गेहूँ की उन्नत खेती

उपयुक्त जलवायु - गेहूँ मुख्यत: एक ठण्डी एवं शुष्क जलवायु की फसल है अत: फसल बोने के समय 20 से 22 डि.से., बढ़वार के समय 25 डि. से. तथा पकने के समय 14 से 15 डि. से. तापक्रम उत्तम रहता है। तापमान से अधिक होने पर फसल जल्दी पक जाती है और उपज घट जाती है। गेहूँ की खेती हेतु 60-100 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त है।

भूमि - गेहूँ की खेती सभी प्रकार की कृषि योग्य भूमि में की जा सकती है परन्तु उपयुक्त जल निकास वाली दोमट से भारी दोमट, जलोढ़ भूमि उत्तम रहती है जिसका पीएच मान 5-7.5 के मध्य हो।

खेत की तैयारी - अच्छे अंकुरण हेतु मिट्टी भुरभुरी तथा नमीयुक्त होनी चाहिये। खरीफ की फसल काटने के बाद खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल (एमबी प्लॉऊ) से करें जिससे खरीफ फसल के अवशेष और खरपतवार मिट्टी में दबकर सड़ जायें। इसके बाद आवश्यकतानुसार 2-3 जुताइयाँ देशी हल या कल्टीवेटर से करें। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा देकर खेत समतल करें।

उन्नत किस्में - 

अरपा- यह किस्म देर से बोने के लिए के लिए उपयुक्त है तथा यह अधिक तापमान, गेरूआ रोग व कटुआ कीट रोधक है, उपज 23-24 क्विंटल प्रति हेक्टर।

रतन- यह किस्म सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ के लिए उपयुक्त है। यह किस्म 112 दिन में पकती है। उपज 19 क्विंटल प्रति हेक्टर।

मुक्ता- यह भूरा गेरूआ निरोधक तथा असिंचित अवस्था के लिये उपयुक्त है। यह 130 दिन में पकती है। इसकी पैदावार 13 -15 क्विंटल प्रति हेक्टर होती है। 

नर्मदा- यह काला और भूरा गेरूआ निरोधक है। यह चपाती बनाने के लिये विशेष उपयुक्त है। उपज 12-19 क्विंटल प्रति हेक्टर। 

सुजाता- यह किस्म काला और भूरा गेरूआ सहनशील है। असिंचित अवस्था के लिए उपयुक्त है। यह 130 दिन में पकती है। उपज 13-17 क्विंटल प्रति हेक्टर। 

सोनालिका- यह गेरूआ निरोधक है तथा यह किस्म110 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। देर से बोने के लिए उपयुक्त है। इसकी पैदावार 30 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टर है।

कल्याण सोना- यह किस्म 125 दिन में पक जाती है तथा उपज 30 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टर तक होती है।

डब्ल्यू.एच. 147- यह किस्म काला और भूरा गेरूआ निरोधक है। सिंचित अवस्था के लिये उपयुक्त है। पकाव अवधि 125 दिन तथा उपज 40 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टर।

एच.डी. 4530- इस किस्म की पैदावार 35 क्विंटल/ हेक्टर होती है।

शेरा (एच.डी.1925)- देर से बोने के लिए यह उपयुक्त है। यह कम समय 110 दिन में पक जाती है। इसकी पैदावार लगभग 30 क्विंटल प्रति हेक्टर।

बीजोपचार- गेहूँ में रोगों की रोकथाम हेतु 4 ग्राम ट्राइकोडरमा तथा 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम को मिलाकर प्रति किग्रा बीज की दर से बीजोपचार करें।

बोआई का समय - गेहूँ रबी की फसल है जिसे शीतकालीन मौसम में उगाया जाता है तथा सामान्यतया गेहूं की बोआई अक्टूबर से दिसंबर तक की जाती है ।

बीज दर एवं पौध अंतरण - बीज दर भूमि में नमी की मात्रा, बोने की विधि तथा किस्म पर निर्भर करती है। समय पर बोये जाने वाले सिंचित गेहूं में बीज दर 100-125 किलो प्रति हेक्टर व कतारों की दूरी 20-22.5 सेमी रखें। देर वाली सिंचित गेहूं की बोआई के लिए बीज दर 125-150 किग्रा प्रति हेक्टर तथा पंक्तियों के मध्य 15 -18 सेमी का अन्तरण रखना उचित रहता है। 

गेहूँ की नवीन उन्नत किस्में 

जे.डब्लू1106- यह मध्यम अवधि (115 दिन) वाली किस्म है जिसकी औसत उपज 40-50 क्विंटल प्रति हेक्टर है।

अमृता- यह सरबती श्रेणी की नवीनतम सूखा निरोधक किस्म है। फसल पकने की अवधि 125-130 दिन तथा आदर्श परिस्थितियों में 30-35 क्विंटल प्रति हेक्टर उपज देती है।

