मालवी गेहूं की नई किस्में

मध्य भारत का मालवांचल अपने परम्परागत मालवी/कठिया (ड्यूरम) या सूजी वाले गेहूं के लिये सदियों से प्रसिद्व है। मध्य भारत में गेहूं पकने के समय वायुमंडलीय आद्र्रता कम होने से, यहां पर विश्व स्तर के गुणों वाला, धब्बों रहित, चमकदार मालवी गेहूं प्रचुर मात्रा में पैदा किया जा रहा है। इसे व्यावसायिक रूप में अपनाकर, मालवी गेहूं को इस क्षेत्र में बढ़ावा देना वैज्ञानिक तथा व्यापारिक आवश्यकता है। विगत कुछ दशकों से यह गेहूं इस प्रदेश से लुप्तप्राय: हो गया था, और आधुनिक पीढ़ी इसकी विशिष्टता एवं स्वाद को भूल गई है। मध्य भारत के अन्तर्गत मध्यप्रदेश का मालवांचल, गुजरात का सौराष्ट्र और काठियावाड़़, दक्षिणी राजस्थान का कोटा, बंूदी, झालावाड़ तथा उदयपुर क्षेत्र, उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड और पश्चिमी महाराष्ट्र में अच्छे गुणों वाला मालवी गेहूं उगाया जाता है। इन क्षेत्रों में उगाया गया मालवी गेहूं औद्योगिक उपयोग हेतु भी उत्तम होता है। मालवी गेहूं से बनी सिमोलिना (सूजी/रवा) से शीघ्र पकने वाले व्यंजन (फास्ट फूड) जैसे पिज्जा, मैकरोनी, स्पेघेटी, सेवैइयां, नूडल, वर्मीसेली इत्यादि बनाये जाते हैं।

मालवांचल में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के गेहूं अनुसंधान केन्द्र, इन्दौर द्वारा विकसित मालवी गेहूं की नवीनतम किस्में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय गेहूं अनुसंधान केंद्र, इन्दौर द्वारा भिन्न-भिन्न सिंचाई उपलब्धता के लिये मालवी गेहूं की अनेक नई प्रजातियां विकसित की गई हैं। ये सभी प्रजातियां गेरूआ प्रतिरोधी, उच्च जल उपयोग दक्षता, सूखा प्रतिरोधी तथा उच्च गुणवत्ता (लौह तत्व, जस्ता, तांबा, विटामिन ए तथा प्रोटीन) युक्त हैं। सिंचाई जल उपलब्धता के आधार पर सभी कृषक उचित प्रजाति चुनकर अपने खेतों में मालवी गेहूं की भरपूर उपज प्राप्त कर सकते हैं। मालवी गेहूं की खेती के अनेक लाभ हैं, जैसे: 

कम सिंचाई: इसके उत्पादन में सिंचाई की कम आवश्यकता होती है। अधिक उत्पादन क्षमता। 

पोषण से सुरक्षा: शरबती गेहूं की अपेक्षा मालवी गेहूं में औसत प्रोटीन 1.5- 2.0 प्रतिशत अधिक है। साथ ही मालवी गेहूं में विटामिन- (बीटा केरोटिन) होता है, जो व्यंजन बनाने पर भी नष्ट नहीं होता। इनमें तांबा, जस्ता तथा लौह तत्व जैसे खनिज तत्व भी होते हैं। 

गेरूआ महामारी से बचाव: मध्य भारत में बुवाई जल्दी होने तथा तापक्रम अनुकूल होने से भूरे गेरूआ का संक्रमण जल्दी होने की संभावना होती है। वर्तमान मालवी किस्मों में भूरे गेरूआ के प्रति अत्यधिक रोधक से क्षमता है। अत: मध्य भारत में इन किस्मों की खेती द्वारा पूरे देश की गेहूं की खेती को भूरे गेरूवे की महामारी से बचाया जा सकता है।

रोजगार को बढ़ावा: मालवी गेहूं त्वरित भोजन ( फास्ट  फूड ) जैसे सेवैइयां, नूडल, बाटी, बाफले, वर्मीसेली, हलवा, सूजी, दलिया, मैकरोनी इत्यादि व्यंजनों के लिये अधिक उपयुक्त है। इनकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए,नये फास्टफूड उद्योगों की स्थापना से रोजगार के नये अवसर प्राप्त होंगे। अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धा अधिक होने से इसका निर्यात कठिन है। मालवी गेहूं में यह स्पर्धा कम है, तथा इसका अन्तर्राष्ट्रीय मूल्य भी प्राय: अधिक रहता है, अत: यूरोप, उत्तरी अफ्रीका तथा पश्चिमी एशियाई देशों को इसका निर्यात कर किसान विदेशी मुद्रा अॢजत कर सकते हैं। मध्य भारत समुद्र तट के समीप होने से तथा उगाये गये मालवी गेहूं के करनाल बंट से मुक्त होनेे के कारण इसे आसानी से निर्यात किया जा सकता हैं।

