रबी फसलों में संतुलित पोषक तत्व प्रबन्धन फर्टिलाईजर की अहम भूमिका

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फसलों के लिए आवश्यक पोषक तत्व: फसलों को अपनी अच्छी बढ़वार और भरपूर उत्पादन के लिए कुल 16 पोषक तत्वों की सन्तुलित खुराक की आवश्यकता होती है। जिनमें से 3 पोषक तत्व (C,H,O) हवा तथा जल से मिल जाते है तथा शेष 13 पोषक तत्व (N, P, K, Ca, Mg, S, Fe, Zn, Mo, Co, B, Mn, Cl) जमीन से अपनी खुराक के रूप में लेते हैं। इन 13 तत्वों मे एक भी पोषक की अधिकता या कमी हो जाये तो जमीन में फसलों की खुराक असंतुलित हो जाती हैं। इसलिए इन सभी पोषक तत्वो की प्रर्याप्त मात्रा में उपलब्धता को बनाये रखने के लिए खाद व उर्वरक डालने की जरूरत पड़ती है। 

भारत में वर्तमान कुल खाद्यान्न उत्पादन 232 मिलियन टन पहुँच गया है। इस ऐतिहासिक बढ़ोतरी में रसायनिक उर्वरकों का विशेष योगदान है। वर्ष 1965-66 के दौरान 'सघन खेती, राष्ट्रीय प्रदर्शनों' तथा अधिक उपज वाली किस्मों के परिणामस्वरूप देश में हरित क्रान्ति में सिर्फ  रसायनिक उर्वरकों का योगदान 50 प्रतिशत था। इससे यह बात साफ है कि खेत में रसायनिक उर्वरकों का उचित उपयोग करके प्रति इकाई क्षेत्र से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। आधुनिक कृषि उत्पादन तकनीकी में रसायनिक उर्वरकों के साथ साथ कीटनाशक व खरपतवारनाशी रसायनों के प्रयोग में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है, परन्तु रसायनिक उर्वरकों के असन्तुलित प्रयोग से फसल उत्पादकता में ठहराव एवं मृदा उर्वरता में निश्चित रूप से गिरावट आयी है। ये भी प्रमाण है कि रसायनिक उर्वरकों के अधिक प्रयोग से भूमि की सतह पर पोषक तत्वों का असन्तुलन हो गया है और भूजल में भी इनकी मात्रा काफी बढ़ गयी है, जिससे स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होने का खतरा भी बढ़ गया है। 

फसलों में संतुलित खुराक की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?

  • खेत में लगातार एक ही तरह के उर्वरकों का  प्रयोग करते रहने के कारण जमीन में लवणीयता, क्षारीयता की समस्या में वृद्धि हुई है जिससे जमीनों की जैविक, भौतिक एवं रसायनिक संरचना बिगड़ गई हैै। जिससे निरन्तर जमीन के स्वास्थ्य में गिरावट आ रही है।
  • कुछ विशेष तत्वों की कमी हो जाने पर उनकी कमी के लक्षण फसलों पर बीमारी के रूप में दिखाई देते हैं। जैसे- गंधक तत्व की कमी होने पर मूगंफली की फसल में पीला धब्बा रोग हो जाता है इस रोग से नई पत्तियां आकार में छोटी व पीली पड़ जाती है।
अकार्बनिक पदार्थ एवं रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग
क्र उर्वरक  उपलब्ध पोषक तत्व की प्रतिशत मात्रा प्रयोग की विधि
1 यूरिया  नत्रजन 46 प्रतिशत बुवाई के समय कूड़ों में डालें तथा खड़ी फसल में बिखेर कर देंं तथा बाद में पानी लगा दें 
2 डी.ए.पी. फास्फोरस 46 एवं नत्रजन 18 प्रतिशत बुवाई के समय कूड़ों में ऊर कर दें
3 सिंगल सुपर फास्फेट फास्फोरस 16, सल्फर 12 एवं कैल्शियम 21 प्रतिशत बुवाई के समय कूड़ों में ऊर कर दें
4 म्यूरेट आफ पोटाश पोटाश 60 प्रतिशत बुवाई के समय कूड़ों में ऊर कर दें
5 जिंक सल्फेट जिंक 12 प्रतिशत एवं सल्फर 15 प्रतिशत 25 किलो प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय खेत में मिलायें। खड़ी फसल पर 0.5 प्रतिशत का घोल बनाकर छिड़काव करें
6 फेरस सल्फेट लोहा 19 प्रतिशत एवं सल्फर 12 प्रतिशत खड़ी फसल पर 0.5 प्रतिशत फेरस सल्फेट का छिड़काव करें
7 पोटेशियम सल्फेट पोटाश 50 प्रतिशत एव सल्फर 18 प्रतिशत बुवाई के समय कूड़ों में ऊर दें।