स्वर्णा (एचआई-1479)- मप्र की उर्वरा भूमियों के लिए शीघ्र पकने वाली गेरूआ निरोधक किस्म है। फसल अवधि 110 दिन है। इस किस्म से 2-3 सिंचाइयों से अच्छी उपज ली जा सकती है। 

हर्षित (एचआई-1531)- यह सूखा, पाला अवरोधी मध्यम बोनी किस्म है। फसल अवधि 115 दिन है तथा 1-2 सिंचाई में 40 क्विंटल प्रति हेक्टर से अधिक उपज देती है।

मालव शक्ति (एचआई-8498)- यह कम ऊँचाई वाली (85 सेमी) बोनी कठिया (ड्यूरम) किस्म है। यह नम्बर-दिसम्बर तक बोने हेतु उपयुक्त किस्म है। इससे अच्छी उपज लेने के लिए 4-5 पानी आवश्यक है।

मालवश्री (एचआई-8381)- यह कठिया गेहूँ की श्रेणी में श्रेष्ठ किस्म है। उपज- 50-60 क्विंटल प्रति हेक्टर है।

राज 3077- गेहूँ की ऐसी नयी किस्म है, जिसमें अन्य प्रजातियों की अपेक्षा 12 प्रतिशत अधिक प्रोटीन पाया जाता है। इसे अम्लीय एवं क्षारीय दोनों प्रकार की मिट्टियों में बोया जा सकता है।

बीज बोने की गहराई - गेहूँ की बौनी किस्मों हेतु बीज की गहराई 3-5 सेमी तथा देशी (लम्बी) किस्मों में 5-7 सेमी रखें।

बोआई की विधियाँ - 

छिटकवाँ विधि - इस विधि में बीज को हाथ से समान रूप से खेत में छिटक दिया जाता है और पाटा अथवा देशी हल चलाकर बीज को मिट्टी से ढक दिया जाता है। इस विधि से गेहूँ उन स्थानों पर बोया जाता है, जहाँ अधिक वर्षा होने या मिट्टी भारी दोमट होने से नमी अपेक्षाकृत अधिक समय तक बनी रहती है। इस विधि से बोये गये गेहूँ का अंकुरण ठीक से नहीं हो पाता, पौध अव्यवस्थित ढंग से उगते हैं, बीज अधिक मात्रा में लगता है और पौध यत्र-तत्र उगने के कारण निराई-गुड़ाई में असुविधा होती है परन्तु अति सरल विधि होने के कारण कृषक इसे अधिक अपनाते है।

हल के पीछे कूड़ में बोआई - गेहूँ बोने की यह सबसे अधिक प्रचलित विधि है। हल के पीछे कूँड़ में बीज गिराकर दो विधियों से बुआई की जाती है -

(अ) हल के पीछे हाथ से बोआई (केरा विधि) - इस विधि मे देशी हल के पीछे बनी कूड़ों में जब एक व्यक्ति खाद और बीज मिलाकर हाथ से बोता चलता है तो इस विधि को केरा विधि कहते हैं। हल के घूमकर दूसरी बार आने पर पहले बने कूँड़ कुछ स्वंय ही ढंक जाते हैं। सम्पूर्ण खेत बो जाने के बाद पाटा चलाते हैं, जिससे बीज भी ढंक जाता है और खेत भी चोरस हो जाता है ।

(ब) देशी हल के पीछे नाई बाँधकर बोआई (पोरा विधि) - इसमें नाई, बांस या चैंगा हल के पीछे बंधा रहता है। एक ही आदमी हल चलाता है तथा दूसरा बीज डालने का कार्य करता है। इसमें उचित दूरी पर देशी हल द्वारा 5-8 सेमी. गहरे कूड़ में बीज पड़ता है। इस विधि में बीज समान गहराई पर पड़ते हैं जिससे उनका समुचित अंकुरण होता है। 

सीड ड्रिल द्वारा बोआई - इसमे बोआई बैल चलित या ट्रैक्टर चलित बीज यंत्र द्वारा की जाती है। इस मशीन में पौध अन्तरण व बीज दर का समायोजन इच्छानुसार किया जा सकता है। इस विधि से बीज भी कम लगता है और बोआई निश्चित दूरी तथा गहराई पर सम रूप से हो पाती है जिससे अंकुरण अच्छा होता है ।

डिबलर द्वारा बोआई - इस विधि में प्रत्येक बीज को भूमि में छेदकर निर्दिष्ट स्थान पर मनचाही गहराई पर 1-2 बीज प्रति छेद की दर से डालते हैं। इस विधि से बीज की मात्रा काफी कम (25-30 किग्रा. प्रति हेक्टर) लगती है परन्तु समय व श्रम अधिक लगने के कारण उत्पादन लागत बढ़ जाती है।

