प्याज की उन्नत खेती

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जलवायु : प्याज ठण्डे मौसम की फसल है। इसे सम जलवायु में अच्छी तरह से उगाया जा सकता है। प्याज की फसल के लिए बल्ब बनने के पूर्व 12.80 - 210 सेन्टीग्रेड एवं बल्ब के विकास हेतु 15.50 - 250 सेन्टीग्रेड तापक्रम उपयुक्त रहता है। प्रारम्भिक अवस्था में कम तापक्रम बोल्टिंग को बढ़ावा देता है एवं तापक्रम में अचानक बढ़ोत्तरी से शीघ्र परिपक्वता आती है, जिससे बल्ब का आकार छोटा रह जाता है ।

मृदा: प्याज सभी प्रकार की मृदाओं में उगायी जा सकती है, लेकिन कन्दीय फसल होने के कारण भुरभुरी तथा उत्तम जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है ।

भूमि की तैयारी: प्याज की रोपाई के पूर्व दो-तीन बखर चलाकर खेत को अच्छी तरह तैयार कर लेना चाहिए। तदुपरांत पाटा चलाकर खेत को समतल कर लें।

एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन : खाद एवं उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करें। सामान्यत: गोबर की खाद 200-250 क्विंटल, नत्रजन 100 किलोग्राम, स्फुर 80 किलोग्राम एवं पोटाश 60 किलोग्राम प्रति हेक्टर  की दर से दें ।  गोबर की खाद,  स्फुर, पोटाश तथा नत्रजन की आधी मात्रा पौध रोपण के पूर्व  भूमि की तैयारी के समय मृदा में मिलाएं तथा शेष  नत्रजन की मात्रा को दो बराबर भागों में बांटकर रोपाई के 30 से 45 दिन बाद देना चाहिए ।

पौध तैयार करना: एक हेक्टेयर में रोपाई के लिए 10 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है । पौध तैयार करने के लिए 331 मीटर आकार की 15 - 20 सेमी जमीन से ऊंची क्यारियां बनाएं। बीज को 4- 5 सेमी की दूरी पर कतारों में 0.5-1 सेमी की गहराई पर बोयें।  बीज को बोने के पूर्व बाविस्टीन 1 ग्राम प्रति किलो या ट्रायकोडर्मा विरडी 4 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। बीज की बुवाई के बाद क्यारियों की सूखी घास  अथवा पत्तों  से ढंक दें। क्यारियों में आवश्यक नमी बनाए  रखने के लिए नियमित रूप से सिंचाई करें । बीज के अंकुरण होते ही पत्तों को  हटा दें। पौध रोपाई के लिए 45 से 50 दिनों में तैयार हो जाती है। एक हेक्टेयर  में रोपाई के लिए पौध तैयार करने हेतु 500 वर्ग मीटर स्थान की आवश्यकता होती है ।

बल्ब वर्गीय सब्जियों में प्याज का प्रमुख स्थान है। प्याज का उपयोग सब्जी, मसाले, सलाद तथा आचार तैयार करने के लिए किया जाता है। भारत में महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडू, हरियाणा एवं उत्तरप्रदेश प्याज उत्पादन में अग्रणी राज्य है। भारत में 1320.44 हजार  हेक्टेयर में प्याज की खेती की जाती है, जिससे 20931.21 हजार मीट्रिक टन उत्पादन (2015-16) प्राप्त होता है। 
 

पौध रोपण एवं समय: पौध जब 10-15 सेमी ऊंचाई के हो जाए तब 15310 सेमी कतार से कतार एवं पौधे से पौध्ेा की दूरी पर रोपण करें। पौध रोपण के तुरंत बाद सिंचाई करें। रोपाई का उपयुक्त समय खरीफ में जुलाई से अगस्त एवं रबी में दिसम्बर से जनवरी रहता है।

निंदाई - गुड़ाई : प्याज एक उथली जड़ वाली फसल है।  अत: प्याज  के खेत में उथली निंदाई-गुड़ाई  करें।  प्याज में खरपतवार नियंत्रण  के लिए खरपतवारनाशियों का भी छिड़काव करें। रोपण के तुरंत बाद स्टाम्प (पेन्डीमिथालीन 30 ईसी) की 3.3 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़कें।