संतुलित खुराक की पूर्ति कैसे करें:

  • अपने खेत की मिट्टी जाँच करावें - फसलों को संतुलित खुराक देने के लिए सर्वप्रथम मिट्टी की जांच आवश्यक है। क्योंकि फसल को कितनी मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता है तथा भूमि में इन पोषक तत्वों की  कितनी उपलब्धता है।
  • खुराक की पूर्ति सभी उपलब्ध संसाधनों में समन्वय द्वारा करें। किसी एक पोषक तत्व की  पूरी मात्रा की पूर्ति केवल एक रसायन द्वारा नहीं करनी है। इसलिए जमीन की पैदावार क्षमता को बढ़ाना हो तो फसल की खुराक की पूर्ति के लिए हमें उपलब्ध कार्बनिक-अकार्बनिक तथा जैव संसाधनों को तर्क संगत तरीके से उपयोग में लाना है।

 संतुलित पोषक तत्व प्रबन्धन के लिए इन खादों का प्रयोग करें

जैविक खादों का प्रयोग - जैविक खादों का उपयोग करने से मृदा संरचना में सुधार होता है तथा मिट्टी में वायु संचार बढऩे से लाभकारी जीवों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। जो जमीन की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने में मदद करते है जिससे फसलों को सभी पोषक तत्वों की संतुलित मात्रा मिल जाती है।

हरी खाद - हरी खाद के रूप में ढैंचा, सनई, ग्वार आदि फसलों को हरी अवस्था में काटकर खेत में दबा देते है और पानी भर कर सडऩे देते हैं।

गोबर खाद व कम्पोस्ट खाद:

सुपर कम्पोस्ट- इस खाद को बनाने के लिये निश्चित माप का 12 x 5 x 3 फीट का  गड्डा तैयार करके फसल अवशेष, घास फूस व गोबर की खाद अच्छी तरह मिलाकर भर दें। प्रति गड्डा 2 कट्टे सिंगल सुपर फॉस्फेट डालें तथा नमी बनाये रखने के लिए समय-समय पर पानी का छिड़काव करें।

नाडेप कम्पोस्ट - इस विधि में जमीन के ऊपर ईटों का टाँका बनाया जाता है। टाँके के अन्दर हवा का आवागमन बनाये रखने के लिये दीवार में ईटों के बीच जगह-जगह छेद छोड़े जाते हैं।

वर्मी कम्पोस्ट - केचुओं से तैयार खाद वर्मी कम्पोस्ट कहलाती हैं। केंचुए की ईपीगीज प्रजाति जो जीवांश पदार्थ को खाकर अच्छी कम्पोस्ट खाद बनाती हैं।

खलियाँ - तेल वाली फसलों से तेल निकालने के बाद खलियों का इस्तेमाल खाद के रूप में किया जा सकता हैं। जैसे - नीम की खली, अरण्डी की खली, मूंगफली की खली, करंज व रतनजोत की खली।

जीवाणु खाद: रसायनिक उर्वरकों पर होने वाले व्यय को कुछ सीमा तक जैव उर्वरकों का उपयेाग कर कम किया जा सकता है।

राइजोबियम कल्चर - दलहनी फसलों के बीजों को राइजोबियम कल्चर से उपचारित करते है।

एजोटोबेक्टर- एजोटोबेक्टर कल्चर अनाज वाली फसलों- गेंहू , बाजरा में काम में लेते है।

फास्फेट विलेयक जैव उर्वरक (पी.एस.बी. कल्चर) - यह जीवाणु मृदा में मौजूद अघुलनशील फास्फेट को घुलनशील अवस्था में बदलकर पौधों को उपलब्ध करा देते हैं।

जिप्सम:- यह कैल्शियम सल्फेट है जिसमें 23 प्रतिशत कैल्शियम 18 प्रतिशत सल्फाइड तथा 20 प्रतिशत भारानुसार जल होता है। तेल वाली फसलों में जिप्सम की मात्रा 250 किलो प्रति हेक्टेयर वर्षा से पूर्व या जून माह में खेत में फैलाकर 10 से 15 सेमी गहराई तक जुताई द्वारा मिट्टी में मिला देवें। जिप्सम डालने के बाद पहली बरसात के बाद ढेंचा की फसल लें एवं 40-45 दिनों बाद फूल आने से पूर्व हेरो चलाकर मिट्टी में मिला दें तथा सड़ गल जाने दें। क्षारीय भूमि में ही जिप्सम डालें। 

 

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