोग का प्रकोप होता है इसके लिय मृदा उपचार एवं बीजोपचार अति आवश्यक है किस्मों के चयन में सिर्फ उकटा प्रतिरोधी जातियों का ही चयन करें फसल चक्र अपनाने से भी उकटा  रोग कम हो सकता है। कभी- कभी गेरूआ रोग का भी प्रकोप होता है इसके नियंत्रण के लिए 1.2-5 ग्राम डायथेन एम 45 प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर फसल में छिड़काव करें। गेरूआ प्रभावित क्षेत्रों में एल-4076 गेरूआ निरोधक जाति बोयें।

कीट नियंत्रण: मसूर में फली छेदक कीट पत्ती छेदक एवं माहो का प्रकोप होता है इसके लिए थायोमेथाक्जाम 25 डब्लूजी  25 ग्रा. दवा प्रति हेक्टेयर की दर से का छिड़काव करेें, या मैटासिस्टॉक्स 1.5 मि.ली पानी में घोल बनाकर छिड़केेंं। फली छेदक कीटों के लिए क्विनालफॉस 1 मिली पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करने से कीट नियंत्रित हो जाते है।

कटाई एवं गहाई: परिपक्व अवस्था में मसूर की फसल हरे से भूरे रंग की होने लगती है। तब फसल की कटाई सुबह जब थोड़ी ठंड एवं नमी रहती है, तब करें जिससे बीज कम झड़ते है। फसल को काटकर खलिहान में अच्छे से सुखायें। थ्रेसर या बैलों से गहाई करवाकर पंखे से साफ करें। दांतों से बीज को रखकर काटने से यदि कट की आवाज आये तो भण्डारण के लिये उचित मानना चाहिये।

उपज: किस्म के अनुसार बारानी क्षेत्रों में 8-10 क्विंटल व सिंचाई करने पर 15-16 क्विंटल मसूर की उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है। 

उपयुक्त किस्में विमोचन वर्ष पकने की अवधि (दिनों में) औसत उपज (क्विं/हे.)  विशेषताएं 
जवाहर मसूर-1 1991 120-125 16-19 मध्यम, बड़ दाना शीध्र पकने वाली
जवाहर मसूर-3 1999 115-120 18-20 बड़ा बीज एवं उगरा प्रतिरोधी
एल-4076 1993 130-135 18-22 मध्यम बड़ा उक्टा एवं गेरूआ के लिए सहनशील
के-75 1984 130-135 18-22 बड़ा दाना गेरूआं एवं उक्टा रोग के लिए सहनशील
आई.पी.एल. 81 2000 110-120 18-20 बड़ा दाना गेरूआं एवं उक्टा के लिए सहनशील
शेरी (डी.पी.एल. 62) 1997 130-135 18-20 बड़ा दाना गेरूआ प्रतिरोधी एवं उक्टा रोग के लिए सहनशील
आई.पी.एल. 316 2013 110-115 14-15 बड़ा दाना गेरूआ प्रतिरोधी एवं उक्टा रोग के लिए सहनशील
आर.वी.एल. 31 2014 110-115 18-19 बड़ा दाना, उच्च जैवभार एवं उक्टा रोग के लिए सहनशील
एल-4717 2016 96-106 Dec-13 अतिशीघ्र पकने वाली
आर.वी.एल. 11-6 2017 107-113 11-Dec बड़ा दाना एवं उक्टा रोग के लिए सहनशील

 

  • विनोद कुमार
  • अनसिंह निनामा 
  • दीपक खांडे

email : vinodkjnkvv@gmail.com
 

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