सिंचाई जल प्रबंधन: सिंचाई की संख्या भूमि का प्रकार और जलवायु के ऊपर निर्भर करती है। प्याज एक उथली जड़ वाली फसल है। इसकी जडं़े भूमि की सतह से 8 सेमी की गहराई तक जाती है। प्याज  में आवश्यकतानुसार प्रति सप्ताह हल्की सिंचाई करें। रबी फसल में 8-10 सिंचाई की आवश्यकता होती है। अधिक नमी में पर्पल ब्लॉच की संभावना बढ़ जाती है। खुदाई के 10 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर दें।

खुदाई : जब पत्तियों का ऊपरी भाग सूखने लगे तो उसे भूमि में गिरा दें। जिससे प्याज के कंद अच्छी तरह से पक सकें। कंद की खुदाई सावधानीपूर्वक अथवा कुदाली से करें।  खुदाई करते समय कन्द में चोट या खरोंच नहीं लगे।

उपज : प्याज की उन्नत किस्मों से औसतन 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर। उपज प्राप्त की जा सकती है।

भण्डारण : प्याज का भण्डारण एक महत्वपूर्ण कार्य है। खुदाई करने के बाद कंदों को धूप में 7-10 दिन सुखाने के उपरांत हवादार कमरों में फैलाकर रखें। भण्डारण के पूर्व कटे-फटे व रोगी कन्दों को अलग कर दें। 

उन्नत किस्में:  

एग्रीफाउण्ड डार्क रेड -  इस किस्म के कंद गोल,  गहरे लाल, 4 - 6 सेमी व्यास के होते हैं। यह किस्म फसल रोपाई के 95-110 दिन में पककर तैयार हो जाती है। यह किस्म खरीफ  के लिए उपयुक्त होती है। इस किस्म की औसत उपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टर होती है ।

एग्रीफाउण्ड लाइट रेड - इस किस्म के कंद गोल,  हल्के लाल 4-6 सेमी व्यास के होते हैं। यह किस्म रबी के लिए अनुश्ंासित की जाती है।  फसल रोपाई के 120-125 दिन में पककर तेैयार हो जाती है। इस किस्म की औसत उपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टर है ।

एनएचआरडीएफ  (रेड) - यह किस्म वर्ष 2006 में विमोचित की गई है। इस किस्म की भारत के उत्तरी, केन्द्रीय एवं पश्चिमी भागों में रबी मौसम में उगाने के लिए अनुशंसा की गई है। इस किस्म के बल्ब आकर्षक लाल रंग के ग्लोबाकार, गोल, 5-6 सेमी व्यास के होते हैं। एक बल्ब का औसतन वजन 100-120 ग्राम होता है। इसमें कुल घुलनशील ठोस 13-14 प्रतिशत पाया जाता है। पौधों की पत्तियां गहरे हरे रंग की होती हैं। यह किस्म प्रमुख बीमारियों के प्रति मध्यम अवरोधिता रखती है। रोपाई के 115-120 दिनों में फसल पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसत उपज 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

भीमा सुपर: इस किस्म के कंद ठोस, गोल, सकेन्द्रक, मध्यम लाल रंग के होते हैं। खरीफ में यह किस्म रोपाई के 108 दिन बाद एवं पिछेती खरीफ में 115-120 दिन बाद फसल पककर तैयार हो जाती है। पिछेती फसल को 4 माह तक भंडारित किया जा सकता है। यह किस्म खरीफ एवं पिछेती खरीफ मौसम में महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं गुजरात में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसमें कुल घुलनशील ठोस 10-11 प्रतिशत पाया जाता है। इस किस्म की औसत उपज खरीफ में 260-280 क्विंटल/हेक्टेयर एवं पिछेती खरीफ में 400-450 क्विंटल/हेक्टेयर है।

भीमा रेड: इस किस्म के कंद आर्कषक लाल रंग के गोल होते हैं। कुल घुलनशील ठोस 10-11 प्रतिशत पाया जाता है। यह किस्म रोपाई के 115-120 दिनों बाद पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म को महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं गुजरात में उगाने के लिए अनुशंसित किया गया है। यह किस्म खरीफ एवं पिछेती खरीफ मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त है। इस किस्म से औसतन महाराष्ट्र की दशाओं में खरीफ में 270 क्विंटल, पिछेती खरीफ में 520 क्विंटल एवं रबी में 310 क्विंटल उपज प्राप्त हो जाती है।

