सहकारी-साख की मौत से ही बीमार है खेती

दानी पत्रकार और चुनावी गणित के पंडित शायद मुझसे सहमत हों,कि जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावों के परिणाम गन्ने के दामों से तय होते हैं,वैसे ही मध्य प्रदेश के एक बड़े ग्रामीण इलाक़े में ये सोयाबीन के दामों से भी तय होते हैं. इन दिनों जितनी तीव्रता से चुनाव प्रचार चल रहा है, उतनी ही तेजी से प्रदेश की सभी बड़ी मंडियों में सोयाबीन भी बिकने आ रहा है.जगह-जगह उचित दामों की मारा-मारी तो है ही, किसानों को समय पर नकद पैसा नहीं मिल पा रहा है |

उज्जैन मंडी में गत सप्ताह एक किसान ने अपना 36 .1  क्विंटल सोयाबीन 3237 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बेचा था, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य 3400 रुपये प्रति क्विंटल है. उसको कुल पैसा एक लाख सोलह हजार आठ सौ छप्पन रुपये मिलना था. किन्तु,नए नियमानुसार उसे हाथ में दस हजार रुपये ही मिले. उसने घर लौटते वक्त चार हजार रुपये का डीजल अपने ट्रैक्टर में भरा लिया. मंडी में हम्माली, तुलाई और अपने खाने के पैसे देकर, उसके पास जो भी रकम बची, उससे न तो वह खाद, बीज, दवाई या दीगर जरूरी चीज खरीद सकता है,जो उसे शहर से ले जाना है,और न इलाज, समाज और रिवाज के लिए कुछ कर सकता. इसके लिए उसे दस दिनों बाद ही फिर आना पड़ेगा,जब उसे अपने बैंक से नकद रूपया मिलेगा. अभी खाली जा रही ट्राली,और फिर आने जाने का डीजल उसके माथे ही होंगे. तब तक खेती-बाड़ी की कई चीजें इंतजार नहीं कर सकती |

मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात या राजस्थान,कहीं भी चले जाइये, हालात सब जगह एक जैसे हैं. भारत सरकार के कृषि मंत्रालय की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह के कष्ट से 26 करोड़ किसान प्रभावित हुए हैं, और नेशनल सीड कॉर्पोरेशन का 1 .38 लाख क्विंटल गेहूं का बीज नहीं बिक पाया है |

मेरी बात में कृपया राजनीति न सूंघें. मैं तो सिर्फ यह कह रहा हूँ कि राजनैतिक नेतृत्व तो अब कमान में बाद में आएगा, वह तो काफी पहले से ही चुनावी मोड में आ चुका था,लेकिन तब स्थाई सरकार या प्रशासनिक नेतृत्व क्या कर रहा है ?

सबको मालूम था कि चुनाव नवम्बर में आएंगे ही, और सोयाबीन या खरीफ की फसलें भी मंडी में इन्हीं दिनों बिकने आएँगी,फिर अभी चल रहे किसानों के संकट पर पहले से क्यों नहीं सोचा गया? 

चूँकि अपना देश शहरी और ग्रामीण जैसी दो अलग-अलग चौखटों में बंधा है, इसलिए आधे देश को न तो इसकी खबर है,और न चिंता. टीवी, रेडियो, अखबारों और आम सभाओं में हम किसान हित की कितनी ही बातें कर लें, या सुन लें,पर हकीकत बहुत अलग हैं. बात मानिये,अपना ग्रामीण समाज एक बड़े दुष्चक्र में फंसा है |

ग्रामीण गरीबी का एक  बड़ा कारण है ग्रामीण स्तर पर काम कर रहे सहकारी साख (क्रेडिट) के तंत्र को धीमे-धीमे मौत की तरफ धकेला जाना. यह वह तंत्र था,जिसका नेतृत्व कभी किसानों के अपने चुने हुए लोग करते थे. किसी भी निर्णय के पहले उनका क्रेडिट असेसमेंट अपनी आँखों देखा होता था | 

  • प्रशासनिक नेतृत्व पर प्रश्नचिन्ह
  • साख समितियों की भूमिका घटी 
  • फर्जी आंकड़ों की फसल 
  • बैंकें बनी नेताओं की जागीर 
  • गुम हुई सहकारिता की भावना

साख समितियों की भूमिका नगण्य

आज से दस साल पहले कृषि उत्पादन में ग्रामीण साख समितियों या सहकारी बैंकों की भूमिका 70 से 75 प्रतिशत होती थी, जो अब घटकर 40 प्रतिशत रह गई है |

कुछ भी कर लीजिये, निजी साहूकार समाज के अंग के रूप में स्थाई हो गए हैं, राष्ट्रीयकृत, व्यापारिक,ग्रामीण और निजी बैंकें भी ग्रामीण साख में रच-बस गई हैं. उनसे किसी से भी प्रतियोगिता की शक्ति सहकारी बैंकों में अब नहीं बची,क्योंकि उन पर इतने सरकारी बंधन टंगे हैं कि वे आगे बढऩे के बजाय अब पीछे ही जा रहे हैं |

