फास्फोजिप्सम से बढ़ेगा तिलहनी फसलों का उत्पादन

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सोयाबीन
मध्यप्रदेश में सोयाबीन का क्षेत्रफल पूरे देश के क्षेत्र का 80 प्रतिशत है तथा उत्पादकता 5 दशक से केवल 1 टन प्रति हैक्टेयर के आसपास ही रहती है। उत्पादन में स्थिरता का एक प्रमुख कारण प्रदेश में लगातार सोयाबीन-गेहूं फसलचक्र का अपनाना तथा गंधक रहित फास्फेटिक उर्वरकों का बढ़ता उपयोग है। अनुकूल मौसम में सोयाबीन फसल को 30 कि. गंधक/हैक्टेयर देने से उत्पादन वृद्धि 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर गंधक की वास्तविक आवश्यकता एवं सप्लाई का अन्तर आकलन करने पर 10 लाख टन गंधक की मांग एवं पूर्ति में अंतर पाया गया है जो कि वर्तमान में उपलब्ध 68 लाख टन फास्फो जिप्सम से पूरी की जा सकती है। तथा गंधक आयात पर किये जा रहे व्यय को बचाया जा सकता है। आंशिक रूप से घुलनशील होने लगातार धीरे-धीरे उपलब्ध होता है। गंधक के अन्य घुलनशील श्रोत पानी में घुलकर भूमि से बहकर खेत से बाहर हो जाते हैं या फिर भूजल श्रोत को प्रदूषित करते हंै।
फास्फो जिप्सम की उपयोगिता का सीधा फसल पर प्रभाव तथा उसके बाद उसका रेसीड्यूल प्रभाव का उत्पादन पर आकलन किया गया तथा यह पाया गया है कि वह अन्य श्रोतों के समतुल्य है इसलिये फास्फोजिप्सम का कृषि में उपयोगिता निर्विवाद निर्विवाद रूप से सत्यापित हुई।
गंधक एवं केल्शियम का फसल पर प्रभाव एवं उपयोगिता
गंधक आवश्यक अमीनोएसिड जैसे मिथियोनिन, सिस्टाइन एवं सिस्टीन के निर्माण लिए आवश्यक है। यो तीनों मनुष्य को भोजन से (दालों) से प्राप्त होते है। गंधक पौधों में हरा पदार्थ क्लोरोफिल निर्माण में सहायक होता है। तिलहन फसलों में तेल के निर्माण हेतु आवश्यक होता है। पौधों में इन्जाइम व विटामिन निर्माण हेतु, दलहनी फसलों द्वारा नत्रजन का स्थिरीकरण एवं दलहन, तिलहन एवं सब्जी फसलों के गुणवत्ता हेतु गंधक जरूरी होता है।
केल्शियम भूमि की भौतिक दशा में सुधार लाता है। भूमि की स्ट्रक्चर में सुधार हेतु केल्शियम आवश्यक है तथा लाइम द्वारा तेजाबी भूमि में सुधार हेतु केल्शियम आवश्यक है सेब के फलों में बिटर पिट (कडवाहट) एवं आलू का खोखला होना भी केल्शियम की कमी के लक्षण है पशु एवं मनुष्यों केल्शियम के कमी क्षेत्र में उत्पादित अनाज व चारा के कारण भयंकर केल्शियम की कमी से पीडि़त होते है।
फास्फोजिप्सम बहुत सस्ता है
फास्फोजिप्सम की कीमत 50 किग्रा. पैकिंग में फैक्ट्री गेट पर रु. 500/-टन है तथा इसे रेल्वे द्घह्म्द्बद्दद्धह्ल ष्द्यड्डह्वह्यद्ग 120 में लाने की आवश्यकता है अन्य उर्वरकों के समकक्ष ताकि इस पर परिवहन लागत में अनुदान मिल सके। इसमें 16 प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी भी लगाई जाती है जो कि छूट योग्य है तथा इसे तत्व आधारित उर्वरक अनुदान कीमत नियंत्रण के अंतर्गत लाकर कृषि उत्पादन बढ़ाने में आशातीत संभावनाएं बनती है।
भा.कृ.अनु. परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. मंगलाराय साहब का देश में उर्वरक की स्थित पर व्यक्त विचार आई.सी.ए.आर रिर्पोटर में उल्लेख निम्नानुसार है।
हमारे देश में उर्वरकों का उपयोग 50 प्रतिशत तक उत्पादन वृद्धि में सहायक है लेकिन पोषक तत्वों की उपयोग क्षमता 2-50 प्रतिशत तक आंकी गई है। यह चिन्ता का विषय है यदि उत्पादन क्षमता तत्वों की 10 प्रतिशत बढ़ती है तो 2 करोड़ हैक्टेयर भूमि के बराबर होगी (वर्तमान उत्पादन स्तर पर) अर्थात् 2 करोड़ हैक्टेयर भूमि कम होने पर भी वर्तमान उत्पादन मिल सकेगा।
