धान के प्रमुख ड्ढरोग-कीट एवं रोकथाम

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धान-के-प्रमुख-ड्ढरोग-कीट-एवं-रोकथाम

रोग
पत्तियों का अंगमारी रोग
यह रोग धान की फसल में अगस्त के महीने में लगता है. पत्तियों के शिरे व किनारों पर भूरी धारियां बनते-बनते पूरी पत्तियां झुलसी सी दिखाई देती हंै.
बचाव हेतु- मैन्कोजेब 3 ग्राम / प्रति लीटर पानी में घोल का छिड़काव करें.
पत्तियों की धारियां
यह रोग अगस्त माह में फसल में लगता है. शुरू में पत्तियों पर पीले रंग की लम्बी धारियां दिखाई देती है बाद में भूरे रंग की हो जाती है.
बचाव हेतु – बोने से पहले 30 ग्राम दवा स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 50 लीटर पानी में घोल बनाकर 25 किलोग्राम बीज को 10 घंटे तक डुबोकर बीजोपचार करें.
पत्तियों का झुलसन रोग
यह रोग धान की फसल में अगस्त के महीने में लगता है. शुरू में पत्तियों पर हल्के लाल धब्बे बनते हंै बाद में यह धब्बे तनों तक फैल जाते हैं व बड़े आकार के हो जाते है जिससे पत्तियां झुलसी हुई दिखाई देती हैं.
बचाव हेतु- बोने से पहले कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम दवा प्रति किलो बीज में मिलाकर बीजोपचार करें एवं एडीफेनकाम को 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर 15 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें.
धान का खैरा रोग
यह रोग भूमि में जस्ते की कमी के कारण होता है यह रोग फसल में पौध घर से लेकर बाढ़ की अवस्था में रोग के लक्षण दिखाई देते हंै. पौध रोपण के 15-25 दिन बाद ही पुरानी पत्तियों के आधार भाग में हल्के पीले रंग के धब्बे दिखाई देते है.
बचाव हेतु-

  • जिंक सल्फेट 20-25 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर बुवाई से पहले प्रयोग करना चाहिए.
  • पौध रोपण से पहले पौध को 0.4 प्रतिशत जिंक सल्फेट के घोल में 12 घंटे तक डुबोकर रोपण करें.
  • खड़ी फसल में 1000 लीटर पानी में 5 किलो ग्राम जिंक सल्फेट तथा 2.5 किलो ग्राम बिना बुझे चूने के घोल का मिश्रण बनाकर उसमें 2 किलोग्राम यूरिया मिलाकर छिड़काव करने से रोग का निदान तथा फसल की बढ़वार में वृद्धि होती है.
  • बोने से पहले 30 ग्राम दवा स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 50 लीटर पानी में घोल बनाकर 25 किलोग्राम बीज को 10 घंटे तक डुबोकर बीजोपचार करें.

कीट
गंधी बग
इस कीट का प्रकोप धान की फसल पर जुलाई से नवम्बर मध्य तक सक्रिय रहता है हल्की वर्षा इसके लिये उपयुक्त होती है.
बचाव हेतु – क्विनालफॉस 25 ईसी या क्लोरोपायरीफॉस 20 ईसी एल1-1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करें.
गंगई कीट या गाल मिंज
इसके द्वारा धान की फसल में औसतन 20-25 प्रतिशत क्षति प्रतिवर्ष होती है आकाश का घने बादलों से आच्छादित होना, वातावरण में नमी और कम तापक्रम इसके प्रकोप को बढ़ाने में सहायक होते है।
बचाव हेतु

  • क्लोरोपायरीफॉस 20 ईसी. 0.20 प्रतिशत के एक प्रतिशत घोल में पौधों की जड़ों को डुबोकर रोपाई करना चाहिए.
  • इसके बाद खेत में पानी भरकर फोरेट 10 जी दानेदार दवा 10 किलो ग्राम प्रति हैक्टेयर या कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत दानेदार दवा 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मिलायें.

फौजी या आर्मीवर्म कीट
इसकी सूंड़ी अवस्था हानिकारक होती है. नव विकसित सूंडी धान की पत्तियां खाती हैं तथा उसमें केवल मोटी शिरायें बचती है. बड़ी होने पर ये इल्लियां सबसे अधिक हानि करती है.वाली निकलने की अवस्था में यह तने से बाली को रात में काटकर खाती है. जिससे दाना भरने से पहले ही वाली जमीन में गिर जाती है दिन में यह कीट धान के कल्लों एवं जड़ों के पास छिपा रहता है तथा रात्रि में सक्रिय रहकर फसल को हानि पहुंचाता है, ये कीट एक खेत से दूसरे खेत में एक साथ चलकर पहुंचता है इसलिये इसे फौजी कीट कहते हैं. यह कीट खाता कम है व नुकसान ज्यादा करता है.
बचाव हेतु- क्विनालफॉस 25 ईसी या क्लोरोपायरीफॉस 20 ईसी एल. 2 मिली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें.

  • के.के. शर्मा, मो. : 9425725726
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