बिन सहकार नहीं उद्धार 

किसानों की बेहतरी के लिए इस मूलमंत्र के साथ प्रारंभ हुआ सहकारी आंदोलन मृत्युशैया पर है। सत्ता के साकेत में प्रवेश के लिए यह एक 'स्टेपिंग स्टोन' जरूर है। डूबती सहकारी बैंक, घाटे में चलते फेडरेशन और अंधविश्वास क्यों किसानों का सहारा छोड़ नासूर बनती जा रही है, ऐसे अनेक प्रश्रों का विश्लेषण सहकारी क्षेत्र को करीब से देखने वाले श्री कमलेश पारे ने विशेष रूप से कृषक जगत के पाठकों के लिए किया है।

निजी,सार्वजनिक या ग्रामीण बैंकों की निगाहें अपने खुद के लाभ की तरफ होती हैं, इसलिए वे ऋण भी उसी दृष्टि से बड़े किसानों को ही देती हैं. वे ग्राहक में शक्ति और संभावनाएं देखती हैं,जो गरीब किसान में होती ही नहीं है. लाभ के इस माहौल में खेती के लिए क्षेत्रवार साख की जरूरत और आकलन का तो आजकल सवाल ही नहीं उठता. इसीलिए कहीं बहुत ही अपर्याप्त पैसा है,तो कहीं जरूरत से ज्यादा है |

चूँकि साख की जरुरत का आकलन अफसर करते हैं, इसलिए उन्हें तो यही मालूम है कि गाँवों में सिर्फ खेती ही होती है. शेष ग्राम-समाज और आजीविका के साधन उन्हें दिखते ही नहीं हैं. इससे सारा पैसा खेती के लिए जाता है, और उसकी अनिश्चितता में कभी कभी डूब जाता है. इसका अंतिम विपरीत प्रभाव किसान और किसानी को भुगतना पड़ता है |

फर्जी आंकड़ों की फसल

इस सारे रोग की शुरुवात होती है फसल के हर स्तर पर बनाये जा रहे फर्जी आंकड़ों से. फिर बात आती है सहकारी बैंकों के असंवेदनशील संचालन की. आज की स्थिति में शायद ही किसी बैंक के शीर्ष पर जनता का चुना हुआ नेता बैठा हो. व्यक्ति विशेष या दल विशेष की मेहरबानी से बैठा नामांकित व्यक्ति तो राजनैतिक लाभ का औजार ही हो सकता है,जनता के प्रति जवाबदार तो कतई नहीं हो सकता. मनमर्जी के इसी खेल में इन बैंकों के संचालन का कर्मचारी-अधिकारी संवर्ग (कैडर)भी खत्म किया गया और चल पड़ा सूबेदारी का खेल. संवर्ग के लोग एक केंद्रीय अनुशासन में रहते थे व अपने बैंकों को भी रखते थे. अब तो जिला सहकारी बैंकें स्थानीय क्षत्रपों की जागीर हैं.ये क्षत्रप भी नीचे से चुनकर नहीं आये हैं,बल्कि ऊपर से टपके हैं. इसी सूबेदारी और जागीरी का परिणाम था कि नवम्बर 2016 की नोटबंदी में देश भर की 370 जिला सहकारी बैंकों ने 22 270 करोड़ रुपये के नोट बदले थे.बाद में इस नोटबदली पर शंका की उँगलियाँ खूब उठी थीं, परिणामस्वरूप बाद में जल्दी ही इसे बंद भी करना पड़ा था |

सहकारिता की मूल भावना गुम

ग्रामीण-साख विषय के सर्वाधिक अनुभवी लोगों में  शुमार श्री जे.पी श्रीवास्तव, अपनी उम्र के उत्तरार्ध में, इस बदलते दृश्य से बहुत निराश हैं.उनका कहना है कि सहकारी बैंकों के अप्रजातांत्रिक संचालन और सहकारिता विभाग के अधिकारियों द्वारा बैंकों और समितियों के जबरिया अधिग्रहण ने ग्रामीण साख तंत्र को बहुत अधिक अविश्वसनीय बनाया है |

क्या अपन किसी माई के लाल से यह नहीं कह सकते कि प्रदेश और गांव-गाँव में फैली सहकारिता को उसका मूल चरित्र लौटा दीजिये. जमीनी नेतृत्व को आने तो दें.जैसे आप जमीन से उठकर शीर्ष पर पहुंचे हैं,वैसे ही दूसरे भी शायद आ सकें |

इससे समस्याएं खत्म होंगी या नहीं,नहीं मालूम,लेकिन आपसी विश्वास तो लौट आएगा,जो प्रगति में,शायद मददगार हो.और हाँ,शहरी साख तंत्र की भी कोई बड़ी अच्छी स्थिति नहीं है.बहुत ऊँचे आसमान में उड़ रहे गिद्धों,जो नीचे से सुन्दर लगते हैं, के कब्जे में शहरी सहकारी बैंकें हैं |

  • कमलेश पारे 
  • मो.: 9425609231
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