मालवी गेहूँ की नवीन अनुमोदित प्रजातियाँ:

अगेती 15 से 30 अक्टूबर वर्षा आघारित  एच.आई.8627 (मालवकीर्ति) एच.आई.8777 (पूसा गेहूँ 8777), 20 से 25 उपज, 20 अक्टूबर से 10 नवंबर 2 से 3 सिंचाई एच. आई. 8627 (मालवकीर्ति) ,एच.आई.8777 (पूसा गेहूँ 8777) , 30 से 40 उपज, समय से 10 से 25 नवंबर, 4 से 5 सिंचाई, एच.आई. 8498 (मालवशक्ति), एम.पी.ओ 1106 (सुधा), एच.आई. 8663 (पूसा पोषण), एम.पी.ओ. 1215, एच.आई. 8713 (पूसा मंगल), एच.आई. 8737 (पूसा अनमोल), एच.डी. 4728 (पूसा मालवी), एच.आई. 8759 (पूसा तेजस), 50 से 60, मालवकीर्ति (एच.आई. 8627) दो से तीन सिंचाई में पकने वाली, मध्यम ऊँचाई की मालवी गेहूँ की नई प्रजाति है। यह प्रजाति दलिया तथा सूजी के लिये अति उत्तम है तथा इससे अच्छी रोटी भी बनाई जा सकती है। कृषक इसे पूर्ण सिंचित (3 से 4 सिंचाई) अवस्था में भी लगा सकते हैं। 2 से 3 सिंचाई में इसकी उपज क्षमता 30 से 40 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है।

एच. आई.8777 (पूसा गेहूँ 8777): दो से तीन सिंचाई में पकने वाली, मध्यम ऊँचाई की मालवी गेहूँ की नई प्रजाति है। यह प्रजाति दलिया तथा सूजी के लिये अति उत्तम है। 2 से 3 सिंचाई में इसकी उपज क्षमता 30-35 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है।

मालवशक्ति (एच.आई. 8498): तीन से चार सिंचाई में पकने वाली, बौने कद की अत्यंत लोकप्रिय मालवी गेहूँ की प्रजाति है। यह प्रजाति दलिया एवं सूजी के लिये अति उत्तम है। इसकी उपज क्षमता 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। 

पोषण (एच.आई. 8663): चार से पाँच सिंचाई में पकने वाली, बौने कद की श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली नवीन प्रजाति है। अधिक विटामिन 'ए' के कारण इसकी दलिया तथा सूजी आकर्षक सुनहरे रंग के बनते है। इस प्रजाति से अच्छी रोटी भी बनाई जा सकती है। इसकी उपज क्षमता 50 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

3 एच.आई. 8713 (पूसा मंगल): तीन से चार सिंचाई में पकने वाली, बौने कद की लोकप्रिय मालवी गेहूँ की प्रजाति है। यह प्रजाति उच्च गुणवत्ता, विटामिन 'ए' सूजी, दलिया एवं पास्ता के लिये उत्तम है। इसकी उपज क्षमता 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

एच.आई. 8737 (पूसा अनमोल): तीन से चार सिंचाई में पकने वाली, बौने कद की नवीन मालवी गेहूँ की प्रजाति है। यह प्रजाति उच्च गुणवत्ता, सूजी तथा दलिया के लिये अति उत्तम है। इसकी उपज क्षमता 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

एच.डी. 4728 (पूसा मालवी): तीन से चार सिंचाई में पकने वाली, बौने कद की नवीन मालवी गेहूँ की प्रजाति है। यह प्रजाति उच्च गुणवत्ता, सूजी तथा दलिया के लिये अति उत्तम है। इसकी उपज क्षमता 50 से 55 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है।

एच.आई. 8759 (पूसा तेजस): तीन से चार सिंचाई में पकने वाली, बौने कद की मालवी गेहूँ की नवीन प्रजाति है। यह प्रजाति उच्च गुणवत्ता, सूजी तथा दलिया के लिये अति उत्तम है। इसकी उपज क्षमता 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

  • अनिल कुमार सिंह
  • अब्दुल वसीम  
  • राहुल फुके
  • दिव्या अंबटी
  • प्रकाश टी. एल.
  • एस.व्ही. साईप्रसाद, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र, इन्दौर
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