खाद एवं उर्वरक- अच्छी उपज लेने के लिए भूमि में कम से कम 35-40 क्विंटल गोबर की सड़ी हुई खाद,50 किलो ग्राम नीम की खली और 50 किलो अरंडी की खली को अच्छी तरह मिलाकर खेत में बुवाई से पहले समान मात्रा में खेत में अच्छी तरह बिखेर लें इसके बाद से जुताई कर बुवाई करें तथा बौनी किस्मों में 125 किलो नत्रजन, 50 किलो फास्फोरस व 40 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। देशी किस्मों में 60:30:30 किग्रा. प्रति हेक्टेयर के अनुपात में उर्वरक देना चाहिए।

सिंचाई -

  • पहली सिंचाई शीर्ष जड़ प्रवर्तन अवस्था पर अर्थात् बोने के 20 से 25 दिन पर सिंचाई करेें। लम्बी किस्मों में पहली सिंचाई सामान्यत: बोने के लगभग 30-35 दिन बाद की जाती है।
  • दूसरी सिंचाई दोजियां निकलने की अवस्था अर्थात् बोआई के लगभग 40-50 दिन बाद।
  • द्य तीसरी सिंचाई सुशांत अवस्था अर्थात् बुआई के लगभग 60-70 दिन बाद।
  • चौथी सिंचाई फूल आने की अवस्था अर्थात् बोआई के 80-90 दिन बाद।
  • पाँचवी सिंचाई दूध बनने तथा शिथिल अवस्था अर्थात् बोने के 100-120 दिन बाद करें। 

नोट - यदि केवल दो सिंचाई की ही सुविधा उपलब्ध है, तो पहली सिंचाई बोआई के 20-25 दिन बाद (शीर्ष जड़ प्रवर्तन अवस्था) तथा दूसरी सिंचाई फूल आने के समय बोने के 80-90 दिन बाद करें। यदि पानी तीन सिंचाई उपलब्ध हो तो पहली सिंचाई (बोआई के 20-22 दिन बाद), दूसरी तने में गाँठें बनने (बोने के 60-70 दिन बाद) व तीसरी दानों में दूध पडऩे के समय (100-120 दिन बाद) करें।

खरपतवार नियंत्रण - बोआई से 30-40 दिन तक का समय खरपतवार प्रतिस्पर्धा के लिए अधिक क्रांतिक रहता है। 

चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार - कृष्णनील, बथुआ, हिरनखुरी, सैंजी, चटरी-मटरी, जंगली गाजर आदि के नियंत्रण हेतु 2, 4,-डी इथाइल ईस्टर 36 प्रतिशत, 2,4,-डी लवण 80 प्रतिशत (फारनेक्सान, टाफाइसाड) की 0.625 किग्रा. मात्रा को 700-800 लीटर पानी में घोलकर एक हेक्टर में बोनी के 25-30 दिन के अन्दर छिड़काव करें।

सँकरी पत्ती वाले खरपतवार- गेहूँ में जंगली जई व गेहूँसा इनके नियंत्रण के लिए पेन्डीमिथालिन 30 ईसी (स्टाम्प) 800-1000 ग्रा. प्रति हेक्टर अथवा आइसोप्रोट्यूरॉन 50 डब्लू.पी.1.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर को बोआई के 2-3 दिन बाद 700-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हे. छिड़काव करें। 

कटाई-गहाई - गेहूँ की कटाई फरवरी से मई तक की जाती है। जब गेहूँ के दाने पक कर सख्त हो जायें और उनमें नमी का अंश 20-25 प्रतिशत तक आ जाये तो फसल की कटाई करें। कटाई हँसिये से की जाती है। कटाई पश्चात् फसल को 2-3 दिन खलिहान में सुखाकर मड़ाई शक्ति चालित थ्रेशर से की जाती है। 

उपज - सिंचित अवस्था में गेहूँ की बौनी किस्मों से लगभग 50-60 क्विंटल दाना के अलावा 80-90 क्विंटल भूसा प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है। देशी किस्मों से असिंचित अवस्था में 15-20 क्विंटल प्रति/हे. उपज प्राप्त होती है। 

भंडारण- सुरक्षित भंडारण हेतु दानों में 10-12 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं होनी चाहिए। भंडारण के पूर्व कोठियों तथा कमरों को साफ कर लें और दीवारों व फर्श पर मैलाथियान 50 प्रतिशत के घोल को 3 लीटर प्रति 100 वर्गमीटर की दर से छिड़कें। अनाज को बुखारी, कोठिलों या कमरे में रखने के बाद एल्युमिनियम फास्फाइड 3 ग्राम की दो गोली प्रति टन की दर से रखकर बंद कर देें।

  • नरेन्द्र कुमार वर्मा
  • लोकेश कुमार वर्मा
  • email : saveliyank888@gmail.com

 

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