पोषक तत्वों के असंतुलित उपयोग से भूमि के स्वास्थ्य में तथा उत्पादकता में गिरावट आ रही है। साथ ही कृषि जीवांश खाद का घटता उपयोग भी पोषक तत्वों की उपयोग क्षमता को बाधित कर रही है। भूमि में पर्याप्त मात्रा में प्रमुख पोषक तत्व की पूर्ति भी नहीं हो पा रही है। मध्यम एवं सूक्ष्म तत्वों की पूर्ति भी बाधित है भूमि में तांबा तत्व की 3 प्रतिशत कमी से लेकर 89 प्रतिशत नत्रजन की कमी देखी जा रही है। गंधक, जस्ता एवं बोरोन की कमी क्रांतिक स्तर पर है। 47 प्रतिशत कृषि भूमि मेें गंधक की कमी है। जस्ता की कमी उत्तर भारत के रेतीली भूमि में तथा दक्षिण राज्यों की काली, लाल भूमि में बढ़ती जा रहीहै।
बोरोन की कमी लाल, मुरम एवं चूना कंकड़ी भूमि में बिहार, उड़ीसा एवं पश्चिम बंगाल में व्यापक रूप से बढ़ रही है कमी वाले तत्वों की वजह से अन्य पोषक तत्व भी भूमि में पूरी क्षमता से प्रभाव नहीं डाल पा रहे है।
भूमि विशेष क्षेत्र में एकीकृत पौध पोषण से जिसमें रसायनिक एवं कार्बनिक पोषक तत्वों के मिले-जुले उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति एवं तत्वों की उपयोग क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। देश को 45 मिलियन टन पोषक तत्वों की आवश्यकता 300 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य को 2025 तक प्राप्त करने हेतु आवश्यकता होगी इसलिये उर्वरक को वर्तमान 22 मिलियन पोषक तत्व क्षमता को बढ़ाना होगा साथ ही सरकार को ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में कम्पोस्ट खाद के उत्पादन पर जोर देना होगा।
सन् 2000 के बाद उर्वरकों का उत्पादन स्थिर है। वर्तमान में देशों खपत एवं पूर्ति में रसायनिक उर्वरकों की कमी 10 मिलियन टन है जो कि 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक 20 मिलियन टन हो जायेगी। आयात में भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होगी। हमारे देश में फास्फेट राक उच्च ग्रेड का, गंधक एवं पूर्ण पोटाश आयातित है जिनकी कीमतें 3.5, 6.4 एवं 2.8 गुना बढ़ गई है गत वर्ष की तुलना में। इसलिये उर्वरक उद्योग को वर्तमान में पक्षधर पालिसी द्वारा समर्थन देना होगा। उर्वरक उद्योग को रिव्हेम्प, क्षमता वृद्धि एवं नये यूनिट लगाना तथा विदेशों में संयुक्त उद्यम की स्थापना करनी होगी। इस दिशा में प्रयास हुए है। जिसमें मोरोक्को, जार्डन, सेनेगल, यूएई, ओमान में 100 प्रतिशत पुन: खरीदी के समझौते किए गये है। यूरिया इकाई जो नेप्था एवं फ्यूल आयल पर आधारित है कि उत्पादन लागत 2.5 गुना है वहीं पर प्राकृतिक गैस सस्ता है इसलिये यूरिया उद्योग हेतु प्राकृतिक गैस का आवंटन प्राथमिकता से करनी होगी। हालांकि कृष्णा गोदावरी बेसिन से यह पूर्ति होगी लेकिन मांग एवं पूर्ति में बहुत कमी होगी। पूर्व में उर्वरकों पर अनुदान उर्वरक वार थी लेकिन अब पोषक तत्वों के आधार पर अनुदान दिया जाना होगा ताकि पोषक तत्वों के उपयोग में असंतुलन दूर किया जा सके। अनेक उर्वरक जिनमें माइक्रो -न्यूट्रिएन्ट या नीम केक की कोटिंग की जाती है लागत बढ़ती है इसलिए इनमें फोर्टीफिकशन एवं कोटिंग लागत देना होगी। परिवहन लागत का वास्तविक व्यय की पूर्ति भी एक महत्वपूर्ण निर्णय है। वर्तमान में केवल 15 उर्वरक ही अनुदान योजना में शामिल है लेकिन अन्य उर्वरक जिनमें मध्यम एवं सूक्ष्म तत्व है को भी शामिल किया जाना होगा। देश में कम तत्व वाले राक फास्फेट तथा पोटाश धारी माइका (अभ्रक) का उपयोग कम्पोस्टिंग के माध्यम से उपयोगी होगा। तेजाबी भूमि में लो ग्रेड राक फास्फेट का सीधा उपयोग लाभकारी होगा। क्षारीय भूमि में फास्फोजिप्सम एवं मिनरल जिप्सम तथा तेजाबी भूमि में लाइम पत्थर का उपयोग उर्वरक क्षमता को दो गुना बढ़ा सकता है।
हर गांव में वर्मीकम्पोस्ट, नाडेप कम्पोस्ट, हरी खाद को एक मिशन की तरह चलाना होगा। गांव-गांव में मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनाकर कृषकों को उर्वरक उपयोग हेतु सलाह देनी होगी।

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