भीमा राज: इस किस्म के कंद दीर्घवृत्ताकार, संकेन्द्रक, पतली गर्दन वाले गहरे लाल रंग के होते हैं। कुल घुलनशील ठोस 10-11 प्रतिशत पाया जाता है। इस किस्म को रबी मौसम में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा एवं दिल्ली में उगाने के लिए अनुशंसित किया गया है। यह किस्म खरीफ एवं पछेती खरीफ मौसम में महाराष्ट्र, कर्नाटक, एवं गुजरात में राज्य में उगाने के लिए भी उपयुक्त है। यह किस्म रोपाई के 120-125 दिन बाद पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म की औसत उपज 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है पिछेती खरीफ मौसम में अधिकतम 400-450 क्विंटल/हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है।

भीमा किरन: इस किस्म के कंद मध्यम लाल रंग के, दीर्घवृत्ताकार से गोल आकार के होते हैं। बोल्टर्स 5 प्रतिशत से कम निकलते हैं। गर्दन पतली एवं कुल घुलनशील ठोस 12 प्रतिशत पाया जाता है। इस किस्म की भण्डारण क्षमता अच्छी होती है एवं 5-6 माह तक भण्डारित किया जा सकता है। रोपाई के 130 दिनों बाद पककर तैयार हो जाती है। इस किस्म को दिल्ली, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आन्ध्रप्रदेश में रबी मौसम में उगाने के लिए अनुशंसित किया गया है। इस किस्म की औसत उपज क्षमता 415 क्विंटल/हे. है। 

भीमा शक्ति: इस किस्म के कंद आर्कषक लाल रंग के गोल होते हैं। कुल घुलनशील ठोस 11.8 प्रतिशत होता है। रोपाई के 130 दिन बाद फसल पककर तैयार हो जाती है। यह किस्म वर्ष 2010 में खरीफ एवं रबी मौसम में उगाने के लिए विमोचित की गई है। इस किस्म से महाराष्ट्र में खरीफ में 459 क्विंटल/हेक्टेयर एवं रबी में 427 क्ंिवटल/हेक्टेयर प्राप्त की गई है। यह किस्म थ्रिप्स के प्रति सहनशील है।

भीमा श्वेेता: यह किस्म वर्ष 2010 में महराष्ट्र में रबी मौसम में उगाने के लिए विमोचित की गई है। साथ ही यह मध्यप्रदेश, दिल्ली, पंजाब, उत्तरांचल, हरियाणा एवं गुजरात में रबी मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त है। इस किस्म के कंद गोल आर्कषक सफेद रंग के होते हैं। कुल घुलनशील ठोस 11.5 प्रतिशत पाया जाता है। यह किस्म रोपाई में 110-115 दिनों बाद पककर तैयार हो जाती है। भण्डारण क्षमता मध्यम होती है। यह किस्म थ्रिप्स में प्रति सहनशील है। इस किस्म की औसत उपज 282 क्विंटल/हेक्टेयर है। 

भीमा शुभ्रा: यह किस्म वर्ष 2010 में महाराष्ट्र क्षेत्र के लिए खरीफ एवं पिछेती खरीफ में उगाने के लिए विमोचित की गई है। इस किस्म के कंद दीर्घवृत्ताकार से गोल आकार के आकर्षक सफेद रंग के होते हैं। कुल घुलनशील ठोस खरीफ मौसम में 10.4 प्रतिशत एवं पिछेती खरीफ मौसम में 11.7 प्रतिशत पाया जाता है। यह किस्म खरीफ में रोपाई के 112 दिनों बाद एवं पिछेती खरीफ में 125 दिनों बाद पककर तैयार हो जाती है। पिछेती खरीफ प्याज को 2-3 माह तक भण्डारित किया जा सकता है। इस किस्म की औसत उपज खरीफ में 241 क्विंटल/हेक्टेयर एवं पिछेती खरीफ में 389 क्विंटल/हेक्टेयर है। यह किस्म मौसमी परिवर्तन के प्रति सहनशील होने के कारण तीनों मौसमों में उगाई जा सकती है।

 

  • एस. के. त्यागी

suniltyagikvk75@gmail.com

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